सोमवार, 6 जुलाई 2026

 बहुत कठिन है डगर पनघट की।    

          चैत्र चित्त को उद्वेलित करता है क्योंकि चैत्र मृण्मय को चिन्मय की ओर तथा चिन्मय को मृण्मय की ओर आकर्षित करता है। चैत्र शक्ति-तत्व की उपासना एवं शक्तिमान के आविर्भाव का मास है। चैत्र नवरात्रियों का मास है और राम के जन्म का मास है। राम, श्री राम, भगवान् राम, जिनके जन्माङ्ग में पाँच ग्रह उच्च के थे।

          चैत्र की पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र में होता है, इसमें किसी को कोई शङ्का नहीं। नक्षत्र-मण्डल में अश्विनी के प्रारम्भ को शून्य अंश मानते हुए चित्रा नक्षत्र का भाग है १७३ अंश २० कला से १८६ अंश ४० कला तक। अर्थात् राशि चक्र में कन्या के अन्तिम नवांश से ले कर तुला के प्रथम तीन नवांशों तक। और चन्द्रमा की दैनिक गति एक नक्षत्र प्रति दिन लगभग है अर्थात् लगभग १३ अंश २० कला। तो पूर्णिमा से सात दिन पूर्व शुक्ल पक्ष नवमी को वह कहाँ स्थित रहा होगा?

चित्रा से ७ × (१३ अंश २० कला) = ९३ अंश २० कला पीछे अर्थात्

१७३ अंश २० कला - ९३ अंश २० कला = ८० अंश ०० कला से

१८६ अंश ४० कला - ९३ अंश २० कला = ९३ अंश २० कला तक  

८० अंश ०० कला से ९३ अंश २० कला तक का क्षेत्र पुनर्वसु नक्षत्र का भाग है तथा इस नक्षत्र के प्रारम्भिक तीन चरण मिथुन में तथा अंतिम एक चरण कर्क राशि में होते हैं।  

          यदि चैत्र पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा में होगा, जो कि होगा ही होगा, तो उस तिथि को सूर्य कहाँ होना चाहिये? चित्रा से एक सौ अस्सी अंश पर, ३५३ अंश २० कला से ०६ अंश ४० कला के मध्य। और सूर्य की दैनिक गति है एक अंश, तो पूर्णिमा से सात दिन पूर्व शुक्ल पक्ष नवमी को वह कहाँ रहा होगा? सात अंश पीछे, ३४६ अंश २० कला से ३५९ अंश ४० कला के मध्य कहीं? और ३४६ अंश ४० कला पर तो उत्तरा भाद्रपद समाप्त हो जाता है और रेवती प्रारम्भ हो जाती है। अर्थात् चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी को सूर्य की स्थिति किस नक्षत्र में होती है, अथवा होनी संभावित है? या तो उत्तरा भाद्रपद में अथवा रेवती में। अधिकतम संभावना रेवती की ही है। तदनुसार राशि कौन सी हुई? मीन!

          अब चैत्र मास की पूर्णिमा को चन्द्राधीष्ठित नक्षत्र चित्रा के अतिरिक्त कोई अन्य हो नहीं सकता, क्योंकि इसी कारण तो चैत्रमास का नाम चैत्र है, तो चैत्र शुक्ल नवमी को सूर्य अधीष्ठित नक्षत्र भी नहीं बदल सकता। वह उत्तरा-भाद्रपद अथवा रेवती ही रहेगा और ये दोनों नक्षत्र मीन राशि का ही भाग रहेंगे। अतः श्री राम के जन्माङ्ग में सूर्य होना चाहिये रेवती नक्षत्र, मीन राशि का। किन्तु क्या रेवती नक्षत्र, मीन राशि वाला सूर्य उच्च का हो सकता है? सूर्य तो मेष राशि में उच्च का होता है, अश्विनी नक्षत्र में, दश अंशों पर! मीन राशि के सूर्य को उच्च कैसे कहा जा सकता है?

          तो क्या यह निष्कर्ष निकाला जाय कि श्री राम के जन्माङ्ग में सूर्य उच्च का नहीं था? क्या आदिकवि वाल्मीकि ने श्री राम के जन्माङ्ग का मिथ्या वर्णन किया है?

