श्री-सूक्त सम्पदा (धारावाहिक शृंखला भाग ४)
ब्रह्मैव प्रथमम् असृजत
(आपोब्रह्म, आपो देवी एवं आपो देवता)
------------------
[
इस कड़ी के प्रारम्भ में...
गृध्र एक परम-शाक्त पक्षी है जिसे खाद्य-अखाद्य से कोई लेना-देना नहीं
होता। रूप भी उसका भयङ्कर एवं वीभत्स होता है। इस पक्षी को देखते ही मन में अपशकुन
जन्म लेने लगते हैं। ध्वनि भी इस पक्षी की कर्कश, भयप्रद तथा जुगुप्सा-जनक हुआ
करती है, अतः मुख्य वक्ता के रूप में यह चयन सकारण है। मैं बिना कारण के न तो कोई
पात्र गढ़ता हूँ और न ही कोई कहानी। अकारण मैं कुछ नहीं करता। यदि अरुचिकर लगे तो
गृध्र को एक अपशब्द कह कर अपना मार्ग लें तथा यदि रुचिकर लगे तो इस शैली का आनन्द
लें। यह शृंखला क्रुद्ध-ललित शैली में प्रारम्भ हुई थी इसी कारण मुख्य वक्ता के
रूप में एक गृध्र का चयन किया गया। अब, मन सदैव एक सा नहीं रहता अतः क्या पता कि
भविष्य में इस शैली में कुछ परिवर्तन हो? किन्तु अभी तो उसी शैली को ले कर चलने का
मन है क्योंकि परिवर्तन अचानक नहीं हुआ करते।
पुनश्च, यदि आपने काली-कर्पूर-स्तव पर लिखित मेरी शृंखला नहीं पढ़ी है, अथवा
इस शृंखला के ही पूर्व-भाग नहीं पढ़े हैं,
तो कृपया इस शृंखला के आलेख पढ़ कर न तो अपने मस्तिष्क को अनावश्यक बोझ दें और न ही
अपना अमूल्य समय व्यर्थ करें। पूर्व में प्रस्तुत कुछ अन्य लम्बे आलेख भी इस
शृंखला का अघोषित अङ्ग हैं जो विषय को अधिक स्पष्ट करने में सहायक हो सकते हैं।
आलेख में वर्तनी की त्रुटि यदि कोई है, तो उसे दृष्टिगत होते ही प्रथम अवसर
में ही परिमार्जित कर दिया जायेगा, किन्तु लम्बे आलेखों में किंचित वर्तनी त्रुटि
एक सहज घटना है जिसे स्वीकार करना ही उचित होगा।
कॉपी-पेस्ट सदा की भाँति प्रतिबन्धित है।
]
------------------
‘कितना बोलता है यह गृध्र?’ मैंने सोचा, और अचानक मुझे ध्यान आया कि जब इस
स्थान पर क्षुधा प्रभावित ही नहीं करती तो यह गृध्र इतना रक्त एवं मांस पचा कैसे
रहा होगा? मेरा इतना सोचना भर था कि मैंने देखा, वह गृध्र पुनः उसी तरह प्रमथ्यु
के कन्धे पर घूम-घूम कर नाचने लगा और उसके कण्ठ से निकलती क्रेंकार कहीं से भी
हँसी भले न लग रही हो, किन्तु मुझे अब तक के अनुभव से ज्ञात था कि वह हँस रहा है,
जोर-जोर से हँस रहा है और मेरा उपहास कर रहा है। मेरे जैसे शीघ्र-कोपी
हेतु मेरा यह उपहास असह्य था किन्तु मुझे ज्ञात था कि इस गृध्र का मैं कुछ भी
बिगाड़ नहीं सकता क्योंकि किम्वदन्तियों के पात्र एवं किम्वदन्तियों की घटनायें अमर
हुआ करती हैं तथा बुद्धि एवं तर्क की धार उनका तनिक भी अहित कर सकने में सक्षम
नहीं होती। ऐसी न जाने कितनी किम्वदन्तियों को मैं जानता हूँ जो नितान्त मिथ्या
हैं किन्तु वे किसी सत्य से अधिक पुष्ट हो कर जनमानस के मन-मस्तिष्क में अपना
सुदृढ़ स्थान आरक्षित किये हुए हैं। यश हो अथवा प्रवाद, और वे सत्य हों अथवा असत्य,
यदि एक बार प्रसरित हो गये तो उनका निरसन अत्यन्त कठिन हुआ करता है अतः किम्वदन्ती
का यह गृध्र अमर था अन्यथा मैं इस असभ्य दम्भी की ग्रीवा कभी का मरोड़ चुका होता।
और मुझे यह भी ज्ञात है कि बुद्धिमान की नीति मौन है, यद्यपि मैंने इसका पालन कभी
नहीं किया किन्तु आज इस नीति का अवलम्ब लिये बिना कोई गति ही नहीं थी क्योंकि कुछ
न कर सकने की विवशता तो थी ही!
अचानक गृध्र के नेत्र आरक्त हो उठे। उसने जैसे चीखते हुए कहा – ‘मूर्ख!
तेरी चिन्तना इतनी द्वैत-ग्रस्त क्यों है? एक ओर तो तू यह मानता है कि जो दृश्य तू
देख रहा है वह एक किम्वदन्ती का नाट्य है और दूसरी ओर इस नाट्य में तू वास्तविकता
का अन्वेषण करने का भी प्रयास कर रहा है? यदि कोई एक पक्ष चुन लेता तो तुझे सरलता
होती। तेरे चयनित पक्ष का खण्डन होने से अपर पक्ष का मण्डन हो जाता अथवा तेरे चयनित
पक्ष का मण्डन होने से अपर पक्ष का खण्डन हो जाता, किन्तु तू तो तुला के पलड़ों पर
कूदते मण्डूक की भाँति कभी इस पक्ष-पटल पर आ बैठता है तो कभी उस पक्ष-पटल पर! तू
मानता है न कि जो कुछ तुझे दृश्यमान है वह मात्र एक किम्वदन्ती है? तो
किम्वदन्तियों में कुछ भी सम्भव है! कुच्छ भी! किम्वदन्तियों में तो सूचिका-छिद्र
से हो कर हाथी आर-पार निकल जाते हैं मूर्ख!’
मेरे अभिमान को पद-दलित करता अपमान का यह कटु-चषक भी मैं मौन रह कर पी गया।
मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है कि मैंने उस समय अपना अपमान पिया था अथवा अपनी विवशता में
थूक का एक गोला कण्ठ से नीचे उतारा था, यद्यपि दोनों में कोई अन्तर नहीं था। और
तभी मैंने देखा – उस गृध्र के पङ्ख झड़-झड़ कर गिरने एवं तत्क्षण उस अनुर्वर भूमि से
उड़ कर अन्तरिक्ष में जा एक नव-वितान रचने लगे थे। अत्यल्प समय में समस्त भासमान
आकाश उस गृध्र के श्वेत-श्याम पङ्खों से भर गया। नभ पर नारद छा चुके थे।
गृध्र एक ऐसा कुरूप पक्षी है जो अपनी युवानी में ही परम वृद्ध सा दिखता है
और मेरे सम्मुख जो गृध्र था वह तो सम्भवतः सृष्टि का सर्वाधिक पुरातन गृध्र था –
जटायु एवं सम्पाती से भी ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ! उसे देखते ही मानस में बुढ़ापा छाने
लगता था किन्तु तभी मैंने देखा कि जिस प्रमथ्यु का हृत्पिण्ड वह नोंच-नोच कर खाता
रहा था वह प्रमथ्यु अचानक अग्निज्वाला से वेष्ठित हो गया। अग्निज्वाला के
मध्य उस मातरिश्वा प्रमथ्यु का गात्र तप्त सुवर्ण की भाँति दमक रहा था और वह वृद्ध
गृध्र उन ज्वाल-सप्तार्चियों पर आसीन था। यह दृश्य इतना अप्रत्याशित एवं इतना
अविश्वसनीय था कि मेरी चेतना प्रथम तो भय-ग्रस्त हुई और कुछ निमिषों में ही
संज्ञा-शून्य भी हो गयी। वह तो कुछ समय पश्चात, जब मेरी मूर्च्छा भग्न हुई, तब
ज्ञात हुआ कि इस अलौकिक दृश्य को देख कर मैं भय एवं आश्चर्य से अचेत हो चुका था।
जब मेरी चेतना लौटी तो मैंने तन्द्रिल अवस्था में ही सुना – दिशाओं में कुछ
मन्त्र गूँज रहे थे। मैं मात्र इतना ही सुन पाया – ‘शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु
पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः।।’ और मुझे आभास हुआ कि मेरा शरीर पूर्णतः भीगा हुआ
है। क्या उस वृद्ध गृध्र ने मुझे पुनश्चेतन करने हेतु मेरे शरीर पर जल डाला था?
नहीं! मैंने अनुभव किया
कि उस क्षेत्र की समस्त भूमि ही नम हो चुकी है। नारद - वारिद अपनी पीड़ा उड़ेल कर जा चुके थे, किन्तु इस
पीड़ोद्रेक में स्नान कर के भी, एक मातरिश्वा था जो दहक रहा था, उसकी ज्वालायें
बुझी नहीं थीं, एक मैं था - अर्द्ध-विक्षिप्त; और एक पङ्खनुचा गृध्र था जो
साक्षात् द्यौ-रूप था। और मैंने स्पष्ट देखा था - उस द्यौ के नुचे-झड़े पङ्ख एक
धुले हुए चित्र-कर्बुर धौति के समान पुनः उसकी काया से जा लिपटे थे।
‘शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः।।’
यह मन्त्र मुझे सुना-सुना सा प्रतीत होता था। ओ हो हो हो! यह तो शनि ग्रह
की अभ्यर्थना का मन्त्र है! यह बूढ़ा गृध्र इस समय इस मन्त्र का पाठ क्यों कर रहा
है? क्या मुझ पर शनि ग्रह का आवेश हो गया था जिसकी यह शान्ति कर रहा है? किन्तु
मैंने अनुभव किया कि मन्त्र उस गृध्र के कण्ठ से नहीं बल्कि किसी अन्य स्थान से पुनरावृत्तीय
क्रम में निःसृत हो रहे थे जिससे दिशायें गूँज रही थीं। मन्त्रों पर ध्यान देने पर
मैंने जाना कि यह सस्वर एवं गहन-गम्भीर वाणी किसी अदृश्य स्थल से आ रहे ऋग्वेद के
दशम मण्डल के नवम सूक्त के ऋचाओं के पाठ की है। मेरे दोनों हाथ उस अदृश्य स्वर की
अभ्यर्थना एवं आभार हेतु स्वतः ही प्रणाम मुद्रा में आ जुड़े एवं मैं सुनता रहा –
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय
चक्षसे॥१॥
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव
मातरः॥२॥
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो
जनयथा च नः॥३॥
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं
योरभि स्रवन्तु नः॥४॥
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्। आपो
याचामि भेषजम्॥५॥
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि
भेषजा। अग्निं च विश्वशम्भुवम्॥६॥
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम। ज्योक्च
सूर्यं दृशे॥७॥
इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि। यद्वाहमभिदुद्रोह
यद्वा शेप उतानृतम्॥८॥
आपो अद्यान्वचारिषं रसेन समगस्महि। पयस्वानग्न
आ गहि तं मा सं सृज वर्चसा॥९॥
कुछ समय पश्चात यह ध्वनि जब मौन हुई, गृध्र ने मुझसे पूछा – ‘पहचानते हो इन
ऋचाओं को?’
‘हाँ!’ मैंने उत्तर दिया – ‘यह ऋग्वेद के दशम मण्डल के नवें सूक्त की
ऋचायें हैं।’
‘अत्यन्त प्रखर है तुम्हारी स्मरण-शक्ति! किन्तु तनिक यह तो कहो कि क्या कह
रहा है ऋषि इन ऋचाओं के माध्यम से?’
मुझे लगा कि यह एक अवसर है जब मैं इस गृध्र के सम्मुख अपनी योग्यता का
प्रदर्शन कर सकता हूँ। मैं क्रमशः प्रत्येक ऋचा का अर्थ बोलता गया –
हे जल! तुम सुख को उत्पन्न करने वाले आधार हो! हमे उत्तम बल देने हेतु हम
अन्न संचय करो तथा पवित्र आत्म ज्ञान हेतु हमें संरक्षित रखो!॥१॥
हे जल! जैसे मातायें अपने शिशुओं को दूध पिलाती हैं उसी प्रकार जो तुम्हारा
कल्याणमय रस-ज्ञान तथा बल है वह अपना रस-सुख हमें प्रदान करो। ॥२॥
हे जल! तुम जिस पाप के विमोचन निमित्त हमारा पालन करते हो, हम उसी पाप को
नष्ट करने की कामना से तुमको स्वीकार करते हैं। तुम हमारे वंश की वृद्धि करो! ॥३॥
हे जल! तुम हमारे हेतु शान्ति एवं सुख के दाता बनो तथा हमें अभीष्ट की
प्राप्ति कराओ। हमें पीने हेतु आरुज्यदायक उदक प्राप्त हो तथा हम पर रोग एवं
अवर्षण को दूर रखने वाले सुन्दर गुणों वाला जल आकाश से क्षरित हो। ॥४॥
जल ही मनुष्यों के आश्रयदाता एवं काम्य पदार्थों के स्वामी हैं। वे ही
रोग-निवारण एवं आरोग्यदान में समर्थ हैं। उन जलों से हम ओषधियों को गुणवती करने की
याचना करते हैं। ॥५॥
इन्हीं जलों में अग्नि का निवास है एवं ओषधियाँ इन्हीं की आश्रिता हैं यह
सोम का कथन है। ॥६॥
हे जल! हमारी देह-रक्षक ओषधियों की वृद्धि करो जिससे हम दीर्घकाल तक
सूर्य-दर्शन करें।॥७॥
हे जल! मेरे द्वारा जो हिंसादि कर्म हुए हैं या मिथ्याभाषण आदि का पाप हुआ
है उन पापों से मेरी रक्षा करो।॥८॥
मैं आज जल में प्रविष्ट हुआ। इसके रस के साथ सम्मिलित हुआ। हे अग्ने! तुम
भी जल में स्थित हो! अतः मेरे समीप आ कर मुझे तेज प्रदान करो। ॥९॥
अर्थ बताते समय मैंने अनुभव किया कि उस गृध्र की चोंच कुछ तिर्यक सी हो गयी
है, तथा उसके नेत्रों में मेरे लिये एक उपहास है। मैं कुछ कटु कहने ही वाला था कि
मुझे स्मरण हुआ - इस गृध्र ने स्वयं को द्यौ कहा था। वेदों में द्यौ शब्द का
प्रयोग स्थूल आकाश हेतु हुआ है किन्तु जब भी इस शब्द का प्रयोग देवता रूप में हुआ
है वहाँ यह शब्द पृथिवी के साथ समासित हो कर द्विवचन में प्रयुक्त है।
द्यावा-पृथिवी के रूप में वैदिक ऋषि इस युग्म को विश्व के पिता एवं माता रूप में
स्वीकार करते रहे हैं। कुछ मन्त्रों में यह एक लोहित वृषभ रूप में भी उद्धृत है जो
अधोमुख हो कर रँभाता है जिससे पृथ्वी उर्वर हुआ करती है। चूँकि मूलतः द्यौ के
मानवीकरण में उसका पितृत्व ही उभर कर आया है अतः उचित यही है कि इसके समक्ष मेरा
पुत्र-भाव ही विद्यमान रहे यह सोच कर मैंने अपने आक्रोश को भीतर ही भीतर दबा लिया।
गृध्र ने पूछा – ‘यह तुम जो हे जल! हे जल! का प्रलाप कर रहे हो, क्या ये
ऋचायें जल से सम्बन्धित हैं?’