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट् समत्ययुः।
तत्श्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।।
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्व लोकनमस्कृतम्।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्।।
          यज्ञ समाप्ति के पश्चात (पुत्रेष्टि यज्ञ) जब छः ऋतुएँ बीत गयीं तब, बारहवें मास में, चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अदिति नक्षत्र अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्र चतुर्थ चरण, मध्यान्ह बेला /अभिजित मुहूर्त और कर्क लग्न में जब पाँच ग्रह (रवि, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि) अपने-अपने उच्च स्थान पर विद्यमान थे तथा लग्न में बृहस्पति चन्द्रमा के साथ थे, कौशल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। यह आदिकवि वाल्मीकि कहते हैं और वाल्मीकि ने गाथा नहीं लिखी थी! उन्होंने इतिहास लिखा था! तो क्या उनका यह वर्णन मिथ्या है?

          चलिये देखते हैं इसे थोड़ी देर में! अभी तो एक अन्य ही विकट प्रश्न सम्मुख है। द्वादश मास का उल्लेख क्यों किया आदिकवि ने?

          वेद की जगह लबेद घुसाड़ने वालों द्वारा बारहवें मास की व्याख्या में इस बारहवें मास को “बैशाख से गिन कर बारहवाँ मास चैत्र हुआ” यह बताने और स्थापित करने का प्रयास होता है, किन्तु जब प्रथम मास चैत्र है तो बैशाख से क्यों गिनना?

          यदि आपने मेरा आश्विन को कुआर क्यों कहते हैं वाली पोस्ट पढ़ी हो (यदि नहीं पढ़ी तो आपको पढ़ना चाहिये!) तो आपको स्मरण होगा कि सौर मासों के मूल नाम राशियों के नाम पर हैं और मेष संक्रान्ति से प्रारम्भ हो कर मेष मास से बारहवाँ सौर मास मीन मास है, जो चान्द्र-मास चैत्र के तुल्य अवधि में ही पड़ता है। और इस प्रकार सौर-मासों में जो प्रथम मास “मेष मास” है वह चान्द्र-मास के अनुसार बैशाख ही हुआ। तो बात तो उचित है कि बैशाख से गिना जाय, किन्तु यह तर्कतः उचित नहीं है क्योंकि इससे जो भ्रम उत्पन्न होता है वह सिद्धान्त-ज्योतिष को कुप्रभावित करता है। अतः बैशाख मास से नहीं, मेष मास से गिनना! सीधा तात्पर्य यह कि यहाँ आदिकवि का तात्पर्य चान्द्र-मास से नहीं सौर-मास से गणना करने का है तथा यहाँ बारहवें मास से आदिकवि का तात्पर्य सौर-मास मीन मास से है। तिथि की अभिव्यक्ति हेतु तो चान्द्र मास चैत्र है ही। क्यों? क्योंकि तिथियों का नियामक सिद्धान्त सूर्य से चन्द्रमा की १२ अंशों की दूरी पर आधृत है। बिना चान्द्र-मास का उल्लेख किये तिथि कैसे बताते आदिकवि?

          कवित्व तुकबन्दी नहीं है। कवित्व का मूल-पूर्वबंध है बहुज्ञ होना! और उस बहुज्ञता में ज्यौतिष का ज्ञान भी सन्निहित है, तथा इतिहास स्पष्टता का प्रबल-आग्रही होता है अतः वाल्मीकि ने सौर-मास एवं चान्द्र-मास दोनों का स्पष्ट उल्लेख किया तथा बारहवाँ मास कह कर उन्होंने यह भी स्पष्ट ही बता दिया कि सूर्य मीन राशि में ही था।

          अब यदि सूर्य मीन में था तो वह आज की प्रचलित मान्यताओं एवं ज्योतिष के सिद्धान्तों के अनुसार उच्च का नहीं था। तब आदिकवि ने ‘स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु’ कैसे लिख दिया? पाँच ग्रह उच्च के कैसे हुए? बुध तथा शुक्र जब भी होंगे तो सूर्य के सन्निकट, कुछ आस-पास ही होंगे, अधिकतम एक राशि आगे या एक राशि पीछे, और तब शुक्र तो यदि मीन में हुआ तो उच्च का हो जायेगा (१) किन्तु बुध तो नहीं हो सकता! मीन या उसके निकटवर्ती कुम्भ या मेष तीनों में से किसी में भी बुध उच्च का नहीं हो सकता! उधर चन्द्रमा कर्क में स्वगृही था, अर्थात् उच्च का नहीं था, हाँ! गुरु  चंद्रमा के साथ उच्च राशि में अवश्य था (२)। राहु और केतु की उच्च या नीच राशि उल्लेखन में आती ही नहीं, तो बचे मंगल, शनि एवं सूर्य। मंगल मकर में उच्च हो सकता है (३), शनि तुला में (४), कुल चार ही ग्रह तो हुए उच्च के! क्या इसमें कोई भ्रम है?

          अवश्य है, किन्तु बाल्मीकि के कथन में नहीं, हमारे समझने में!

          कोई ग्रह उच्च का होता कब है?  

 

सूर्यसिद्धान्त, जिसकी सुहराने में ज्योतिषियों को आनन्द ही आनन्द  है, ही कहता है –

 

दूरे स्थितः स्वशीघ्रोच्चाद ग्रहः शिथिलरश्मिभिः

सव्येतराकृष्टतनुर्भवेद्वक्रगतिस्तदा। 

(सूर्य सिद्धान्त स्पष्टाधिकार श्लोक ५२)

 

और श्रीयुत् भास्कराचार्य अपने सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थ के ग्रहगोलाध्याय – छेकाधिकार में कहते हैं –

 

भ्रमन् ग्रहः स्वे प्रतिमण्डले नृभिः स यत्र कक्षावलये विलोक्यते।

स्फुटो हि तत्रास्य फलोपपत्तये प्रकल्पितं तुङ्गमिहाद्यसूरिभिः॥१९॥

यः स्यात् प्रदेशः प्रतिमण्डलस्य दूरे भुवस्तस्य कृतोच्चसंज्ञा।

सोऽपि प्रदेशश्चलतीति तस्मात् प्रकल्पिता तुङ्गगतिर्गतिज्ञैः ॥२०॥

उच्चाद्भषट्कान्तरितं च नीचं मध्यः स्वनीचोच्चसमो यदा स्यात् ।

कक्षास्थमध्योपरि कर्णसूत्रपाताद स्फुटो मध्यसमस्तदानीम् ॥२१॥

उच्चस्थितो व्योमचरः सुदूरे नीचस्थितः स्यान्निकटे धरित्र्याः ।

अतोऽणुबिम्ब: पृथुलथ भाति भानोस्तथासन्नसुदूरवर्ती ॥२२॥

 

          दूरेभुवस्तस्य कृतोच्च संज्ञा - जो दूर होते हैं उनकी संज्ञा उच्च है। एवं, उच्चस्थितो व्योमचरः सुदूरे - अर्थात् ग्रह जब सबसे दूर हों तब वे उच्चस्थित कहे जाते हैं तथा - नीचस्थितः स्थान्निकटे धरित्र्याः - जब पृथ्वी के सन्निकट होते हैं तब – नीच कहे जाते हैं। अतः कोई ग्रह कब उच्च का होता है और कब नीच का इसका यह शास्त्रीय प्रमाण तो झुठलाया नहीं जा सकता न?

          किन्तु छोडिये इसे। दो पिण्डों में सर्वाधिक आकर्षण बल कब होता है? और दो पिण्डों के आकर्षण बल का सूत्र क्या है? दो पिण्डों के मध्य का आकर्षण बल दोनों के द्रव्यमान के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। स्मरण है F = m1.m2/r.r ?