‘अवश्य ही हैं! आपः का अर्थ जल ही तो होता है?’
गृध्र ने पुनः पूछा – ‘वही जल न? जो तुम मनुष्य तृषा शमन करने हेतु पान
करते हो, जिस जल से स्नान करते हो, जिससे अपने कर्मान्त सींचते हो? वही जल न?’
‘वही जल तो! और कौन सा जल होता है?’
‘सत्य कहा। जल तो वही होता है। किन्तु क्या इस सूक्त की ऋचाओं में ऋषि जिसे
केन्द्रित रख कर पूज्य भाव से प्रार्थना कर रहा है वह मात्र जल हेतु है?’
‘है ही! अग्नि एवं वायु के साथ प्राणियों हेतु जल जीवन का एक प्रमुख घटक है
अतः जल के प्रति ऋषि का अहोभाव काव्य में छलक उठा जो इस सूक्त में सङ्कलित है।
‘तब ऋषि जो यह कहता है कि इन्हीं जलों में अग्नि का निवास है तथा यह भी कि,
हे अग्ने! तुम भी जल में स्थित हो! अतः मेरे समीप आ कर मुझे तेज प्रदान करो।, यह
क्यों कह दिया? जल तो अग्नि को बुझा देता है न? तो जल में अग्नि कैसे स्थित है?
क्या ऋषि को भ्रम हुआ था?’
‘जल में अग्नि विद्यमान है यह शास्त्रों से प्रमाणित है जिसे बडवाग्नि कहा
जाता है। और आज के वैज्ञानिक युग में तो जल से विद्युत् का उत्पादन किया जाता है
जो अग्नि का ही प्रकारान्तर है। इतना ही नहीं बल्कि इस सूक्त का चतुर्थ मन्त्र तो
शनि ग्रह की शान्ति हेतु बहुत प्रभावी है।’ मेरा ज्ञान छलका जा रहा था और मुझे
विश्वास सा था कि इस बार तो यह गृध्र मुझसे अवश्य प्रभावित हो जायेगा।
किन्तु वह गृध्र कोई साधारण गृध्र न था! वह था साक्षात् द्यौ! किसी के
समक्ष अपने ज्ञान का प्रदर्शन कितना आत्मतुष्टि-दायक होता है न? उस गृध्र ने मेरे
इस भ्रम एवं अहङ्कार को तत्काल अपनी चोंच से रगड़ डाला। उसने कहा –
‘एक था चूहा। एक दिन किसी पण्यशाली
के आपण में चुपके से घुस गया था। उसे पण्यशाली के आपण में एक हरिद्रा-ग्रन्थि मिल
गयी। उसने सोचा कि अब वह भी एक पण्यशाला खोलेगा और बहुत बड़ा श्रेष्ठी बनेगा। उसने
हल्दी की वह गाँठ ले कर अपना आपण खोल लेने का दृढ़ निश्चय कर लिया किन्तु उसे यह
ज्ञात नहीं था कि हल्दी की एक गाँठ ले कर पण्यशाला नहीं खुलती। ऐसा ही तुम्हारे
साथ है। शनि ग्रह की अभ्यर्थना हेतु यह मन्त्र कितना सार्थक है यह तो तुम उस
मन्त्र का अर्थ बताते समय स्वयं प्रमाणित कर चुके हो। जिस मन्त्र में शनि का नाम
तक नहीं है उसे तुम एवं तुम्हारे कर्मकाण्डी शनि की अभ्यर्थना का मन्त्र किस आधार
पर मानते हैं यह तो वे ही बतायेंगे या हो सकता है कि यदि पुनः प्रसङ्ग उपस्थित हुआ
तो उनकी मूढ़ता का आख्यान इस गृध्र से ही सुन लेना, किन्तु इतना अवश्य जान लो कि यह
सूक्त सामान्यतया जल की अभ्यर्थना का सूक्त भले माना जाता हो, यह मूलतः आपस्तत्त्व
की अभ्यर्थना का सूक्त है।’
‘अब यह कैसी भ्रामक बात? जल-तत्त्व ही तो आपस्तत्त्व है?’
‘नहीं! जल-तत्त्व आपस्तत्त्व नहीं है। वास्तव में जल तो तत्त्व ही नहीं है।
जिस जल को तुम जानते हो वह तत्त्व नहीं ओषजन एवं उद्जन (ऑक्सीजन और हाइड्रोजन) का
यौगिक है और यौगिक पदार्थ न तो विज्ञान की दृष्टि से तत्त्व की परिभाषा को संतुष्ट
कर सकता है और न ही दर्शन की दृष्टि से। और तत्त्वदर्शी ऋग्वैदिक ऋषि जब
आपस्तत्त्व के प्रार्थना में इस सूक्त का दर्शन कर रहा होगा उस समय उसके अन्तःकरण
में मात्र लौकिक जल के प्रति अहोभाव उठा हो यह सोचना भी उस ऋषि की दार्शनिक चिन्तन-शक्ति
का उपहास है क्योंकि सिंह कभी मूषक का आखेट नहीं करता, गरुड कभी पिपीलिकाओं को अपना
आहार नहीं बनाता और श्रेष्ठ कवि कभी सामान्य एवं सामान्य से भी निम्न विषयों पर
अपनी लेखनी को कष्ट नहीं दिया करता। क्षुद्र कर्म क्षुद्र मानसिकता वालों द्वारा
एवं क्षुद्र मानसिकता वालों हेतु हुआ करते हैं अतः अनूचान वैदिक ऋषियों ने किसी
सामान्य विषय पर अपनी लेखनी को कष्ट दिया हो, उनसे ऐसी आशा नहीं की जा सकती। और उन
अनूचान वैदिक ऋषियों ने किसी सामान्य विषय पर अपनी लेखनी को कष्ट दिया भी नहीं!
उन्होंने तो अपनी लेखनी का उपयोग मानवता के सर्वाधिक जटिल प्रश्न का उत्तर देने
हेतु किया और वह प्रश्न था – कस्त्वम्? कौन हो तुम? और इसका उत्तर बताया उन्होंने
कि तत्वम् असि! तद् त्वम् असि! तत्वमसि! कि अवश्य ही कोई तो एक निगूढ़, अनिर्वचनीय
तत्व है। और तुम भी वही हो!
‘वेदों में अन्यान्य विषयों के
वर्णन के साथ-साथ दर्शन की भी एक प्रच्छन्न धारा प्रवाहित है तथा वह दर्शन-धारा
नाना तत्त्वों के पारस्परिक सम्बन्धों का एक उलझा हुआ सूत्र-वितान है जिसे अत्यन्त
धैर्य के साथ सुलझा कर ही कोई छोर पाया जा सकता है। अन्यान्य शब्दों की ही भाँति वैदिकों
का आपः शब्द भी अपना मूल तात्पर्य खो कर आज एक समस्या बन चुका है। जो व्याख्याता
या भाष्यकार इस आपः तत्त्व को जल-मात्र समझते हैं वे एक लौकिक अर्थ को पकड़ कर
वैदिक ऋषियों की गम्भीरता के ऊपरी सतह पर तैरते हैं अतः वे स्वयं तो भ्रम में रह
ही जाते हैं, अन्यों को भी भ्रम के भँवर में फेंक देते हैं। सुने तो होगे न कबीर
का वह दोधक? ‘अन्धे अन्धा ठेलिया, दोऊ कूप पड़न्त। वही समझो! क्योंकि आपः का एक
अर्थ जल भी होता है इसमें कोई सन्देह नहीं, किन्तु यह लौकिक संस्कृत का अर्थ है और
वैदिक संस्कृत का लौकिक संस्कृत से कोई लेना-देना नहीं! फिर भी, सर्वथा यह नहीं
कहा जा सकता कि वेदों में आपः का अर्थ कभी जल रहा ही नहीं। देखो! वेदों में आपः
शब्द का उल्लेख जिन विषयों के सन्दर्भ में हुआ है उनमें यदा-कडा लौकिक जल का अर्थ
भी ग्राह्य है अवश्य, किन्तु तब, जब ऋषियों ने उस शब्द का उपयोग वैदिक जल-विद्या
के सन्दर्भ में किया। अब यदि आज, मैं तुम जैसे आधुनिक विज्ञान के अंध-अनुयायियों
से यह कहूँ वेदों में लौकिक जल की उत्पत्ति की वैज्ञानिक उपपत्ति भी दी हुई है तो
तुम यही कहोगे कि यह मेरी आर्य-श्रेष्ठता की मदान्ध अभिव्यक्ति है किन्तु प्रथम-दृष्टया
यदि तुम वही मान लो तो भी तुमको यह सत्य बताने में मुझे कोई हीन-भावना नहीं आती।
निघंटु में जल के सौ पर्याय दिये गये हैं जिनमें से एक पर्याय “जन्म” भी है अतः
स्पष्ट है कि जल का, लौकिक जल का, जन्म हुआ करता है। अब तुम्हारा आधुनिक विज्ञान
कहता है कि प्राणवायु (ऑक्सीजन) एवं उद्जन (हाइड्रोजन) के संयोग से जल उत्पन्न
होता है। भूतं, भुवनं और भविष्यति ये तीनों शब्द वैदिकों ने जल हेतु प्रयुक्त किये
हैं। प्रमाण निघंटु है। इन तीनों पर्यायों से स्पष्ट है कि जल का आविर्भाव जिन
नियमों के अधीन पूर्व में हुआ उन्हीं नियमों के अधीन होता भी है तथा होता भी रहेगा।
जल का एक पर्याय रेतः भी है जो आज के विद्वान् पुरुष का वीर्य मानते हैं और इसी
मिथ्या धारणा ने मैत्रावरुण कथा को एक अश्लील परिप्रेक्ष्य दे दिया।’
‘मैत्रावरुण कथा क्या?’ मैंने पूछा।
‘अरे! तुम मैत्रावरुण कथा नहीं
जानते? तुम्ह्रारे लोक में एक प्रचलित कथा है न कि इन्द्र की सभा में अप्सराओं का
नृत्य देखते समय उर्वशी का नृत्य देख कर मित्र एवं वरुण दोनों इतने कामासक्त हो गये
कि उनका रेतःस्खलन हो गया और इन दोनों के वीर्य से वशिष्ठ उत्पन्न हुए! किन्तु यह
कथा मूर्खों का अश्लील एवं वीभत्स अपलाप मात्र है। पुरानों के कथा-भाग को ठीक से
समझने की आवश्यकता है तथा यह तभी सम्भव है जब शब्दों के अर्थ नन्हीं, उनके
निहितार्थ समझे जाँय।
‘उर्वशी को अप्सरा कहा हां गया है।
ऐसे ही घृताची एवं रम्भा भी अप्सरायें ही हैं। किन्तु अप्सरा है क्या? वैदिक
संस्कृत हो अथवा लौकिक संस्कृत, दोनों में शब्द पदार्थ का स्वरूप भली प्रकार से
अभिव्यक्त करते हैं तथा इसी आधार पर वैदिक उपदेशों का गूढार्थ जाना भी जा सकता है।
जिनको शब्दों का वास्तविक अर्थ ही ज्ञात नहीं वे वेद क्या पढ़ेंगे और क्या
पढ़ायेंगे?
‘अमरकोश कहता है – अप्सु सरन्ति
इति अप्सरसः। जल-प्रवाह ही अपसरा है। अनायास नहीं है कि अप्सराओं की सभी कहानियाँ
नदियों के तट पर ही अपना आकार पायीं किन्तु एक जल सरण तो आकाश से भी होता है! आकाश
में मेघों का आच्छादन, उनके परस्पर संघात से विद्युत् गर्जना, बिजलियों का नर्तन,
यह भी अप्सर-पन है। और उरु वशे यस्या सा उर्वशी। जिसके अधीन सब कुछ है वह उर्वशी
है। एक और व्याख्या है उर्वशी शब्द की! उरु बहु अश्नुते – जो बहुत भक्षण करती है
वह है उर्वशी! तड़ित-पतन से कितना विनाश होता है यह कोई कहने की बात है? पुरुरवा
एवं उर्वशी आख्यान भी तो सूना होगा न? पुरुरवा – जो बहुत शब्द करे अर्थात गर्जित
मेघ तथा उर्वशी उस मेघ से विच्छुरित तड़ित। किन्तु तुम कहोगे कि यह सब मेरे मन की
उपज है तो ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के दूसरे ही सूक्त की सप्तम ऋचा का स्मरण करो –
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशाऽदसं। धियं घृताऽची साधन्ता।। इस सूक्त को
वायु-सूक्त कहा जाता है जिसके देवता मित्रावरुण हैं। अब तनिक इसके अर्थ पर ध्यान
दो। मित्रं हुवे पूतदक्षं – मैं मित्र को स्वीकार करता हूँ जो पूतदक्ष है। या मैं
उसे स्वीकार करता हूँ जो अपने पूत रूप में सबका मापन करने में दक्ष है। और यह गुण
हाइड्रोजन में है। पुनः, वरुणं च रिशाऽदसं – रिश आदस जंग लगाने वाले वरुण वायु को
भी लेता हूँ। रिश्, रिष्, रुष्, रुश् इन सभी का अर्थ है विकृत करना। और यह गुण
ऑक्सीजन में है। ऑक्सीजन के संपर्क से धातुओं में जंग लगता है, उनका क्षरण होता है।
धियं घृताऽची साधन्ता – ये दोनों जलोत्पादन सिद्ध करते हैं। जलोत्पादन क्यों?