          दूरी बढ़ेगी, आकर्षण घटेगा। दूरी घटेगी, आकर्षण बढ़ेगा। बिहाइंड द साईट इज बिहाइंड द माइंड। प्रेमी-जन दीर्घ-वियोग से अनायास भयभीत थोड़े न रहिते हैं! किन्तु ज्यौतिष के सिद्धान्त प्रेम-सिद्धान्तों से नियमों में सादृश्य रखते हों तो हों, परिणाम तो कुछ विरुद्ध ही है। प्रेम में आकर्षण घटता है तो परस्पर-प्रेम-प्रभाव क्षीण होता है किन्तु ग्रहों के सन्दर्भ में? ग्रहों के सन्दर्भ में आकर्षण बल घटेगा तो अपने परिक्रमा-पथ पर किसी ग्रह की रेखीय गति कम हो जायेगी, उसकी कोणीय गति भी मन्द हो जायेगी और तब वह ग्रह किसी विन्दु-विशेष को, किसी पिण्ड-विशेष को, किसी व्यक्ति-विशेष को, किसी राशि-विशेष को अपेक्षाकृत अधिक समय तक प्रभावित कर सकने में सक्षम होगा।

          और केप्लर के नियम? कि प्रत्येक ग्रह सूर्य के परितः एक दीर्घवृताकार पथ पर गति करता है, सूर्य उस दीर्घवृत्त के किसी एक नाभि पर होता है तथा किसी ग्रह के कक्षीय तल में ग्रह तथा सूर्य को मिलाने वाली रेखा समान समयांतराल में समान क्षेत्रफल तय करती है।

          अर्थात् ग्रह तथा सूर्य को मिलाने वाली रेखा की क्षेत्रफलीय चाल नियत रहती है। 

          अर्थात् जब ग्रह अपनी कक्षा में सूर्य से दूर होता जाता है तब उसकी कोणीय गति कम होती जाती है और जब वह अपनी कक्षा में सूर्य से निकट होता है जाता है तब उसकी कोणीय गति बढ़ती जाती है और जब वह सर्वाधिक दूर होता है तब उसकी गति न्यूनतम तथा जब वह सर्वाधिक निकट होता है तब उसकी गति अधिकतम होती है।

          केप्लर ने सिद्धान्त लिख कर नाम कमा लिया और हमारे ऋषि टापते रह गये। क्यों? क्योंकि उनकी सन्ततियाँ अकर्मण्य थी, दास थीं अन्यथा जिस समय न्यूटन एवं केप्लर के पूर्वज जङ्गलों में नग्न घुमते थे उस समय हमारे गणितज्ञ गुरुत्व एवं ग्रहचार के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने के उपरान्त उन सिद्धान्तों का नित्य-उपयोग करते थे। स्वयं सोचिये! वराहमिहिर-भास्कराचार्य तो छोडिये, ये तो आर्ष-सिद्धान्तों के उपयोगकर्ता मात्र थे, वेदों में ज्योतिष-सिद्धांत प्रतिपादित कर गये मन्त्र-द्रष्टा-प्रभृति विद्वान् कब हुए? और ये न्यूटन – केप्लर कब जन्मे? हमने स्वयं के हाथों अपनी दुर्दशा की पटकथा लिखी और हम अब तक नहीं सुधरे हैं! हमने “जो हो रहा है उसे होने दो” की नीति का अनुसरण किया और कर रहे हैं, अतः आश्चर्य नहीं कि जिन तथ्यों एवं सत्यों की ओर मेरा इङ्गित है, उसे निकट भविष्य में ही कोई पश्चिमी-विदूषक अपना सिद्धान्त कह कर ख्याति-लब्ध हो जाये!  

          ग्रह की अपने कक्षापथ पर सर्वाधिक कम गति से गतिमान होने की स्थिति ही उस ग्रह की उच्च स्थिति हुआ करती है और ग्रह की यह उच्च स्थिति तब होती है जब वह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर हो। यही, ग्रह की उसकी कक्षा में सूर्य से सर्वाधिक दूर वाली स्थिति, जब उस ग्रह का आकर्षण एक निश्चित समय-अवधि में अपनी न्यूनतम गति के कारण किसी विन्दु या पिण्ड के सापेक्ष अधिक समय तक रहता है, उस ग्रह की उच्च स्थिति होती है। इसके ठीक विपरीत, जब ग्रह अपनी कक्षा में सूर्य से निकटतम बिन्दु पर होता है तब उस पर आरोपित आकर्षण बल अधिकतम होता है जिसके कारण उसकी गति बढ़ी हुई होती है अतः किसी विन्दु या पिण्ड के सापेक्ष उसका आकर्षण कम समय के लिये होता है। यही उस ग्रह की नीच स्थिति है। आज किसी ग्रह की अपने कक्षा में सूर्य से दूरस्थ बिन्दु पर पहुँचने को #अपसौर तथा सूर्य से निकटतम बिन्दु पर पहुँचने को #उपसौर कहते हैं। ग्रह की अपसौर स्थिति ही उसका उच्च बिन्दु है तथा उपसौर स्थिति ही उसका नीच बिन्दु है जो अपसौर स्थिति से या उच्च स्थिति से ठीक १८० अंश पर होता है।