क्योंकि घृत भी जल का पर्याय है और इसका प्रमाण भी निघंटु ही है जिसमें जल के सौ
पर्याय में एक पर्याय घृत भी कहा गया है। यह मैत्रावरुण गाथा का गूढार्थ है। आकाश
में मेघ-विच्छुरित-विद्युत् उर्वशी का नृत्य हो रहा हो और मित्र तथा वरुण का
सम्मिलित रेत स्खलित हो रहा हो वह दृश्य इस कथा का जुगुप्साजंक अर्थ नहीं वर्षा का
मनभावन दृश्य उपस्थित करता है। यह वैदिकों की जल-विद्या थी जिसे तुमने समझा नहीं
और पाश्चात्यों के सिद्धान्तों के समक्ष नतमस्तक हुए। किन्तु आपः शब्द मात्र
जल-विद्या से ही सम्बन्ध नहीं रखता! इस शब्द के कुछ अन्य गूढ़ार्थ भी हैं जिनको
समझे बिना वेदों के अर्थ का अनर्थ किया जाता रहा है और वेदों की ऋचाओं का अर्थ वह
नहीं है जो हम जानते अथवा लगाते हैं। उनका अर्थ तो वह है जो वैदिक ऋषियों को
अभिप्रेत था।’
‘फिर क्या है आपस्तत्त्व का तात्पर्य? क्या है ऋषि का अभिप्रेत?’ मैंने
व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा।
‘खीझो मत! प्रथम तो इस धारणा को खुरच कर अपने मस्तिष्क से निकाल दो कि अप्
तत्त्व पीने वाला जल है तथा यदि है भी, तो उस रूप में नहीं जिस रूप में तुमको
सामान्य जल दिखता या अनुभव होता है। आपः शब्द से जिस जल का तात्पर्य ग्रहण करना है
वह ‘जायते यस्मात्, लीयते यस्मिन्, तज्जलः – समस्त भूतात्मक जगत जिससे जन्म पाता है – जायते
यस्मात्, और फिर जिसमें लीन भी हो जाता है, लीयते यस्मिन्, वह जल है’ इस निहितार्थ
का बोधक है जो वैदिक अर्थ है तथा इस अर्थ का वैदिक – दर्शन के आपस्तत्त्व से सम्बन्ध
है, न कि साधारण जल से और इसे तथा ऐसे ही अन्य कूट-अभिप्रेतों को सटीक पकड़े बिना
वेदों की ऋचाओं के असोढव्य अर्थ होते रहेंगे। यह आपस्त्तत्व तो सृष्टि के विकास
क्रम में अखिल ब्रह्माण्ड का प्रथम व्यक्त भौतिक स्वरूप है जिसे कभी दिव्य-शरीर,
कभी सोम, कभी चन्द्र, कभी विश्व-कर्मा, कभी परा-वाक् तो कभी धाता या विधाता आदि रूपों
में स्वीकार किया गया है। यह आपस्त्तत्व वैद्युतीय–सर स्वरूप में भौतिकात्मा अणुओं
का एक प्रवाही मधु-उर्मिमान सागर जैसा है जो सर्व-व्यापी विभु आत्मरूप है। यह अप्
तत्त्व वैदिक दर्शन-धारा की अमूल्य वज्र-मणि है जो पञ्चपर्वा एवं सप्तपर्वा विद्या
तथा गायत्री ब्रह्मवाद की सरणि का पारिभाषिक शब्द है और इस आपस्त्तत्व से सम्बंधित
तीन वैदिक संज्ञायें हैं – आपोब्रह्म, आपोदेवता एवं आपोदेवी।
‘सर्वप्रथम आपोब्रह्म को समझो। मानव-सभ्यता के इतिहास में जितने प्राचीन
ग्रन्थ हैं सभी में सृष्टि के प्रारम्भ
में अप् तत्त्व की उपस्थिति वर्णित है। विज्ञान भी स्वीकार करता है कि सृष्टि का
उद्भव एवं विकास जल से हुआ किन्तु वैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष को सत्य होते हुए भी
वैदिक अप्-तत्त्व से समञ्जित या उस पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। ऋग्वेद के
प्रथम मण्डल के १६१वें सूक्त की ४१वीं एवं ४२वीं ऋचायें इस सन्दर्भ में एक अत्यन्त
सुन्दर भूमिका रचती हैं। स्मरण है वह ऋचा? तनिक सुनाओ तो!’
मैंने पढ़ा – ‘गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी
नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन्॥ तस्याः समुद्रा अधि वि क्षरन्ति तेन
जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः। ततः क्षरत्यक्षरं तद्विश्वमुप जीवति॥
‘अब तनिक इसका अर्थ भी बोल दो!’
‘वह गौ शब्द करती हुई जलों को तरङ्गायित करती हुई हिलाती है तथा एक-पाद,
द्विपाद, चतुर्पाद, अष्टपाद, नौ पाद वाली हो कर क्रमशः सहस्राक्षरा होती हुई परम-व्योम
में संव्याप्त हो जाती है। उसी गौ से समुद्र प्रवाहित हैं, उसी के कारण चारो
दिशायें जीवित हैं, उसी के कारण अक्षर-वृष्टि होती है जिससे यह सम्पूर्ण विश्व
जीवन प्राप्त करता है।’
‘अत्यंत सतर्कता से शब्दों का चुनाव किया है तुमने, किन्तु इन शब्दों से इस
ऋचा का अर्थ तो विज्ञापित नहीं होता! किन्तु सत्य तो यह है, तथा मुझे ज्ञात है कि तुम
वह सत्य जानते हो अन्यथा तुम्हारे शब्दों का चुनाव इतना सतर्क न होता, और वह सत्य
यह है कि यदि तुम इस ऋचा का स्पष्ट अर्थ बताने का कोई प्रयत्न करोगे तो उस अर्थ पर
अनेक प्रश्न उठेंगे जिनका उत्तर तुमको देना होगा। उन अनेक प्रश्नों में से कुछ
प्रश्न ये हो सकते हैं –
गौ क्या?
उसके द्वारा किया जाने वाला तक्षण या उसके द्वारा हिलाना क्या?
एक, दो, चार, आठ और नौ पाद एवं क्या?
वह सहस्राक्षरा कैसे?
और उस गौ से समुद्र कैसे बहा?
उससे दिशायें कैसे जीवित?
उससे अक्षर-वृष्टि कैसे?
और वह अक्षर क्या जिससे यह सम्पूर्ण विश्व जीवन प्राप्त करता है?
बभूवुषी क्या?
तथा सर्वाधिक जटिल प्रश्न कि सहस्राक्षरा परमे व्योमन् क्या?’
मैं मानता हूँ तथा बारम्बार यह कहता भी हूँ कि यदि किसी विषय पर अपनी
अज्ञानता छिपानी हो चतुर व्यक्ति को मौन रहना चाहिये। निश्चित ही उस गृध्र के इन
प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं थे अतः मैं मौन रहा। किन्तु मुझे भ्रम था कि मैं
मौन द्वारा अपनी अज्ञानता छिपा सकता हूँ। वह गृध्र स्पष्ट रूप से जानता था कि मुझे
उसके प्रश्नों के उत्तर ज्ञात नहीं हैं। उसने कहा –
‘तुम नहीं बता सकते, क्योंकि तुमको
ज्ञात नहीं है। अपने सतर्क शब्दों द्वारा तुमने अपनी अज्ञानता पर आवरण डालने का
प्रयत्न भर किया है। भाष्यकारों के भाष्य का आश्रय ले कर वेद पढ़ने वालों की यही
दशा हुआ करती है जो तुम्हारी है। पुस्तकों से शिक्षा तो प्राप्त हो सकती है किन्तु
ज्ञान नहीं। ज्ञान तो, या तो गुरु-चरणों में बैठ कर प्राप्त हो सकता है अथवा
यदा-कदा उसे भी प्राप्त हो जाता है जो अन्तर्प्रज्ञा से सम्पन्न हो, और तुम्हारे
साथ इन दोनों में से एक भी पूर्वबन्ध पूर्ण नहीं होता अतः इसका अर्थ तुमको ज्ञात
नहीं है। तुमने ध्यान क्यों नहीं दिया कि इस ऋचा में गौ नहीं, गौरी शब्द का प्रयोग
हुआ है? तुमने ध्यान इस कारण नहीं दिया क्योंकि भाष्यकारों ने तुमको इस ऋचा के
अर्थ में गौ शब्द के खूँटे पर बाँध दिया दिया है, केन्द्रित कर दिया है और तुम उसी
खूँटे के चतुर्दिक एक निश्चित सीमा में भ्रमण करने हेतु विवश हो तथा इस बन्धन के
कारण तुम भ्रमित रहने हेतु भी विवश हो।
‘वेदों की ऋचाओं का सम्यक अर्थ जानने हेतु जो मूल अर्हता है वह तुमको बता
चुका हूँ किन्तु इसके साथ ही ऋषियों के कथन में जो रहस्य है उसको जानने हेतु कुछ
कूट-शब्दों के रहस्य भी जानना परम-आवश्यक है। अब एक साथ समस्त रहस्य तो कोई कैसे
बताये? किन्तु यहाँ कुछ रहस्यों को तुम्हारा जान लेना ही उचित है अन्यथा वेदों को
तो तुम वैसे भी इस जन्म में तो नहीं ही समझ पाओगे, मेरी बातें भी तुमको भ्रामक ही लगेंगीं
जैसा कि तुम कह भी चुके। तो सुनो! ... ...
‘एक शब्द है महिष जिसका सामान्य अर्थ है राजा। (कृताभिषेके भूपाले लुलापे
महिषः स्मृतः। - शब्दकल्पद्रुम) और वैदिकों हेतु मान्य राजा या तो अग्नि है अथवा
सोम, अतः अग्नि एवं सोम ये दोनों महिष कहलाते हैं, तथा गौरी नाम महिषी का है जो
गुरु-पुत्री होने के कारण गौरी है। गौरी का एक अर्थ गौर वर्ण वाली भी है अवश्य, किन्तु
इसका मूल अर्थ गुरु की पुत्री ही है। गुरु कौन? गुरु है बृहस्पति ब्रह्मणस्पति और
हेमाद्रि – हिमालय इसका लौकिक प्रतीक है। इसी कारण हिमाचल-तनया पार्वती का भी एक
नाम गौरी भी है, यह और बात है कि वह हिमालय-तनया गौर-वर्ण वाली ही अभिकल्पित है। अतः
वह गौ नहीं! वह गौरी! और वह महिषासुर तो ज्ञात ही होगा तुम्हें? वह भैंसासुर नहीं
है। महिषासुर शब्द मात्र एक विरुद है – असुर-राज। और असुर कौन है? यह शब्द सुर
शब्द का विलोम नहीं है। असु का अर्थ है प्राण अतः असुर का अर्थ है प्राणवान! वैदिक
काल में समस्त पराक्रमी-प्राणवान चरित्रों को असुर का विशेषण प्रदान किया गया।
इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, सभी असुर थे। असुरा अदेवा श्चक्रेण ताँ अप वप जीषिन्।
मह उग्राय तवसे सुवृक्तिं प्रेरय शिवतमाय पश्वः। गिर्वाहसे गिर इन्द्राय पूर्वी
र्धेहि तन्वै कुविदङ्ग वेदत्।। इसी से समझो! वैदिक काल में प्रत्येक पराक्रमी का
विशेषण असु-र था।
‘तो असुर का अर्थ सुर का विलोम
नहीं है! असुर का अर्थ है पराक्रमी! प्राण-ऊर्जा-सम्पन्न! अतः पहले अपने मन में
बँधी अनावश्यक ग्रंथियाँ खोलो! और उन अर्द्ध-पठित ज्ञानियों की कंडूग्रस्त -
खुजली-कारक – लेखनियों से दूर रहो! पढ़ना आवश्यक है! किन्तु क्या पढ़ना है और क्या
नहीं, यह निर्णय करना परमावश्यक है क्योंकि चेतना की भूमि में यदि निरन्तर विष-बीज बोये
जायेंगे तो मानवता को अपने विनाश से पूर्व क्रन्दन कर सकने भर का भी अवसर नहीं मिल
सकेगा।
‘अब तुम पूछोगे कि यह बृहस्पति
ब्रह्मणस्पति क्या है? समय आने पर या किसी प्रकरण के उपस्थित होने पर बताऊँगा।
‘और तुमने कहा कि वह (गौ) शब्द
करती हुई जलों को तरङ्गायित करते हुए हिलाती है। उलटा कह गये तुम! किन्तु तुम करोगे
भी तो क्या? सभी भाष्यकार घुमा-फिरा कर यही सब तो कह गये हैं! किन्तु वह (अभी तो
यही मान कर चलो कि वह जो भी है, वह) जलों को तरङ्गायित करते हुए नहीं हिलाती, वह
जलों को इस प्रकार हिलाती है, इतना मथती है कि वे तरङ्गायित हो उठती हैं एवं इस
प्रक्रम में ध्वनियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।
‘अब प्रश्न यह भी है कि वह जलों को
हिलाती ही क्यों है? मथती ही क्यों है?
‘मन्थन दो कारणों से किया जाता है।
प्रथम - किसी पदार्थ अथवा किसी तत्त्व को किसी अन्य पदार्थ अथवा तत्त्व में एकरस करने
हेतु, जैसे दुग्ध में शर्करा मिश्रित करने हेतु, अथवा दूसरा - किसी तत्त्व या पदार्थ में मिश्रित किसी
अन्य तत्त्व या पदार्थ को विलग करने हेतु जैसे दधि से नवनीत का पृथक्करण हुआ करता
है। शब्द – कल्पद्रुम के अनुसार - द्रवाणाञ्चैव सर्व्वेषां शुद्धिरुत्प्लवनं
स्मृतम्। प्रोक्षणं संहतानाञ्च दारवाणाञ्च तक्षणम्॥ तक्षति का अर्थ यहाँ उसी
आलोडन-विलोडन से है।
किन्तु इस ऋचा में प्रयुक्त शब्द सलिल का अर्थ यहाँ जल नहीं है। सलिल का तात्पर्य
यहाँ उसी आपोब्रह्म से है जो यदि मुझ मांसभोजी गृध्र की बातें तुम कुछ समय सुनते
रहे, तो समय के साथ तुम्हें स्पष्ट हो जायेगा। अभी तो तुम इस ऋचा में ऋषि ने जो एक
महत्वपूर्ण गणना दे रखी है उसे सुनो। यह जो ऋषि ने तक्षति एकपदी द्विपदी सा
चतुष्पदी, अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्रा कहा है न, वह एक गणितीय सूत्र-सङ्केत है।
एकपदी द्विपदी सा से उसका तात्पर्य है १ + २ = ३। अतः ऋषि ने जिन संख्याओं का
उल्लेख किया है वे हुए तीन, चार, आठ, नौ तथा हजार। इनका तक्षण करो। आलोडन-विलोडन
करो। मथो इनको। किस प्रकार मथोगे? बभूवुषी - बभूव बभूव पुनः पुनः। तात्पर्य? इनका
परस्पर गुणा करके देखो तो! जो संख्या मिलेगी वह है ८,६४,०००। यह संख्या अत्यन्त
महत्वपूर्ण है अतः इसे विस्मृत न करना क्योंकि भविष्य में कुछ और अन्य कूटों को
खोलते हुए इस संख्या का प्रसंग आ सकता है। और फिर ऋषि कहता है अक्षरा परमे –
व्योमन। वह अक्षरमयी, अव्यय-तत्त्वमयी वाग्ब्रह्माणी परम-व्योम में अवस्थित हो
जाती है जिस से समुद्र प्रवाहित हैं, जिसके कारण चारो दिशायें जीवित हैं, जिसके
कारण अक्षर-वृष्टि होती है और जिससे यह सम्पूर्ण विश्व जीवन प्राप्त करता है।’
यह सब सुन कर मैं चौंका। जाने क्यों मुझे भीतर से यह अनुभूति हुई कि यह
व्याख्या तो शाक्त-दर्शन से मेल खाती है। और गृध्र आज जैसे मेरा मन भी पढ़ रहा था।
उसने कहा – ‘उचित ही अनुमान लगाया है तुमने! किन्तु तुम्हारा यह अनुमान एकाङ्गी
है। अपनी चिन्तन-शैली को व्यापक बनाओ। गीता में कृष्ण का वह कथन स्मरण करो जब वे
अर्जुन से कहते हैं – ‘ये यथा माम् प्रपद्यन्ते ताम् तथैव भजाम्यहम्। और कृष्ण का यह
कथन समस्त दर्शन-धाराओं हेतु सत्य है और
इसी कारण वेदों में भी ब्रह्म के सङ्केतक अनेक शब्द हैं।
‘वेदों के सङ्कलन से बहुत पहले ही नाना दर्शन-धाराओं के अनुसार वैदिकों ने
अपने दर्शन के तत्त्वों के नाम ढाल लिये थे तथा प्रत्येक वैदिक को प्रत्येक धारा
के प्रत्येक पारिभाषिक शब्द मान्य भी थे, अतएव वेद विभिन्न मतों का एक ठोस मतैक्य
प्रस्तुत करते हैं। जैसे अब ब्रह्म शब्द को ही लो, तो जिस ब्रह्म को अध्वर्यु
सर्वप्रथम हुआ मान कर अग्रि या अग्नि कहते थे, याजक उसी को यजु कहा करते थे। उसी
ब्रह्म को साम-गायक साम कहते थे तो ऋग्वेदीय या बह्वृच उसी को उक्थ कहते थे।
यातुविद् उसे ही यातु कहते थे तो सर्प-जन उसे ही विष कह कर पुकारते थे। सर्पविद्
उसे ही सर्प अथवा अहि कहते थे तो देवता-गण उसे ही ऊर्ज तथा अमृत कहते थे और ये सभी
नाम सभी को स्वीकृत एवं मान्य थे अतः उनके मन में भेद और संशय नहीं था क्योंकि जो
सर्वप्रथम हुआ वह अग्रि अथवा अग्नि है, तो वही सर्वत्र सभी से युक्त भी है अतः वह
यजु है। जो सभी में समान नामक प्राण-रूप में विद्यमान है वह साम है और जिसके
द्वारा समस्त सृष्टि उत्पन्न है, उत्थापित है, वह उक्थ है। जिसके प्रभाव से सकल
ब्रह्माण्ड संयत रहता है वह यातु है और जो विष के समान चिकित्सा एवं विचिकित्सा
द्वारा आनन्द प्रदान करे वह विष है तो जो सूक्ष्म सर्पाकार कीट (पाठकों हेतु यहाँ शुक्राणु
की आकृति एवं गति ध्यातव्य है) की भाँति समस्त सृष्टि का जनक है वह सर्प है। वही मनुष्यों
के लिए रा है, रयि है, या घन है, तो वही असुरों के लिये माया भी है। वही पितरों का
स्वधा है, देवजनविद् लोगों का देवजन है, गन्धर्वों के लिये वह रूप है और अप्सराओं
का वही गन्ध है।
‘और यह कोई मेरी कल्पना या अनुमान नहीं
है, किन्तु मुझे ज्ञात है कि तुमको प्रमाण चाहिये। तो सुनो! अथर्ववेदी ऋषि, शतपथकार,
मुद्गलोपनिषदकार, सभी इसे बारम्बार दुहराते हैं, अविकल रूप से शब्दशः दुहराते हैं,
किन्तु तुम को उन द्रष्टा ऋषियों के कथनों से क्या प्रयोजन? तुम तो सौर, शाक्त,
शैव, वैष्णव, गाणपत्य, वैदिक, अवैदिक, आगमोक्त, निगमोक्त आदि के सिद्धान्तों को
लेकर परस्पर कलह में उलझे रहो, एक दूसरे को हीन एवं नीच तथा पथभ्रष्ट कहते रहो
क्यों कि आर्यत्व तो तुमलोग खो चुके हो और ढाई वर्णों वाली एक नवीन परिभाषा का
मिथ्या आवरण ओढ़ लिया है। पढ़ो शतपथकार को! वह कहता है - तमेतमग्निरित्यध्वर्यव
उपासते। यजुरित्येष हीदं सर्वं युनक्ति। सामेति च्छन्दोगा एतस्मिन्हीदं सर्वं समानमुक्थमिति
बह्वृचा एष हीदं सर्वमुत्थापयति यातुरिति यातुविद एतेन हीदं सर्वं यतं। विषमिति
सर्पाः सर्प इति सर्पविद ऊर्गिति देवा रयिरिति मनुष्या मायेत्यसुराः स्वधेति पितरो
देवजन इति देवजनविदो रूपमिति गन्धर्वा गन्ध इत्यप्सरसस्तं यथायथोपासते तदेव भवति। तद्धैनान्भूत्वाऽवति
तस्मादेनमेवंवित्सर्वैरेवैतैरुपासीत सर्वं हैतद्भवति सर्वं हैनमेतद्भूत्वाऽवति। – उसी
(विराट् पुरुष) की उपासना समस्त अध्यर्युओं ने अग्निदेव के रूप में की है।
यजुर्वेदीय याज्ञिक उस (देव) को ‘यह यजु: है’ ऐसा मानते हुए सर्व यज्ञीय कर्मों
में नियोजित करते हैं। सामगान वाले उसी को साम के रूप में जानते हैं। इसी (विराट
पुरुष) रूप में निश्चित ही वह सर्वत्र विद्यमान है। सर्प [सर्पः, पुं, (सृप्यते
इति । सृप + घञ् ।) नागकेशरः । इति रत्नमाला ॥ (सृप + भावे घञ् । गमनम् । इति
सृपधात्वर्थदर्शनात् । (सर्पति इतस्ततो गच्छतीति । सृप + अच् ।) (गतिशील प्राण)]
उसे (विराट् पुरुष को ) विष रूप में स्वीकार करते हैं तथा सर्पवेत्ता (योगी)
सर्प-प्राण रूप से उसे प्राप्त करते हैं। देवगण उसे अमृत रूप में ग्रहण करते हैं
तथा सामान्य जन इसे (जीवन) धन समझकर जीवनयापन करते हैं। असुर (इन्हें) माया के रूप
में जानते हैं, पितर
स्वधा (अर्थात पितृ भोजन के रूप में) मानते हैं, देवोपासक इसे देव रूप में स्वीकार
करते हैं, गन्धर्वगण रूप-सौन्दर्य के रूप में जानते हैं तथा अप्सराएँ गन्ध के रूप
में उस (विराट् देवपुरुष) को जानती हैं। (-- शतपथ १०.५.२.२०)।
‘उपनिषदकार ने अविकल रूप से इसे दुहरा कर कुछ और भी लिखा। तं यथायथोपासते
तथैव भवति के पश्चात वह लिखता है - तस्माद्ब्राह्मणः पुरुषरूपं परम्ब्रह्मैवाहमिति
भावयेत्। तद्रूपो भवति। य एव वेद।। कि ब्राह्मण उसी ब्रह्म को पुरुष-रूप में
स्वीकार करता है और तद्रूप हो जाता है। य एव वेद। यह इसी प्रकार जानना चाहिये अथवा
यह वेद वचन है। और वेद-वचन तो है ही यह! यजुर्वेद की वाजसनेयी तथा माध्यन्दिन शाखा
में भी यह ऋषि-वाक्य शब्दशः उल्लिखित है। अब तुमको यह शङ्का होगी कि ब्राहमण उसी
ब्रह्म को पुरुष रूप में अपनाता है इसका क्या तात्पर्य है? तो यह शङ्का तुम्हें इस
कारण होगी कि तुम इसे लौकिक संस्कृत का पुरुष समझ रहे होगे जो पुरुष-स्त्री युग्म
के रूप में तुम जानते हो – नर मनुष्य रूप में, किन्तु यह पुरुष शब्द तो यहाँ उस सहस्रशीर्षा
पुरुष को इङ्गित करता है जिसका वर्णन पुरुष-सूक्त में है। और वही पुरुष, वह
सहस्रशीर्षा पुरुष ही प्रजापति है, और वही संवत्सर-ब्रह्म भी है। इन शब्दों को, इस
भाव को, इस सिद्धान्त को, इस सत्य को, किसने किससे लिया यह समझना कठिन नहीं है
क्योंकि आदि तो वेद ही हैं किन्तु अब, आज के पश्चात् जब भी तुम गन्धद्वारां
दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् का पाठ करना तो इसे स्मरण रखना कि गन्ध शब्द का
भी जो अर्थ लौकिक संस्कृत में है, उस शब्द का वैदिक संस्कृत में वह अर्थ नहीं है।
वैसे भी गन्ध की सूक्ष्मता एवं व्यापकता से तुम अनभिज्ञ तो नहीं ही हो! और जो गन्ध
की भाँति सूक्ष्म भी हो तथा व्यापक भी हो उसे ब्रह्म का पर्याय मानने में कोई
शङ्का तुमको होनी भी नहीं चाहिये।’
सत्य कहूँ तो मुझे बहुत कुछ समझ में आ तो रहा था, किन्तु मैंने अब तक जो
जाना था उससे आज के इस जानने का तारतम्य बिठलाना कठिन अनुभव हो रहा था। विशेषतः तो
मैं उस सङ्ख्या में उलझ कर रह गया था जिसे उस गृध्र ने स्मरण रखने को कहा था।
मैंने सोचा – ‘क्या वास्तव में यह सङ्ख्या इतनी महत्वपूर्ण है?’
क्या आज मेरा मन दर्पण बना था जिसमें मेरे विचारों की छाया स्पष्ट
प्रतिविम्बित होने लगी थी? अथवा यह गृध्र ही कोई इन्द्रजालिक था जो मेरे विचारों
को तत्क्षण पढ़ ले रहा था? कुछ भी हो, किन्तु कहना यही होगा कि उसने मेरे भाव, मेरे
विचार पुनः पढ़ लिए। उसने कहा – ‘तुम उतावले बहुत हो! कहा था न कि समय पर इस संख्या
का रहस्य स्वतः खुल जायेगा? किन्तु तुम अब तक उस सङ्ख्या पर ही शङ्कित मन से अँटके
हो। किन्तु तुम्हारे लिये यहाँ यह ध्यान देने योग्य होगा कि इस सङ्ख्या को स्मरण तो
अवश्य रखना है किन्तु इस सङ्ख्या से चिपक कर बैठ नहीं जाना है! यह सङ्ख्या अनेक
सङ्ख्यात्मक कूटों के भञ्जन में इस प्रकार सहायक है कि जहाँ यह अनेक बार गुणनफल के
रूप में आती है वहीं अनेक बार यह गुणक के रूप में भी आती है तथा इसके गुणनखण्ड भी
उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अतः पुनः कहता हूँ कि वैदिकों की उल्लिखित इस सङ्ख्या का
रहस्य जाने बिना वेदों के अर्थ-निष्पादन में एक गतिरोध आयेगा तथा यदि इस एवं ऐसे
अनेक अन्य कूटों का रहस्य न जाना तो वेदों की गहनता से वेदपाठी का निस्तार नहीं। एक
उदाहरण देता हूँ। सम्वत्सर वास्तव में ब्रह्म का, प्रजापति का या पुरुष का नाम है
और जिसे तुम सम्वत्सर कहते हो वह वास्तव में पुरुष-सम्वत्सर है। इसमें ३६०
अहोरात्र हैं। अब उस संख्या पर विचार करो तो वह इस अहोरात्रों की संख्या से पूर्ण
विभाज्य है। यदि अहः एवं रात्रि को अलग अलग गिनो तो ३६० दिन, ३६० रात्रियाँ, कुल
संख्या ७२०। वह संख्या इस ७२० से भी पूर्ण विभाज्य है। एक अहोरात्र में ३० मुहूर्त
होते है और वह संख्या इस ३० से भी पूर्ण विभाज्य है तथा ३६० अहोरात्रों के ३०
मुहूर्त कुल १०८०० मुहूर्त, तो वह संख्या इस १०८०० से भी विभाज्य है। और यह
सङ्केत-मात्र है। विस्तार से जानना हो तो शतपथ ब्राहमण के दशम काण्ड के चतुर्थ
अध्याय का अवलोकन कर लेना। और इतना ही नहीं, वेदों की ऋचाओं की संख्या भी उक्त
सम्वत्सर-ब्रह्म के नाना विभागानुकूल ही सम्पादित किये जाने की वैज्ञानिक विशेषता
का भी उल्लेख किया उन अनूचान ऋषियों ने! वेदत्रयी की ४,३२,००० ऋचायें बृहती छन्द
में, इतनी ही पंक्ति छन्द में, इतनी ही यजुर्वेद में, इतनी ही साम में और कुल
८,६४,००० मन्त्र ही वेदों में, क्या यह अनायास है? अरे मूर्ख! ‘ऋचो अक्षरे परमे
व्योमन’ का सम्बन्ध भी इसी संख्या से है। किन्तु अभी इसे समय पर छोड़ दो। समय मिला,
और मन हुआ, तो यह गृध्र इन सबकी बातें किसी अन्य अवसर पर करेगा किन्तु अभी तो
आपोब्रह्म की बात करते हैं।
‘नासदीय सूक्त पढ़ा है तुमने कभी? पढ़ा भी हो तो स्मरण तो होगा नहीं? यदि हो
तो सुनाओ तनिक, किन्तु उससे पूर्व थोड़ा समय दो मुझे! तुम्हारे संङ्ग इस वार्ता में
मैं अपना कर्तव्य भूला जा रहा हूँ। मुझे संध्या से पूर्व इस मातरिश्वा का यकृत,
इसका कलेजा खा कर समाप्त भी तो करना है।’
जाने क्यों मैं इस गृध्र के प्रति एक द्विधा-ग्रस्त मानसिकता में आ गया था।
उसका ज्ञान मुझे उसके प्रति श्रद्धावनत रहने को विवश करता था किन्तु उसका व्यवहार,
उसके व्यंग्य, उसका अभिमान, रह-रह कर मेरे मन में यह भाव उत्पन्न करते थे कि यदि
वश में होता तो मैं इसकी तत्काल हत्या कर देता। मुझे मौन देख उस गृध्र ने ही पढ़ना प्रारम्भ कर दिया -
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा
परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः
किमासीद्गहनं गभीरम्॥१॥
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या
अह्न आसीत्प्रकेतः।
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न
परः किं चनास॥२॥
तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं
सर्वमा इदम्।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं
यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥३॥
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं
यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या
कवयो मनीषा॥४॥
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः
स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्।
रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा
अवस्तात्प्रयतिः परस्तात्॥५॥
(ऋग्वेद – दशम मण्डल सूक्त १२९)
इन दोनों उद्धरणों में आपोब्रह्म को ही आदि तत्त्व का प्रथम स्वरूप बताया
गया है जिसे समझने की आवश्यकता है। यह जो कुछ आपोब्रह्म के रूप में व्याख्यायित है
वह क्या है? वह है काम-रूपिणी अप्, रेतोधारी, अक्षरब्रह्म के अक्षरबीज को धारण
करने की महिमा से युक्त, ऊपर तथा नीचे अपनी स्व-धा से युक्त किन्तु निराधार से
स्वयं, स्वयं में ही व्याप्त! उस आपस्तत्त्व से फूट-फूट कर रश्मियाँ ऊपर-नीचे,
चतुर्दिक निकल रही थी जिनमें इतना प्रकाश था कि सर्वत्र अन्धकार सा प्रतीत हो रहा
था। यह कथन तुमको असम्भाव्य प्रतीत हो रहा
होगा किन्तु ऐसा होता है। अत्यधिक प्रकाश में आँखें चुँधिया कर मुँद जाती
हैं और तब अत्यधिक प्रकाश होने पर भी नेत्रों के समक्ष मात्र अन्धकार ही तो बचता
है? अब सुनो! इसी आपोमय आपोब्रह्म से सप्तसागर या सात नदियाँ निकलती हैं। पञ्च-पर्वा
विद्या में पाँच सागर या पञ्चनद हैं, किन्तु सप्तपर्वा विद्या में वे सप्त-सागर
हैं। इसका पारिभाषिक वर्णन ऋग्वेद के सप्तम मण्डल में ९६वे सूक्त में है - ये ते
सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुत:। तेभिर्नोऽविता भव॥ इस ऋचा को कर्मकाण्डी लोग सरस्वती
की उपासना का मन्त्र मानते हैं, वैसे ही, जैसे शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु
पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः।। को शनि के तुष्टीकरण का! और यह गलत है, अशुद्ध है,
व्यर्थ है! और इसी कारण कहा गया कि सभी को वेद पढ़ना वर्जित है। यदि वेद-पाठ के
उपरान्त वेदों की ऋचाओं का सम्यक अर्थ ज्ञात ही न हो सका तो अर्थ के अनर्थ होने से
उत्तम है कि वह अनपढ़ा रहे! किन्तु यदि सम्यक अर्थ ग्रहण करते हुए वेद पढ़ा जाये तो
ऐसा वेदाध्ययन सभी के हेतु आवश्यक एवं अनिवार्य है।
‘अब इसे तनिक समझो! पंचभौतिक अप् या जिसे तुम जलतत्व कहते हो, वह अग्नि-रूप
तृतीय-तत्त्व की ज्वाला अथवा दीप्ति है, जो सूर्यादि पिण्डों में चमकती है। उसी
ताप – रूप अप् से यह भौतिक ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ ऐसा वैदिकों विश्वास है।
पंचभौतिक अप् नहीं समझे? अरे वही पञ्च-भौतिक तत्त्व – क्षिति-पावक-जल, गगन-समीरा। पञ्चतत्त्व
में से एक तत्त्व। अब तनिक सप्तपर्वा विद्या की ओर चलो –
‘अग्नि की सात जिह्वाएँ हैं, ऋषि सात हैं, नद सात हैं, सूर्य की किरणें सात
हैं, उसके अश्व भी सात हैं, रत्न भी सात ही हैं, ऋत्विज सात हैं, होता सात हैं, धातुएं
भी सात ही हैं, यह सब क्या बस ऐसे ही है? नहीं! इन सब में एक कूट छिपा है जिसे
समग्र रूप से न देखने पर वेदों का पाठक सदा भ्रम में ही रहेगा तथा अपनी मूर्खता को
वेदों पर आरोपित करेगा अतः बारम्बार कहता हूँ कि इसी कारण वेद सभी के पढ़ने योग्य
ग्रन्थ नहीं है। तनिक इस ऋचा को भी समझने का प्रयत्न करो!