          वास्तव में यह शब्द उच्च अपने मूल रूप में उच्च है भी नहीं! करण-ग्रंथों में इसके लिये शब्द है #मन्दोच्च! वह बिन्दु जब ग्रह की गति मन्दता की उच्चतम स्थिति पर हो! करण अथवा गणित का यही मन्दोच्च होराशास्त्र का उच्च है। और इसके विपरीत स्थिति वाले बिन्दु हेतु करण-शब्द है #शीघ्रोच्च - वह विन्दु जब ग्रह की गति शीघ्रता की उच्चतम स्थिति पर हो! इसे ही होराशास्त्र में उच्च का उलटा नीच कह लिया गया।

          वराहमिहिर ने अपने समय-काल में ग्रहों की कक्षा में उनकी अपसौर एवं उपसौर स्थिति की गणना की थी। तब सूर्य (सूर्य की गति वास्तव में पृथ्वी की गति है) का अपसौर-विन्दु मेष राशि के १० अंश पर अश्विनी नक्षत्र के तृतीय चरण में मिला, चन्द्रमा की वृष राशि के ३ अंश पर कृतिका के द्वितीय चरण में, मङ्गल की मकर राशि के २८ अंश पर धनिष्ठा के द्वितीय चरण में, बुध का कन्या राशि के १५ अंश पर हस्त के द्वितीय चरण में, गुरु का कर्क के ५ अंश पर पुष्य के प्रथम चरण में, शुक्र का मीन के २७ अंश पर रेवती चतुर्थ चरण में, और शनि का अपसौर, अर्थात् उच्च तुला के २० अंश पर स्वाति चतुर्थ चरण में प्राप्त हुआ। इनसे ठीक एक सौ अस्सी अंश पर इनका उपसौर अर्थात नीच बिन्दु था। और तभी से ज्योतिष में ग्रहों हेतु सूर्यादि क्रम से सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि हेतु मेष, वृष, मकर, कन्या, कर्क, मीन तथा तुला रूढ़ हो गये। अब हो गये तो हो गये। वराहमिहिर का लिखा है तो उचित ही होगा, परिशुद्ध ही होगा अतः अनुकरण में होरा-सिद्धान्त लिखने वालों ने इसे प्रामाणिक माना और अपने फलित अनुभव के आधार पर फलित-ग्रन्थ लिखते रहे।

          किन्तु वराहमिहिर ने इन बिन्दुओं की गणना क्या वास्तव में स्वयं की थी? मुझे संदेह है और इस संदेह के अपने विशिष्ट कारण हैं।

          कालान्तर में ज्योतिष का अन्धकार-काल आया और बाबा वाक्यं प्रमाणं चलता रहा तो चलता चला आया।

          किन्तु,मैत्रायणी उपनिषद में कहा गया है कि मघा से धनिष्ठा के आधे भाग तक सूर्य दक्षिण अयन में तथा धनिष्ठा के शेष आधे भाग से आश्लेषा तक उत्तर अयन में होता है। वेदांग ज्योतिष भी इसी की पुष्टि करता है।

आश्लेषार्धादासीद्यदा निवृत्तिः किलोष्णकिरणस्य।

युक्तमयनं तदाऽऽसीत् साम्प्रतमयनं पुनर्वसुतः।। पञ्चसिद्धान्तिका, अध्याय ३

अतः स्पष्ट है कि प्राचीन काल में कभी सूर्य आश्लेषा नक्षत्र के आधे भाग पर ही दक्षिणायन हो जाता था जो वराहमिहिर के अनुसार उनके समय में कर्क राशि के प्रारम्भ में पुनर्वसु नक्षत्र में होने लगा था। क्या आज भी होता है? नहीं न? और वराहमिहिर भी अपनी वृहत्संहिता में कहते हैं -