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा:, द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।
त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आविवेश॥
(ऋग्वेदः ४.५८.३.)
‘चार सींगे हैं, तीन पैर हैं, दो शिर हैं, सात हाथ हैं और यह तीन स्थानों
पर बद्ध है और महान शब्द-ध्वनि करता है ऐसा वृषभमूर्ति महादेव तीन स्थानों से बँधा
हुआ मर्त्य प्रजा में प्रविष्ट हो रहा है।
‘सामान्यतः तो यह ऋचा अग्नि की अभ्यर्थना का है ऐसा माना जाता है जिसका
यास्क ने यज्ञपरक अर्थ किया तो पतञ्जलि ने इसका अर्थ शब्द-विषयक किया तथा आरण्यकों
में इस मन्त्र का अर्थ ॐकार परक व्याख्यायित है। और यह तो उदाहरण मात्र है,
क्योंकि यह मन्त्र भी कूट-परक है तथा इसके अनेक अर्थ हैं जिनमें एक अर्थ आत्मा-परक
भी है। अब यदि तुम्हारे मन में यह शङ्का उभरती है कि इनमें से कौन सा अर्थ सही है और
कौन सा नहीं, तो तुम मूर्ख हो। सारे अर्थ सही हैं किन्तु तब, जब उन्हें
तत्संदर्भित परिप्रेक्ष्य में देखा जाय। इस एक ऋचा के छत्तीस अर्थ हैं तथा उन
समस्त अर्थों के उद्घाटन में ही एक ग्रन्थ बन जायेगा और इतना चीखने की शक्ति नहीं
है मेरे पास! और सबसे बड़ी बात, कि मैं हूँ एक गृध्र! मांस-भोजी! मांस-भोजी ही
नहीं, सड़े-गले मांस का भी भोजी! और तुम्हारे संसार में तो बस चरी-भूसा खाने वाला
ही विद्वान् हो सकता है। मांस खाने वाला तो स्वयं शंकराचार्य समकक्ष भी हो तो वह परम
पातकी है, अतः उसकी बात सुनना ही क्यों? अच्छी और सच्ची बातें तो मात्र घास खाने
वाले ही कर सकते हैं न? तो इतना श्रम कौन करे और क्यों करे कि इस मन्त्र के
छत्तीसों अर्थ तुम्हें बताये? चलो, थोड़ा सा बता देता हूँ!
‘भाषा विषयक अर्थ करें तो इस ऋचा का अर्थ है – शब्द रूपी इस वृषभ के
संज्ञा, क्रिया, उपसर्ग एवं निपात चार सींग हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य इसके तीन
पैर हैं, सात विभक्तियाँ इसके सात हाथ हैं, यह तीन स्थानों छाती, कण्ठ, एवं शीश पर
बँधा है, वह महान शब्द-रूप देवता हम मनुष्यों में प्रविष्ट हो। - यह पतञ्जलि का मत
है।
उधर निरुक्तकार यास्क इसका एक अन्य अर्थ बताते हैं - ‘चारो वेद जिसके सींग
हैं, तीनो सवन जिसके तीन पैर हैं, प्रायणीय एवं उदयनीय जिसके दो शीश है, सातों छन्द
जिसके सात हाथ हैं तथा मन्त्रों, ब्राह्मण ग्रंथों एवं कल्प-सूत्रों में जो निबद्ध
है वह महान देव यज्ञ हम मनुष्यों में प्रविष्ट हो।’
‘गोपथ ब्राह्मण के अनुसार भी इस ऋचा का वही अर्थ है किन्तु ब्राह्मणकार
दोनों शिरों को ब्रह्मौदन एवं प्रावर्ग्य के रूप में स्वीकार करता है।
‘उधर ऋग्वैदिक भाष्य में सायण इस ऋचा को सूर्य से सम्बन्धित मानते हुए
बताते हैं कि ‘चारो दिशाएं जिसके चार सींग हैं, प्रातः, मध्याह्न एवं सन्ध्याकाल
जिसके तीन पैर हैं, दिवस एवं रात्रि जिसके दो शिर हैं, सूर्य की सप्त रश्मियाँ
अथवा सात ऋतुएँ जिसके सात हाथ हैं, भूमि, अन्तरिक्ष एवं द्युलोक इन तीन स्थानों पर
जो बँधा है वह महान सूर्यदेव मनुष्यों में प्रवेश करे।’ किन्तु वही सायण तैत्तिरीय
आरण्यक के भाष्य में इसे प्रणव अर्थात ॐ विषयक मानते हुए कहते हैं कि ‘अकार (अ),
उकार (उ) मकार (म) तथा अर्द्ध्मात्रा (हल् चिह्न) ये चारो प्रणव के अर्थात् ॐ के
चार सींग हैं, अध्यात्म पक्ष में विचार करने पर विश्व तैजस एवं प्राज्ञ तथा
आधिदैवत पक्ष में विचार करने पर विराट्, हिरण्यगर्भ तथा अव्याकृत, ये तीन पाँव
हैं, चित् एवं अचित् शक्तियाँ इसके दो शिर हैं, भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः
तथा सत्यं ये सात व्याहृतियाँ इसके सात हाथ हैं, विश्व, तैजस तथा प्राज्ञ इन तीन
स्थानों पर जो निबद्ध है वह महान परमेश्वर जो बली वृषभ-नाद के समान, प्रणव शब्द
(ॐ) के द्वारा उच्चरित हुआ करता है, हम मनुष्यों
में प्रविष्ट होवे।
तो क्या इसका यह अर्थ लगाया जाये कि जिन विद्वानों ने इस ऋचा का अपने मति
अनुसार जो अर्थ किया है उसके अतिरिक्त इसका अन्य अर्थ उनको ज्ञात नहीं रहा होगा?
नहीं! यद्यपि ऐसा होना भी असम्भव नहीं किन्तु ऐसा मान लेना भी उचित नहीं क्योंकि
किसी भी शब्द की या किसी भी सूत्र की व्याख्या किसी प्रकरण-विशेष से सन्दर्भित रूप
में ही की जा सकती है तथा सम्भव है कि उन विद्वानों ने जो अर्थ नहीं बताया उस अर्थ
से सम्बन्धित कोई प्रकरण अथवा अवसर उन्हें प्राप्त ही न हुआ हो! अतः किसी विद्वान्
ने कोई एक अर्थ बताया तो किसी अन्य ने कोई अन्य अर्थ बताया। इसका तात्पर्य यह नहीं
कि उन मत-भिन्नताओं में कोई परस्पर विरोध है। मत में भिन्नता का अथवा किसी कथन के
अर्थ की भिन्नता का अर्थ प्रत्येक बार विरोध नहीं हुआ करता। यह मान्यता, कि एक नया
अर्थ किसी अन्य अर्थ का खण्डन है, यह भी उचित नहीं है क्योंकि ऐसे प्रकरणों में
एक और विवशता भी है। यदि एक ही मन्त्र के
समस्त अर्थ उद्घाटित करते चला जाय तो इतना विषद ग्रन्थ बनेगा कि स्यात् सात घोड़ों
वाला रथ भी उस ग्रन्थ का वहन करने में समर्थ न हो।’
प्रकरण को संक्षेप में समझो तो यह ऋचा एक प्रहेलिका है जिसमें कौन सा
व्यक्ति इस ऋचा का कौन सा अर्थ ग्रहण कर पाता है यह उस पहेली पूछने वाले ऋषि ने
पहेली बूझने वाले पर छोड़ दिया है।
मैंने यहाँ उन बुढ़ऊ गृध्र महाशय को टोका – ‘तो जब कोई बतायेगा ही नहीं फिर
हम सीखेंगे कहाँ से?’
‘सुनो! युग-युगान्तर व्यतीत हो गये किन्तु अब से पूर्व मुझे किसी से अपने
मन की कह लेने का अवसर नहीं मिला अतः मैं अपनी ही इस एषणा से दग्ध तुमको यह सब
सुना रहा हूँ और मैं यह जानते-बूझते भी सुना रहा हूँ कि तुम इसके अधिकारी नहीं हो।
गौरीर्मिमाय वाले सन्दर्भ में मैंने मुद्गलोपनिषद् का जो कथन उल्लिखित किया था न?
वह वास्तव में पुरुष-सूक्त की व्याख्या है। बहुत छोटा सा उपनिषद है मुद्गलोपनिषद्!
उसमें कहा है - तस्मादेतत्पुरुषसूक्तार्थमतिरहस्यं राजगुह्यं देवगुह्यं गुह्यादपि
गुह्यतरं नादीक्षितायोपदिशेत् । नानूचानाय। नायज्ञशीलाय। नावैष्णवाय। नायोगिने। न
बहुभाषिणे। नाप्रियवादिने। नासंवत्सरवेदिने। नातुष्टाय। नानधीतवेदायोपदिशेत्। इस
पुरुष सूक्त का अर्थ अति-रहस्यमय है, राजगुह्य है, देवगुह्य है, गुह्यादपि गुह्य
है। अतः इसे अदीक्षित को उपदेश नहीं करना चाहिये, जो अनूचान न हो उसे उपदेश नहीं
करना चाहिये, जो यज्ञशील न हो उसे, जो अवैष्णव हो उसे, जो योगी न हो उसे, जो बहुत
बोलता हो उसे, जो अप्रियवादी हो उसे, जो संवत्सर-ब्रह्म को न जानता हो उसे, जो
प्रत्येक दशा में असन्तुष्ट ही रहे उसे, तथा वेदों को जो ठीक प्रकार से न समझ पाता
हो उसे, इसका उपदेश ही नहीं करना चाहिये और तुम तो इनमें से सभी अवगुण धारण करते
हो। अरे मूर्ख! बचपन में माता-पिता हाथ पकड़वा कर अपने बच्चों को लिखना सिखाते हैं
तो क्या जीवन भर के लिये उस बच्चे को यह मान लेना चाहिये कि जब तक कोई हाथ पकड़वा
कर नहीं लिखवायेगा तब तक उसे लिखना ही नहीं है? अथवा मात्र वही लिखना है जो उसे
हाथ पकड़ कर लिखवाया गया या लिखवाया जायेगा? नहीं न? तो अपना समय आने पर अपने
अध्यवसाय एवं सम्यक चिन्तन से कोई समीचीन अर्थ खोजने से तुमको किसने रोका है?
‘चलो! तुम्हारा श्रम तनिक बचा देता हूँ। सायण कहते हैं कि इस ऋचा में जो
‘महो देवो’ है उसको हम पाँच रूपों में ग्रहण कर सकते हैं – अग्नि, सूर्य, आप्, गो,
एवं घृत। और मैं कहता हूँ कि इस ऋचा के कुल छत्तीस अर्थ हैं तथा कम से कम पन्द्रह और
अर्थ तो अवश्य ही हैं तथा उन सभी अर्थों में एक ‘सूक्ष्म एवं गुप्त एकता’ है जो
वैदिक शैली का महात्म्य है। तुमको रहस्य ही बता देता हूँ। समय हो तो अन्य अर्थों
के निष्पादन का स्वयं प्रयास करना। उस पहेली को इस प्रकार समझो –
(_,__,_,_-(१)) ये चार जिसके चार
सींग हैं, (_,__,__(२)) ये तीन जिसके तीन पाँव हैं, (__, तथा ___(३)) जिसके दो शिर
है, (_,_,__,__,__,_,_(४)) ये जिसके सात हाथ हैं, जो ( _, __, __(५)) नामक तीन
स्थानों पर निबद्ध है, जो (_____(६)) का सेचन करता है वह (_____(७)) जैसा शब्द
करने वाला महान देव हम मनुष्यों में प्रविष्ट हो।
अब इन रिक्तियों में प्रकरण-विशेष
से चुन कर शब्द विशेष भर दिया जाय तो इस ऋचा के कई चमत्कारिक अर्थ सम्मुख आते
जायेंगे। गुह्याद्गुह्यतरम् महत् वेद की यही गुप्त विद्या-शैली है।’
अब कम से कम सात गणों की परिकल्पना
करो। ये सात गण क्या हैं? यह सात गण वे हैं जिनको ऋषि ने इस ऋचा का देवता कहा है। और
यह भी स्मरण रहे कि जिस ऋचा का जो देवता बताया गया है या बताये गये हैं, सम्बन्धित
ऋचा में उसका ही वर्णन है चाहे वह स्पष्ट रूप से हो अथवा अस्पष्ट रूप में। इन
देवताओं के आधार पर ही अलग-अलग विचार करने पर उनके सन्दर्भ में इस ऋचा का एक नवीन
अर्थ निकलेगा। वे गण हैं आत्म, यज्ञ, मन्त्र, शब्द, सूर्य, काल, तथा धर्म। अन्य गण
भी हैं किन्तु उनका अन्वेषण मैं तुम पर छोड़ता हूँ।
ध्यान दो कि इस प्रहेलिका में सात
ही रिक्तियाँ हैं। उनको क्रम से चिह्नित कर लो। अब प्रथमतः आत्म-गण के सम्बन्ध में
विचार करो। प्रथम रिक्ति में जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुर्या, इन चारों को
स्थान दो। द्वितीय रिक्ति में सत्, रज एवं तम को भरो। तृतीय रिक्ति में चित् एवं
अचित् को, चतुर्थ रिक्ति में सत्ता, कल्पना, आनन्द, महत्, प्रजनन, तेज एवं सत्व
को, पञ्चम रिक्ति में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों को, षष्ठम में अभौतिक बल,
तथा सप्तम में शब्द-स्फुरण को रख कर देखो! इन रिक्ति-पूर्तियों से इस मन्त्र का जो
अर्थ उभर कर आयेगा वह इस प्रकार होगा - जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुर्या ये
चार जिसके चार सींग हैं, सत्, रज एवं तम ये तीन जिसके तीन पाँव हैं, चित् एवं
अचित् जिसके दो शिर है, सत्ता, कल्पना, आनन्द, महत्, प्रजनन, तेज एवं सत्व ये
जिसके सात हाथ हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों नामक तीन स्थानों पर जो निबद्ध
है, जो अभौतिक बल का सेचन करता है वह शब्द-स्फुरण जैसा शब्द करने वाला महान देव हम
मनुष्यों में प्रविष्ट हो। ऋषि ने यह किसका वर्णन किया? निस्संदेह आत्मा का! आत्मा
की शक्तियाँ ही जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुर्या नामक चार अवस्थाओं में कार्य
करती हैं, सत, रज एवं तम रूप त्रिपाद से उसका सञ्चलन है, चित् एवं अचित् ही आत्मा
के दो शीर्ष हैं जिनसे स्थावर एवं जंगम का भेद स्पष्ट होता है, सत्ता, कल्पना आदि
सप्त-शक्तियों से ही वह आत्मा शरीर को अपने इच्छित कार्यों में नियुक्त करता/करती
है, जिसे स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में निबद्ध रहना पड़ता है, किन्तु शरीर को
अभौतिक बल यही आत्मा ही देती है तथा गुप्त शब्द-ब्राह्म की ओर सङ्केत भी, यदि देती
है, तो यह आत्मा ही देती है, अतः आत्मा ही वह महान देव है। साधारण मनुष्यों में यह
परतन्त्र सी वास करती है किन्तु ऋषि की प्रार्थना है कि वह स्वतन्त्र रूप से अपने
उद्देश्य में सफल होने की शक्ति लिये हम मर्त्यों में प्रविष्ट हो!
यज्ञ-गण के दृष्टिकोण से विचार करो
तो उन रिक्तियों की पूर्ति क्रमशः (१) ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ एवं देवयज्ञ,
(२) अध्यात्मिक, अधिभौतिक एवं अधिदैविक, (३)अकर्म एवं कर्म, (४) सप्त-होतारः सात
होता, (५) विचार, उच्चार एवं आचार, (६) यज्ञ-सुफल, तथा (७) प्रेरणा के शब्द, इनके
द्वारा करनी होगी। मन्त्र-गण की दृष्टि से इन रिक्तियों की पूर्ति (१) ऋक्, यजु,
साम एवं अथर्व, (२) प्रथम, मध्यम, एवं उच्च स्वर, (३) परोक्ष एवं अपरोक्ष विषय, (४)
सातो वैदिक छन्द, (५) उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित, (६) ज्ञान एवं (७) शब्द, इन से
करनी होगी। शब्द-गण के सन्दर्भ में ये रिक्तियाँ क्रमशः नाम, आक्ख्यात, उपसर्ग एवं
निपात, फिर भूत, भविष्य एवं वर्तमान ये तीनों काल, नित्य एवं कार्य ये दोनों
उद्देश्य, फिर सात विभक्तियाँ, फिर छाती, कंठ एवं शिर ये तीन उद्भव-स्थल, फिर
ज्ञान और अन्त में वक्तृत्व अथवा लेखन, इनसे भरी जायेंगी। सूर्य गण के सन्दर्भ में
इनको चारो दिशाओं, त्रिकाल, प्रकाश एवं अन्धकार, सप्त-रश्मियों, पृथ्वी, अन्तरिक्ष
एवं आकाश (अन्तरिक्ष एवं आकाश ब्भिन्न संज्ञायें हैं), प्रकाश एवं गति से
व्युत्पन्न शब्द, इनसे प्रतिस्थापित करना होगा। काल-गण के सन्दर्भ में इन्हें
त्रिकाल सहित अकाल, ग्रीष्म, वृष्टि एवं शीत, आदि तथा अन्त, सात ऋतुयें, प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या, आयु
तथा इनके ज्ञान की प्रेरणा के शब्द, इनसे भरना होगा। धर्म-गण की दृष्टि से विचार
करने पर चारो पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष, फिर ज्ञान, क्रिया एवं भक्ति,
फिर अभ्युदय एवं निःश्रेयस फिर श्रद्धा-दया-संतुष्टि-क्रिया-मेधा-तितिक्षा एवं
शान्ति इन सात से, फिर अगली रिक्ति को स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना से, फिर अगली
रिक्ति को उत्कर्ष से तथा अंतिम रिक्ति को प्रेरणा से पूरित करना होगा।
अब इन रिक्ति-पूर्तियों से उपजे इस
मन्त्र का अर्थ तुम स्वयं लगाते रहना और यह भी स्मरण रखना कि इतने पर ही इति नहीं
है किन्तु सबको उद्घाटित करना मुझ मांस-भोजी हेतु न तो शक्य है, न ही समीचीन! किन्तु
स्मरण रहे! जिस सड़े मांस को चखने भर से तुमको दूषीविष (फ़ूड-पॉइजनिंग) हो जाता है
न? उसी सड़े मांस से हम गृध्र अपना पोषण चूस लेते हैं! निकृष्ट से उत्कृष्ट के दोहन
की कला हम गृध्रों को ही आती है। और आज तुमको मांस का तात्पर्य भी बता ही देता
हूँ! मा शब्दात् रसना ज्ञेया, तं दशान् रसना-प्रियान्। एतद् यो भक्षयेद् देवि, स
एव मांस-साधकः।। मा शब्द रसना-प्रिय पदार्थों का ही नामांतर है। रसना का अर्थ
जिह्वा है यह बताने की आवश्यकता तो नहीं? तो स्वाद-प्रियता का परित्याग कर, जिह्वा
हेतु अरुचिकर पदार्थों का भोग ही मांस-साधन है। काल-पर्यन्त उपेक्षित पड़ा पुरातन
वाङ्मय का वाक् जो आज सडा हुआ मांस हो चुका है, उसे तुम खा सकोगे? किन्तु हम खाते
हैं और उसी से अपनी तुष्टि एवं पुष्टि प्राप्त करते हैं। तुमको टटका वाक्-शाक
प्रिय है, तो रहे, किन्तु उसमें पुष्टि नहीं है। तुम कुकुरमुत्ते शब्दों में
प्रोटीन खोजते रहो, यही तुम्हारी नियति है। किन्तु सुनो! जब मैं अपने प्रवाह में
होता हूँ तो बोलते-बोलते बहुत कुछ बोलने की धुन में विषय से भटक जाया करता हूँ। ऐसे
में तुम मुझे टोक दिया करो!’
यह वही गृध्र कह रहा था? वही, जो
अब तक पल- प्रतिपल अपने शब्दों से मुझे संत्रास देता रहा है? नहीं! उसकी वाणी
कर्कश-कर्णकटु तो है, किन्तु उपेक्षणीय नहीं है। मुझे मेरी पितामही की सिखवन स्मरण
हो आयी। उन्होंने कहा था – ‘पिता, गुरुजनों एवं सूर्य, इनका ताप एक जैसा ही हुआ
करता है - कभी अत्यन्त क्षीण तो कभी अत्यन्त प्रखर। जब इनका ताप प्रखर हुआ करता है
तब असह्य सा हो उठता है किन्तु इस ताप को सहन करने का अभ्यास करते हुए इसे अपनी
प्रवृत्ति बना लो। स्मरण रहे! इनके होने पर इनका ताप असह्य भले प्रतीत हो किन्तु
इनके न रहने पर, इनके अवसान हो जाने के उपरान्त, जीवन में भी एवं जगती में भी, जो
अन्धकार व्याप्त होता है वह अन्य किसी भी माध्यमों एवं स्रोतों से पूर्णतः नहीं
मिटा करता, क्योंकि अन्य माध्यमों एवं स्रोतों के स्नेह एवं प्रकाश की परास उतनी
व्यापक नहीं हुआ करती।’
मैंने कहा था न? इस गृध्र को बोलने
का व्यसन था। क्षणिक मौन के उपरान्त उसने मातरिश्वा की कुक्षि में अपनी चोंच
प्रविष्ट करके एक वृहत् यकृत-खण्ड नोंच कर निकाल लिया तथा दो-तीन प्रयासों में
उदरस्थ करने के पश्चात् पुनः बोला – एक बात बताओ! दिवश्चिदग्ने महिना पृथिव्या
वच्यन्ताम् ते वह्नयः सप्तजिह्वाः।। ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के छठे सूक्त की
द्वितीय ऋचा का यह उत्तरार्ध अग्नि की सात जिह्वाओं की बात करता है तथा अग्नि हेतु
ऋषि ने वह्नि संज्ञा का प्रयोग किया है। हे अग्ने! अपनी महिमा से पृथ्वी तथा
द्युलोक में वह्नि-रूप तेरी सात जिह्वायें – वच्यन्ताम् - घोषणायें करें! सातो
जिह्वाओं से एक घोषणा नहीं, सातों की सात घोषणायें! और वह्नि संज्ञा वाहक की
विशेषण तो है ही! तो वह्नि की सप्तार्चियाँ जिन सात घोषणाओं की वाहक हैं, वे क्या
हैं?’
मैं क्या कहता? कुछ ज्ञात हो तब
तो?
किन्तु मैंने किसी वरिष्ठ से सुना
था (या उनका लिखा कहीं पढ़ा था) कि श्रेष्ठ-जन जब कोई प्रश्न करते हैं तो इसका
तात्पर्य सदैव यह नहीं कि वे तुम्हारी परीक्षा लेना चाहते हों! हो सकता है कि वे
उस प्रश्न के माध्यम से तुमको कुछ बताने हेतु तुमको सजग कर रहे हो! और इस बार ऐसा
ही था। गृध्र ने मुझसे उत्तर की अपेक्षा
की ही नहीं। वह बोलता गया – ‘इसका उत्तर साङ्केतिक रूप से तृतीय मण्डल के प्रथम
सूक्त की चतुर्थ ऋचा में पहले ही सङ्कलित है। अवर्धयन्सुभगं सप्त यह्वीः श्वेतं
जज्ञानमरुषं महित्वा। शिशुं न जातमभ्यारुरश्वा देवासो अग्निं जनिमन्वपुष्यन्॥ जिस
प्रकार घोड़ियाँ एक नवजात अश्व को चतुर्दिक घेरे रहती हैं उसी प्रकार सात नदियाँ उस
भाग्यशाली को घेरे हुए उसे बढाती हैं जो अपनी उत्पत्ति के समय तो श्वेत था किन्तु
पश्चात अपने ही महत्व से अरुण अर्थात लाल हो गया। इस मन्त्र में यह संकेत है कि
अश्व-शिशु को बीच में रख कर जिस प्रकार घोड़ियाँ उनके चतुर्दिक रहते हुए उस शिशु की
रक्षा करती हैं उसी प्रकार अग्नि को मध्य में रख कर उसके चतुर्दिक सात नदियाँ
प्रवाहित हैं जो अपने प्रवाह के साथ इस भाग्यशाली अग्नि को क्रमशः बड़ा करती हैं,
उस अग्नि को जो प्रारम्भ में तो श्वेत था किन्तु बाद में अपनी ही महत्ता से लाल हो
गया।
ऋषि यह भी कहता है –
सप्त ऽ ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदम्
अप्रमादम् ।
सप्तापः स्वपतो लोकम् ईयुस् तत्र जागृतो ऽ
अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ ॥
(शुक्ल यजुर्वेद, अध्याय ३४, मन्त्र ५५)
प्रत्येक शरीर में सात ऋषि रहते
हैं जो इस अप्रमादित रह कर गृह का संरक्षण करते हैं। ये सप्तापः - सप्त-आपः –
आपस्तत्त्व के सात प्रवाह सुषुप्त आत्मा के लोक में पहुँचते हैं तथा इस सत्र में,
इस प्रयोजन में, इस यज्ञ में, अस्वप्नजौ – कभी न सोने वाले, सदैव जाग्रत, दो देव
हैं। यह मन्त्र क्या इंगित करता है? कि प्रत्येक शरीर में सात ऋषियों का निवास है
जो इस शरीर रूपी गेह का संरक्षण कर रहे होते हैं, सात नदियों का प्रवाह भी इसी
शरीर में ही है जो हैं तो बहिः-प्रवाहित किन्तु सुषुप्ति की दशा में
अन्तः-प्रवाहित हो जाती हैं तथा आत्मा के वास-स्थान तक वापस जाती हैं, और यह जीवन
एक सत्र है, एक शत-साम्वत्सरिक यज्ञ, जिसमें उन्ही सप्त-धाराओं के तट पर, जिन
धाराओं का प्रवाह जागृति की अवस्था में बहिर्मुख एवं सुषुप्ति की अवस्था में
अंतर्मुख हुआ करता है, उन्हीं के तट पर, सात ऋषि यज्ञ कर रहे हैं, जो कुछ काल तक
सोते हैं तथा कुछ काल तक जाग रहे होते हैं किन्तु, इस सत्र के रक्षक दो देव सदैव
जाग्रत रह कर संरक्षण में नियत रहते हैं।
‘ये सात नदियाँ कौन हैं? यही अग्नि
की सप्तार्चियाँ है। किन्तु वह स्थान कौन सा है जहाँ केन्द्र में अग्नि हो तथा उसे
घेर कर सात नदियाँ प्रवाहित हों? अब भाष्यकारों का दिया ज्ञान मत छेरने लगना
क्योंकि मुझे ज्ञात है कि किसी ने उस स्थान को पंजाब में चिह्नित किया, तो किसी ने
मध्य एशिया में और किसी ने उत्तरी ध्रुव पर। किन्तु इस सम्पूर्ण धरा तो क्या सकल
ब्रह्माण्ड में भी कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ केन्द्र में प्रज्ज्वलित एक
अग्नि-पुञ्ज हो जिसे घेर कर सात जल-धारायें प्रवाहित हों। ऐसा कोई स्थान भौगोलिक
दृष्टि से है ही नहीं! किन्तु वैदिक ऋषि ने उस स्थान की सूचना इसी ऋचा में स्वयं जब
स्वयं दे दी है तो तुमको इन भाष्यकारों के भटकाव के साथ क्यों भटकना चाहिये?