आश्लेषार्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं रवेर्धनिष्ठाद्यम्।
नूनं कदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु।।

साम्प्रतमयनं सवितुः कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत्।

उक्ताभावो विकृतिः प्रत्यक्षपरीक्षणैर्व्यक्तिः।।

          आश्लेषार्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं रवेर्धनिष्ठाद्यम् - सूर्य आश्लेषा नक्षत्र के आधे भाग पर ही दक्षिणायन हो जाता था - कदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्वशास्त्रेषु – पूर्व-शास्त्रों में उल्लिखित है कि कभी हुआ करता था! साम्प्रतमयनं सवितुः कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत् – वह (दक्षिणायन) अब कर्क राशि के प्रारम्भ में पुनर्वसु नक्षत्र में होने लगा है। स्वयं वराहमिहिर कहते हैं कि होता था कभी वह जो शास्त्रों में लिखा है, किन्तु अब नहीं होता। और एक अत्यन्त महत्व की बात उन्होंने और कही कि - उक्ताभावो विकृतिः प्रत्यक्षपरीक्षणैर्व्यक्तिः – यदि इसमें भी कभी विकृति हो तो व्यक्ति को प्रत्यक्ष परीक्षण करके ज्ञात कर लेना चाहिये। एक विषय के सम्बन्ध में वराहमिहिर ने जो कहा उसका तात्पर्य क्या है? समय के साथ हो रहे परिवर्तन को प्रत्यक्ष-परीक्षण के अनुसार समञ्जित-संशोधित करते रहना चाहिये!

          करता है कोई? नहीं! और प्रश्न पुनः वही! क्यों करे? कैसे करे?

          ये विषुव-विन्दु, ये अयन-विन्दु, ग्रहों के ये उच्च तथा नीच बिन्दु, और ज्योतिष के उपयोगी ऐसे ही सभी विन्दु   परिवर्तित होते रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? और ऐसा होता ही क्यों है?

          क्योंकि, खमण्डल में ही नहीं, सकल सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं है और उनकी अस्थिरता को साधने के जो मानव-निर्मित सूत्र हैं वे भी स्थिर नहीं हैं। मात्र ग्रह ही अपने कक्षा पथ पर सूर्य की परिक्रमा नहीं करते, उनका कक्षा-पथ भी अपने नाभि के, उनके परवलयाकार कक्षा-पथ की उस नाभि के परितः जिस नाभि पर सूर्य है, घूमता है। सत्य है कि यह गति अत्यन्त मन्द है, कुछ वर्षों या कुछ सौ वर्षों में इनका लक्षित होना सम्भव नहीं है, किन्तु गति है इनमें भी, और दीर्घकाल में इसका प्रभाव दिखता भी है। पृथ्वी के सम्बन्ध में उत्तरायण एवं दक्षिणायन, विषुव, सम्पात आदि भिन्न-भिन्न काल में भिन्न बिन्दुओं पर, भिन्न तिथियों में होते रहे हैं और होते रहेंगे। इसका अन्य कारणों के साथ एक कारण यह भी है कि पृथ्वी के परिक्रमा-पथ की कक्षा भी १० विकला ३६ प्रतिविकला की वार्षिक गति से उसी दिशा में, जिस दिशा में पृथ्वी का परिक्रमण होता है, अर्थात पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है और इसी कारण, पृथ्वी के अयनांत विन्दु के साथ पृथ्वी का अपसौर तथा उपसौर भी बदल रहा है जिसका अर्थ है कि सूर्य का उच्च तथा नीच भी प्रतिवर्ष बदल रहा है। इसे ह्रहों उपसौर-अयन (Precession of Perihelion) कहा जाता है। रामायण काल में पृथ्वी का अपसौर मीन राशि में रेवती नक्षत्र में होता था अतः बाल्मीकि ने उचित कहा कि उस समय पाँच ग्रह उच्च के थे क्योंकि उस समय सूर्य की उच्च राशि मीन तथा उच्च नक्षत्र रेवती ही था। वराहमिहिर के अनुसार उनके समय-काल में वह मेष राशि के दश अंश पर अश्विनी में आ गया।

          आज की क्या स्थिति है?