किन्तु इसमें एक रहस्य है।
‘ऋषि का तात्पर्य है कि वह अग्नि-पुञ्ज है
आत्मा, जो पिण्ड-मध्य में है। इस आत्मा से ही उद्गम है अहंकार, मन, श्रोत्र,
स्पर्श, नेत्र, रसना तथा नासिका के सात प्रवाहों का! केन्द्र एक है – वही आत्मा!
किन्तु इन प्रवाहों का प्रवाह-क्षेत्र भिन्न है। अहंकार की नदी इतर घमण्ड के
क्षेत्र से हो कर प्रवाहित है तो मन का नद मनन के, विचारों के क्षेत्र में
प्रवहमान है। श्रोत्र की नदी कानों के माध्यम से शब्दों एवं ध्वनियों की भूमि में
बह रही है तो स्पर्श की नदी त्वचा के माध्यम से स्पर्श के क्षेत्र में प्रवाहित
है। नेत्र के नदी दृष्टि के माध्यम से रूप एवं आकर के दर्शन के क्षेत्र में बह रही
है, रसना की नदी जिह्वा के माध्यम से रुचि एवं स्वाद का क्षेत्र सींच रही है और नासा
की नदी नासिका के माध्यम से गन्ध के क्षेत्र को प्लावित कर रही है। प्रत्येक
प्रवाह का क्षेत्र भिन्न, प्रत्येक का जल भी भिन्न तथा प्रत्येक का स्वभाव भी
भिन्न, किन्तु सभी का उद्गम एक! और ये सातो उस आत्मा को ऐसे ही घेरे हैं जैसे सात
घोड़ियाँ किसी नवजन्मा अश्व-शिशु को घेर कर खड़ी या बैठी हों। अब विशेष यह है कि देह
की जागृति में इनका प्रवाह बहिर्मुख हुआ करता है किन्तु सुषुप्ति की अवस्था में ये
सभी केन्द्र की ओर लौट जाती हैं, आत्म-तत्त्व की ओर उन्मुख हो जाती हैं। तुम
स्पष्ट अनुभव करोगे कि इन सातों का सजग एवं क्रियाशील होना ही जागृति है तथा इनका निष्क्रिय
होना ही सुषुप्ति। या तुम इनका व्युत्क्रम भी कह सकते हो कि जागृति में आत्मा में अहं-भाव,
विचार-ग्राह्यता, ध्वनि-विश्लेषण, संस्पर्श-भेद, रूप एवं आकृति का ज्ञान, स्वाद-ग्राह्यता,
एवं गन्ध-अनुभव विद्यामान रहते हैं जो सुषुप्ति की दशा में लुप्त हो जाते हैं। इन
सप्त-प्रवाहों के तट पर एक-एक अधिष्ठाता ऋषि है और वे सातो ऋषि इस जीवन-रूपी
महायज्ञ में यजन कर रहे हैं। देह की सुषुप्ति वही स्थिति है जब ये सातो ऋषि थक कर
सो रहे होते हैं किन्तु उनके सोते समय भी दो देव सदा जाग्रत रहते हुए इस
शत-साम्वत्सरिक यज्ञ का रक्षण करते हैं। वे दो देव कौन हैं? वे हैं श्वांस एवं
उच्छ्वास! जन्म से मृत्यु तक इन दोनों में से कोई कभी विराम नहीं लेता और जब ये
विराम लेते हैं तब ही मृत्यु घटित होती है। अतः ये देव उस यज्ञभूमि का संरक्षण कर
रहे होते हैं जिसे देह कहते हैं जहाँ जीवन नामक शत-सम्वात्सरिक-यज्ञ चलता रहता है।
अतः यह ऋचा एक पहेली के रूप में हमारी काया का ही वर्णन कर रही है।
‘अब वह अग्नि प्रारम्भ में श्वेत तथा पश्चात्
रक्तिम वर्ण हो जाती है इस का क्या तात्पर्य? श्वेत वर्ण सत्व-गुण का प्रतीक है
तथा रक्तिम वर्ण रजस का। जन्मना आत्मा में सतोगुण ही हुआ करता है। यही कारण है कि
लोक में बच्चे भगवान् का रूप होते हैं यह उक्ति प्रचलित है। भोगों के साथ
संश्लिष्ट आत्मा रजोगुणी हो जाती है जिसका सङ्केत ऋषि ने अरुषं महित्वा कह कर
किया। और इस ऋचा में तो नहीं कहा, किन्तु अत्यन्त प्रसिद्ध ऋचा है - अजामेकां
लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः। अजोह्येको जुषमाणोऽनुशेते
जहात्येनां भुक्तभोगामजोन्य।। शुक्ल, लोहित एवं कृष्ण वर्णा तीन रंगों से
युक्त कबरी (चितकबरी) बकरी तुल्य अजा, प्रकृति सत् रज तम, तीनों
गुणों से युक्त है।‘एकल्’यह
प्रकृति रूप अजा‘एका’ है। इस
अजा का सेवन करता हुआ, कल्प-कल्पान्तर से शुक्ल, लोहित, कृष्ण वर्णा अजा का अनुसरण करता हुआ
कोई-कोई अज, अ-ज,
अजन्मा, अर्थात वही आत्मा रूप जीव, जन्म-जन्मान्तर, युग-युगान्तर, संसार
जाल में भटकता हुआ उसमें अपना प्रयोजन सिद्ध कर उसको त्याग देता है। इस त्रिगुणवती
एका अजा ने अनेक चितकबरे बच्चे उत्पन्न किये। महत्-तत्त्व, अहं-तत्त्व, षोड़श
विकार ही अजा रूपी प्रकृति के बच्चे हैं। ये सब बच्चे सुख-दुख-मोहात्मक हैं। तात्पर्य
कि सत, रज तम
मय हैं। जीव प्रकृति द्वारा ही विभिन्न भोगों को भोग कर प्रकृति द्वारा ही ज्ञान
को प्राप्त कर संसार से विरक्त हो पाता है, हो जाता है, तथा उस तत्त्व ज्ञान प्राप्ति
का साधन भी प्रकृति ही है – तेषां प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये। सा विद्या
परमामुक्तेहतुभूता सनातनी।। और यह उपनिषद्-वाक्य है।
#संलग्न_चित्र_को_ध्यान_से_देखें_एवं_इस
व्याख्या_को_समझने_का_प्रयत्न_करें।
‘इसी
प्रकार सात किरणों, सात रत्न, सात धातु, सात घोड़े आदि सभी के सन्दर्भ में ऋचायें
हैं वे आत्मा से ही सम्बन्धित हैं भले ही गौण रूप से उनके द्वारा अन्य भाव भी
व्यक्त होते हैं जैसे –
आ यस्मिन्त्सप्त रश्मयस्तता यज्ञस्य नेतरि। मनुष्वद्दैव्यमष्टमं
पोता विश्वं तदिन्वति।। (ऋग्वेद २/५/२) – जिस यज्ञ के नेता के भीतर सात किरणों की
अभीषु (लगाम) तनी है वह नेता पवित्रकर्मा मनुष्य देवतामय विश्व को अष्टम हो कर
धारण करता है। यहाँ वह नेता आत्मा ही है जो उस काया का शतसाम्वत्सरिक यज्ञ
निष्पादित कर रहा होता है जिसके भीतर सात रश्मियों के रूप में वही सात अहंकार आदि
अभीषु हैं जिनका उल्लेख किया जा चुका है।
इसी प्रकार दमे-दमे सप्त रत्ना
दधानो ऽग्निर् होता नि
षसादा यजीयान्।। (ऋग्वेद ५/१/५) घर घर में सात प्रकार के रत्नों को धारण करने वाला
अग्नि यज्ञ करता हुआ बैठा है। यहाँ सात रत्नों को धारण करता हुआ वह अग्नि आत्मा ही
है तथा वे रत्न वही सात शक्तियाँ हैं। वही शक्तियाँ शरीर के साथ मुख्य धन हैं, वही
सप्त-धातु हैं, वही सप्त-वाजि हैं, वे ही सात ऋत्विज हैं। एक और बड़े ही आनन्द की
ऋचा है – दुहन्ति सप्तैकामुप द्वा पञ्च सृजतः । तीर्थे सिन्धोरधि स्वरे।। (ऋग्वेद ८/७२/७) – एक गाय
का सात ग्वाले (द्वा पञ्च) दोहन करते हैं जिनमें से दो अन्य पाँचों को प्रेरित
करते हैं। स्वर-युक्त सिन्धु के तीर्थ पर यह घटना निरन्तर हो रही है। अब तीर्थ नदी
के तट को भी कहते हैं। यदि कोई सिन्धु नदी के तट पर उस गाय तथा उन ग्वालों को
खोजने चले तो क्या पायेगा? किन्तु यदि इस ऋचा का अलङ्कारिक कूट समझ में आ जाये तो
अर्थ अत्यन्त सरल है कि मन तथा अहंकार ये दोनों अन्य पाँचों इन्द्रियों को प्रेरित
करते हैं तथा आत्मा रूपी गौ से ये सातों अपने लिये अपनी रुचि के अनुरूप दुग्ध-दोहन
कर रहे हैं और वह आत्मा रूपी गौ उनको उनके रुचि-अनुरूप दुग्ध प्रदान भी कर रही है।
और वह स्वर-युक्त सिन्धु है हमारी काया।
‘इतने
वर्णन से तुमको यह आभास हो गया होगा कि वेदों में जो मन्त्र एवं ऋचायें किसी को शिरो-पाद-विहीन
उक्तियाँ प्रतीत होती हैं उनका अर्थ कितना गहरा है, अतः वेदों को पढ़ने तथा उनकी
ऋचाओं का अर्थ लगाने हेतु एक आवश्यक पूर्वबन्ध यह भी है कि उन्हें पढ़ने वाला एवं उनका
अर्थोद्घाटन करने वाला बहुज्ञ होना चाहिये, उसकी दृष्टि व्यापक होनी चाहिये, उसका
चिंतन सार्वभौम होना चाहिये। दूसरों की कथरी बिछा कर अपना व्यास-पीठ बनाने वाले वेदों
के आवरण-फलक तो दूर, आवरण-वस्त्र तक को स्पर्श करने का दुस्साहस न ही करें तो
उत्तम है क्योंकि उनके द्वारा जो स्थूल एवं अशुद्ध अर्थ का वमन कर दिया जाता है
उसे स्वच्छ करना ही एक जुगुप्सा-जनक कार्य है और फिर उस घृणित परिस्थिति को
धो-पोंछ कर शुद्ध अर्थ की प्रस्तुति तो अत्यन्त ही कठिन हो जाती है।
उस
गृध्र को इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं थी कि मैं उसकी बातें समझ भी रहा हूँ अथवा
नहीं। समझना तो दूर, उसे यह भी चिन्ता न थी कि मैं उसकी बातें सुन भी रहा हूँ अथवा
नहीं। वह तो जब जी में आये बोलने लग जाता था और जब जी मे आये तब बोलते-बोलते रुक
कर प्रमथ्यु-मातरिश्वा की कुक्षि में अपनी टेढ़ी चोंच चुभा कर उसके यकृत का एक
टुकड़ा नोंच कर चुभलाने लगता था। प्रमथ्यु के प्रति मेरी संवेदनायें चुकी नहीं थीं,
किन्तु अब मुझे इस गृध्र पर भी दया आने लगी थी। इतना ज्ञानी हो कर भी यह गृध्र इस
प्रकार किसी जीवित शरीर से नोच-नोच कर रक्त-सना कलेजा खाने को विवश क्यों है? क्या
दण्ड मात्र प्रमथ्यु को ही मिला है? यह गृध्र भी तो एक दण्ड, एक शाप ही भोग रहा
है।
कुछ
क्षणों के मौन के पश्चात वह पुनः बोला – ‘बूढ़ा हो गया हूँ स्यात्! थक जाता हूँ। और
तुम्हारे भ्रम-जाल काटना इतना सहज कार्य भी तो नहीं है! तो उन्ही जाल-तन्तुओं को
काटते कहीं से कहीं निकल भी जाता हूँ। प्राकृत विषय पर पुनः लौटते हैं। देखो! अब
तक तुम्हारे मस्तिष्क में आपस्तत्त्व की एक स्थूल रूपरेखा बन चुकी होगी किन्तु
स्पष्ट कहें तो वह स्थूल रूपरेखा उस तत्त्व को समझने हेतु पर्याप्त नहीं है। इस
आपस्तत्त्व की सर्वोत्तम व्याख्या ब्राह्मण-ग्रंथों ने दी है। शतपथ ब्राह्मण कहता
है - सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत भूयान्त्स्यां प्रजायेयेति सोऽश्राम्यत्स
तपोऽतप्यत स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मैव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्यां सैवास्मै
प्रतिष्ठाऽभवत्तस्मादाहुर्ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठेति तस्मादनूच्य
प्रतितिष्ठति प्रतिष्ठा ह्येषा यद्ब्रह्म तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत –
सोऽपोऽसृजत (सो आपो असृजत)। वाच एव लोकाद्वागेवास्य साऽसृज्यत सेदं
सर्वमाप्नोद्यदिदं किं च यदाप्नोत्तस्मादापो यदवृणोत्तस्माद्वाः। – शतपथ० काण्ड ६,
अध्याय १, ब्राह्मण १, ८ – ९। जिससे
स्पष्ट है कि सप्त-पुरुषी प्रजापति ने सर्वप्रथम इस आपः तत्त्व की सृष्टि की जो वह
तत्त्व है जिसमें समस्त बीजत्मायें समाहित हैं। जिसमें आप्तता है, विश्वस्तता है,
धैर्य से एवं बिना किसी सनादेह के जिसपर भरोसा किया जा सकता है, जो संरक्षण हेतु
चारों ओर से चौकन्ना है वह अप् है, अतः वह आत्मा ही है जो वास्तव में वाग्ब्रह्म
है या शब्दब्रह्म है या ब्रह्म की पत्नी रूप वाग्ब्रह्माणी है, ब्रह्म की प्रथम
आधेयात्मा है जिसका स्वरूप वज्र सा, , श्री के समान, कान्तिवत, शिर या शिखर
जैसा मधु-वैद्युत समान शोभा वाला है। इसी
कारण शतपथकार ने इसके लिये कहा – वज्रो वाऽआपः, श्रीर्हि वै शिरः, आदि। यह तत्त्व
ऋषियों के अनुसार इतना महत्वपूर्ण था कि बृहदारण्यक उपनिषद् का तो प्रारम्भ ही इसी
की चर्चा द्वारा होता है। विभिन्न ब्राह्मण-ग्रन्थों एवं उपनिषदों में कहीं इसे
अमृत तो कहीं उत्स, कहीं शान्ति, कहीं भेषज, कहीं रस, कहीं ओषधियों का रस, कहीं
श्रद्धा, कहीं, मेधा, कहीं वज्र, कहीं वीर्य, कहीं अर्क, कहीं सूर्य, कहीं देवी,