          गणना करनी होगी आज की स्थिति के अनुसार! किन्तु कैसे? किस आधार पर?

          ज्योतिष को त्रिस्कन्ध कहा जाता है। ज्योतिष का ज्योति-कलश तीन स्कन्धों पर, तीन स्तम्भों पर आधृत है, गणित, होरा एवं संहिता और गणित भाग हमें ज्योतिर्मय पिण्डों की स्थितियों तथा उनके सन्दर्भ बिन्दुओं के गणना की विधियाँ बताता है। इसी कारण वाराहमिहिर ने कहा - उक्ताभावो विकृतिः प्रत्यक्षपरीक्षणैर्व्यक्तिः – यदि इसमें विकृति हो तो व्यक्ति को प्रत्यक्ष परीक्षण करके ज्ञात कर लेना चाहिये। सूर्यसिद्धान्त एवं सिद्धान्तशिरोमणि में इनकी विधियाँ दी गयी हैं किन्तु उनका गणित श्रमसाध्य है। मात्र सूर्य का ही वर्तमान उच्च विन्दु निकालना हो तो बहुत सारा गणित करना होगा किन्तु मेरे पास अपनी बात को समझाने के लिये एक छोटा मार्ग भी है।

          वैज्ञानिक विधियों से खगोल के क्षेत्र में इतना तो आज स्पष्ट ही हो चुका है कि पृथ्वी अपसौर स्थिति में प्रत्येक वर्ष चार से छह जुलाई के मध्य कभी पहुँचती है। और लगभग १५ जून को सूर्य की मिथुन संक्रान्ति होती है अतः पन्द्रह जून से उसके अप्सौर स्थिति तक प्रति दिन एक अंश की गति से चल कर सूर्य कहाँ होगा? मिथुन राशि के लगभग बीस अंश पर! आर्द्रा के अंतिम या पुनर्वसु के प्रारम्भिक अंशों पर! यह जुगाड़ मेथड है, अतः थोड़ा तो स्थूल है ही! किन्तु विस्तृत गणना से भी यह बिन्दु कृतिकादि/मेषादि से ८० अंश के लगभग ही आता है, मिथुन के २० अंश ३ कला के आसपास। आज ६ जुलाई २०२६ को पृथ्वी का अपसौर भारतीय समयानुसार रात्रि ११:३० बजे होगा। गोरखपुर के अक्षांश पर उस समय सूर्य मिथुन राशि में २० अंश २७ कला २ विकला पर होगा - पुनर्वसु प्रथम चरण में! और कृपया भ्रमित न हों! यह निरयण मान है।                       

          इस दशा में अब प्रश्न यह उठता है कि सूर्य की उच्च राशि आज क्या मानी जानी चाहिये? मिथुन राशि इक्कीस अंश, पुनर्वसु प्रथम चरण? अथवा वही पुरातन मान - मेष का दश अंश अश्विनी तृतीय चरण? और नीच बिन्दु? उपसौर के समय, दो अथवा तीन जनवरी को? जब सूर्य धनु राशि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में होता है वह, अथवा तुला? ०२ जनवरी २०२७ को रात्रि ९:३८ पर भारतीय मानक समय के अनुसार पृथ्वी सूर्य से निकटतम होगी – धनु राशि के १७ अंश ४७ कला ४ विकला पर, पूर्वाषाढ़ द्वितीय चरण में। तो क्या आज मेष राशि को सूर्य का उच्च तथा तुला को उसकी नीच राशि मान कर फलकथन उचित है?