कहीं तेज, कहीं वरुण की पत्नियाँ आदि लिखा है और इस दृष्टिकोण से लिखा है कि
आपस्तत्त्व यह है या वह है इसमें कोई भेद नहीं। आपस्तत्त्व इनमे से एक भी है और
सभी भी। इसे समझने में अध्ययन से अधिक सहायक चिंतन एवं मनन होगा अतः अब आगे बढ़ते
हैं।
आपोब्रह्म का अपना एक सप्तक है और उस सप्तक के
अनुसार सात सागर माने गये हैं। इस सम्बन्ध में एक श्लोक है – इक्षु नीर घृतं चैव
पयो दधि मधुस्तथा। लवणं सप्तमं ज्ञेयं
सागराः सप्त कीर्तिता।। ईख के रस का, जल का, घृत का, दूध का, दही का, मधु का तथा
लवण का, ये सात सागर हैं। अब विद्वान् भूगोल-वेत्ता सारी पृथ्वी छान आये किन्तु
उनको ये सातो सागर तो मिले नहीं। मिलेंगे भी नहीं! क्योंकि यह भौगोलिक सागरों का
वर्णन है ही नहीं! यह वैदिक-दर्शन के सागर हैं जिनका उचित क्रम दूध, दही, घृत,
मधु, नीर, इक्षु-रस तथा लवण सागर है। यह रहस्य खुलता है छान्दोग्य उपनिषद् में
जहाँ इनमें से प्रथम पाँच को ग्रहण कर के पाँचों को अमृत कहते हुए पञ्चामृत की
अभिकल्पना दी हुई है तथा इनका विभाजन क्रम से वसुओं, रुद्रों, आदित्यों, मरुतों
एवं साध्य-ऋषयों में किया गया है। इन
पाँचों अमृत में से प्रथम वसुओं का है तथा अंतिम साध्य ऋषयों का। इन्ही को क्रमशः
पयस् आहुति, आज्याहुति, सोमाहुति, मेदाहुति एवं मध्वाहुति कहा जाता है। ये सभी वैदिक
– दर्शन के भाव-तत्त्व हैं जिनका उपयोग तुम लोग कर्मकाण्ड में लौकिक पदार्थों दूध,
दही, घी, मधु तथा जल मिला कर बने पदार्थ रूप में किया करते हो। दार्शनिक रूप में
ये लौकिक पदार्थों से बने नहीं हैं तथा ये भिन्न भी नहीं हैं। ये सभी सातों सागर
ईख के रस के भी हैं, जल के भी, दुग्ध के भी, दधि के भी, घृत के भी, मधु के भी, नमक
के भी, और सोम के भी। एक में सभी हैं तथा
सभी में एक है और ये ही एक-एक या मिल कर आपो-ब्रह्म से ले कर खं ब्रह्म तक की
परिभाषा रचते हैं। इसी में आपोदेवता नामक वैदिक संज्ञा का रहस्य निहित है और यही
कारण है कि यजुर्वेदी ऋषि ने “ॐ पयः पृथिव्यां पय ऽ ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो
धाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्।” - कह कर पृथ्वी में, ओषधियों में, अन्तरिक्ष
में, सर्वत्र, पोषक एवं दिव्य पयस् सागर के विद्यमान होने की भावना की, तथा ऋग्वैदिक
ऋषि ने “मधु वाता ऋतायते मधुं क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः।। मधु
नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ।। मधुमान्नो
वनस्पतिर्मधुमान् अस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु नः।।” कह कर देवताओं में मधु
का सागर उमड़ते रहने की प्रार्थना की जिसे तुम लोग आज भी यज्ञ-पूजनादि में स्वस्ति-वाचन
एवं प्रार्थनाओं के रूप में दुहराते हो। दार्शनिक रूप में जल से लेकर लवण तक के इन
सातो स्निग्ध अमृत-रसों का वह सप्त-सागर जिससे आपोदेवता तृप्त हुआ करते हैं उस
आपोब्रह्म से सम्बन्धित है।
अब शेष रहा आपोदेवियों से संदर्भित प्रकरण, तो
इसके लिये ऋग्वेद के दशम मण्डल के बयासीवें सिक्त की पांचवीं एवं छठवीं ऋचा सुनो
जो कहती है –
परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति।
कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र
देवाः समपश्यन्त विश्वे।।
तमिद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः
समगच्छन्त विश्वे।
अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि
भुवनानि तस्थुः।।
पूर्वार्द्ध से परे
तथा पृथिवी से परे (या उत्तरार्द्ध से परे) द्यावा-पृथिवी है। इन दोनों से पृथक,
एक मध्यवर्ती स्थान पर आपोदेवियों ने अपने गर्भ (हिरण्यगर्भ) में कं नामक प्रजापति
को धारण किया। इस कं नामक प्रजापति के गर्भ में आने पर सभी देवता अपने भौतिकात्मा
के मौलिक स्वरूप में दिखायी देने लगे। और जब आपो-देवियों ने उस (तम्) को (इद्
गर्भं) गर्भ में धारण कर लिया तथा भौतिकात्मा का मौलिक स्वरूप प्रदान करा दिया तब
उस परमब्रह्म की इस नाभि में या मध्यवर्ती तत्त्व में अखिल ब्रह्माण्ड के अनन्त
लोक भौतिक स्वरूप को प्राप्त हो कर, विद्यमान दिखायी देने लगे।’
अचानक मुझे ऋग्वेद के
दशम मण्डल के बहत्तरवे सूक्त की दो ऋचायें स्मरण में आ गयीं –
यद्देवा अदः सलिले सुसंरब्धा अतिष्ठत ।
अत्रा वो नृत्यतामिव तीव्रो रेणुरपायत।।
यद्देवा यतयो यथा भुवनान्यपिन्वत ।
अत्रा समुद्र आ गूळ्हमा सूर्यमजभर्तन ।।
(जब उक्त देवता अपनी भौतिकात्मा के दैवी स्वरुप के सागर में संक्षुब्ध
हुए तब उस संक्षुब्ध भौतिकात्मा के दैवी सागर से एक रेणु का उदय हुआ जो अत्यन्त
तीव्र गति से नाच रहा प्रतीत होता था। तब देवताओं ने अखिल आसुरी भौतिक ब्रह्माण्ड
की रचना हेतु एक ग्रहण-ग्रस्त सूर्य के समान प्रजापति का रूप धारण किया।)
किन्तु फिर मैंने सोचा कि नहीं! यह गृध्र जो कह रहा है उसका सम्बन्ध
इस ऋचा से नहीं होना चाहिये। किन्तु वह गृध्र तो विचित्र ही था। वह तत्क्षण बोल
उठा – ‘है सम्बन्ध! हिरण्यगर्भ, प्रजापति, देवता, भौतिकात्मा तथा भौतिक ब्रह्माण्ड
इन सभी के उदय के क्रम में ही यह ऋचा है। जिसे रेणु कहा गया वह मात्र एक
सूक्ष्मता-बोधक शब्द है क्योंकि कितना सूक्ष्म, यह कह कर बता सकना असम्भव है,
किन्तु था वह अति-सूक्ष्म। उसी को व्यक्त करते हुए कृष्ण ने गीता में कहा –
एकांशेन स्थितो जगत्। और उसी का वर्णन करते हुए ऋग्वेद के दूसरे मण्डल में २७वें
सूक्त की प्रथम ऋचा है - इमा गिर आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि
। शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः। आज के वैज्ञानिक युग
में इस रेणु नामक संज्ञा का क्या प्रमाण होना चाहिये इसकी कल्पना कठिन नहीं है।
तुम्हारी धरती के ही एक वैज्ञानिक ग्लासेर ने फेन-प्रकोष्ठ में परमाणु के विखण्डन
से प्राप्त प्रोटोन के भी तीस भाग कर के उनका चित्र उतारा था, किन्तु यदि प्रोटोन
के तीस नहीं, कुल चार अरब बत्तीस करोड़ भाग किये जा सकें तब उनमें से एक भाग रेणु
के समकक्ष होगा और हो सकता है कि उसका चित्र न अंकित हो सके, किन्तु कौन जाने कि
उन फेन लहरियों का चित्र लेने के प्रयास में एक मधु-उर्मिमान दृश्य का चित्र
उपलब्ध हो जाय?
‘अतः
आपोदेवियाँ वह दार्शनिक तत्त्व है जिनके गर्भ से वैदिकों द्वारा कं ब्रह्म की
उत्पत्ति मानी गयी। इस प्रकार आपोब्रह्म, आपस्तत्त्व, आपोदेवता एवं आपो देवियों
में परस्पर एक विराट अन्तर है किन्तु आपः का अर्थ जल मान कर भाष्यकारों ने सबकुछ
एक में मथ कर धर दिया। अब यह तुम्हें सोचना है कि जब तुम श्री-सूक्त का पाठ करते
समय आपः सृजन्तु स्निग्धानि वाली ऋचा का पाठ करते हो तब तुम्हारी भावना में इस ऋचा
का क्या अर्थ रहा करता है? और यदि आपस्तत्त्व को समझे बिना तुम इस ऋचा का पाठ करते
हो तो यह शुक-सारिकादि प्रभृत शब्दोच्चारण मात्र के अतिरिक्त और क्या है? किन्तु
रुको! तनिक ऋग्वेदीय देवी सूक्त की आठवीं ऋचा स्मरण करो तो! और सोचो!
अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव।।
इतना कह कर उस गृध्र ने प्रमथ्यु की कुक्षि से
उसके यकृत का सम्भवतः अन्तिम टुकड़ा खींच निकाला और वीभत्स रूप से कचर-कचर करते हुए
चबाने लगा। मैं एक मतिभ्रम से ग्रस्त हुआ सोच रहा था – “कहाँ वैदिक ऋचायें, कहाँ
श्री सूक्त और कहाँ देवी सूक्त की आठवी ऋचा?” मुझे विश्वास था कि वह गृध्र मेरी
शङ्काओं का अनुमान लगा लेगा और अभी कोई मर्म-वेधक वाक्य बोल उठेगा, किन्तु मैं प्रतीक्षा
ही करता रहा और मैंने देखा – मर्मान्तक वेदना से मातरिश्वा, जो प्रमथ्यु था, अचेत
सा हो गया था तथा वेदना से हुए लोमहर्षण के साथ उसके केश सप्तार्चियाँ बन उद्दीप्त
हो गये थे और वह गृध्र यकृत का वह रक्त-प्लुत खण्ड निगलने के पश्चात् अपनी चोंच से
उन सप्तार्चियों को सँवार रहा था।
(
यद्यपि इस आलेख में लेखक स्वयं कहीं भी उपस्थित
नहीं है किन्तु उस गृध्र के भीतर संभवता कोई समुपदेश-वासना भी थी जो अतीव बलवती
शक्ति होती है, अतः वार्ता के क्रम में ही कभी उसने बताया था कि स्नान करते समय एक
अञ्जलि जल लेकर भावना सहित ऋग्वेद के दशम मण्डल के नवम सूक्त के तृतीय ऋचा - “तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो
जनयथा च नः॥३॥” का पाठ करके अञ्जलि के जल को स्नान के जल में मिला कर उस जल से
स्नान करने से व्यक्ति की सात्विक बुद्धि में वृद्धि तथा उसके पापों का ह्रास होता
है तथा वंश-वृद्धि भी होती है। अनेक अनुष्ठानों के उपरान्त भी अपत्यहीन रहे जन इस
मन्त्र का प्रयोग कर के लाभ ले सकते हैं किन्तु इस ऋचा-पाठ से लाभ लेने का एक
पूर्वबन्ध है। जल-प्रदूषण एवं जल का अपव्यय करने वालों को इस ऋचा का यह मन्त्र-पाठ
फलित नहीं होता।
असाध्य रोगों से ग्रसित व्यक्ति द्वारा जल पीते
समय या ओषधि लेते समय इसी सूक्त के ‘शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि
स्रवन्तु नः।।’ इस ऋचा का पाठ करने से रोगी की जिजीविषा एवं रोगों से लड़ने की
आन्तरिक शक्ति में वृद्धि होती है तथा उपचार में प्रयुक्त ओषधियों का प्रभाव कई
गुणा बढ़ जाता है। ध्यान दें कि शनि-ग्रह की अभ्यर्थना के रूप में इस ऋचा का पाठ एक
रूढ़ि मात्र है जो न जाने कब, कैसे तथा क्यों प्रचलन में आ गयी। यह मन्त्र
आपस्तत्त्व की अभ्यर्थना का है, शनि ग्रह की अभ्यर्थना का नहीं। इसी प्रकार ‘ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो
घृतश्चुत:। तेभिर्नोऽविता भव॥’ मन्त्र भी सरस्वती-उपासना में कोई लाभ नहीं दे सकता
अतएव तदर्थ यह मन्त्र निष्प्रयोज्य है।
अन्ततः यह स्वीकार करना आवश्यक है
कि जब मैं गृध्र-वाणी ही लिख रहा हूँ तो जो उसने कहा था, मैंने लिख दिया है। उसके
द्वारा किये रहस्योद्घाटन एवं सत्योद्घाटन को अङ्कित कर देना मेरा लेखनी-धर्म था
अतः मैंने किया। उसे स्वीकार करना, या न करना आपका व्यक्तिगत विशेषाधिकार है। गीता
भी कहती है – स्वधर्मे निधनम् श्रेयः। अतः आप अपने धर्म का पालन करें, किन्तु
परिवाद या विवाद में मेरी कोई रुचि नहीं क्योंकि उसके हेतु एक सुदीर्घ
शास्त्रार्थ-सत्र चाहिये जिसका अवकाश मेरे पास नहीं है और वह गृध्र तो अब मिलने से
रहा, कि उससे स्पष्टीकरण प्राप्त किया जा सके, अतः आप अपनी मान्यता पर दृढ़ रहें
तथा एक मांस-भोजी गृध्र के वचनों को अवहेलित करने की कृपा करें।
)
क्रमशः .
. .
© त्रिलोचन नाथ तिवारी.