          एक होता है घुणाक्षर न्याय! जैसे घुन किसी लकड़ी को चाट रहा हो और अचानक कोई सार्थक चित्र बन जाय! घुन ने जानबूझ कर बनाया? नहीं! बन गया बस! इसी प्रकार सूर्य का उच्च मेष को मान कर भी फलादेश कुछ प्रतिशत ठीक उतर जाता है, किन्तु इसका कारण यह नहीं कि सूर्य का उच्च आज भी मेष है, बल्कि इसका कारण यह है कि सूर्य मेष में अपनी राशि सिंह से त्रिकोण में होता है अतः भावात् भावं सिद्धान्त से कुछ शुभ फल कर जाता है।  

          और सूर्य हेतु तो यह छोटा वाला मार्ग चल गया, किन्तु शेष ग्रहों का क्या? उनके मन्दोच्च की गणना में तो सूर्य के सापेक्ष अपसौर के साथ ही पृथ्वी के सापेक्ष अधिकतम दूरी की भी गणना करनी पड़ेगी। इतना श्रम कौन करे? क्यों करे? इस हेतु मात्र अयनांश साधन, दिनमान साधन, चरपल साधन, रेखान्तर साधन, बेलान्तर साधन, सायनार्क साधन,  पलभा साधन, राशियों का लङ्कोदय मान, स्थान विशेष पर राशियों का स्वदेशोदय मान ही नहीं ज्ञात करना होगा वरन् सिद्धान्त-सूत्रों में भी अनेक संस्कार करने होंगे। इसके लिये करण-ग्रन्थों में वर्णित गणना पद्धति जानने के साथ उच्च-गणित का नहीं, उच्चस्तरीय गणित का ज्ञान होना चाहिये। ज्यामिति, त्रिकोणमिति, गोल-त्रिकोणमिति (स्फेरिकल ट्रिग्नोमेट्री), खगोल भौतिकी (फिजिकल एस्ट्रोनॉमी), बीजगणित, अवकलन-समाकलन, गतिकी, सबका उपयोग करना पडेगा। अब आप कहेंगे कि उस काल यह सब कहाँ था? सब था! बस आज की टर्मिनोलॉजी से उस समय की टर्मिनोलॉजी अलग थी। आज की टर्मिनोलॉजी स्वीकृत हो चुकी, उस समय की अस्वीकृत तो क्या, विस्मृत ही हो गयी।

          चलो माना कि कोई इतना श्रम करे भी, तो उसे उसके इस श्रम का प्रतिदान क्या मिलेगा? निन्दा! विरोध! और जब प्रचलित हो कर सर्वमान्य हो चुकी व्यतिक्रमित गणनाओं के आधार पर निर्मित सॉफ्टवेयर से फटाफट एक अशुद्ध जन्म-चक्र और उससे सम्बन्धित अन्य अशुद्ध वर्ग-चक्र, दशा, अन्तर्दशा आदि मिनटों में मिल जाते हों तो इतनी गणना करने कौन बैठता है? और वह कार्य कोई करना भी क्यों चाहेगा जिससे न तो नाम ही मिलने वाला है, न तो नाँवाँ ही, तो इतना श्रम कौन करे? क्यों करे? मैंने मंगल, गुरु तथा शनि के पिछले सौ वर्षों के अपसौर, उपसौर तथा उनके शात्रोक्त उच्च एवं नीच की तिथियाँ अत्यंत परिश्रम से प्राप्त कीं किन्तु उनको सार्वजनिक करते भय लगता है। ज्योतिष की इन विसंगतियों को सार्वजनिक करना स्वयं को आत्महत्या की ओर धकेलने के जैसा है। वैसे भी मैं अपनी कृतियों एवं करतूतों से निकृष्टोपम व्यक्ति सिद्ध हूँ।  

          अतः ज्योतिष के उद्धार हेतु इतना श्रम और कोई करे न करे, किन्तु कम से कम मैं तो नहीं करने वाला! क्यों? क्योंकि यह मेरा कार्य नहीं! कार्य क्यों नहीं? क्योंकि ज्योतिष मेरे लिये बहके मन का चकल्लस भर है, बुद्धि-विलास की, मौज-शौक की चीज! वह भी कब? जब अपने मन को मारने का तथा समय की निर्मम हत्या का कोई अन्य उपाय मुझे सूझ न रहा हो तब! और अपना तथा अपने कुनबे का पेट भी तो पालना है कि नहीं? अतः यह कार्य उन्हें ही करना होगा जिनका यह कार्य है। दायित्व ही उनका बनता है जो इस विद्या से अर्थोपार्जन करते हैं! किन्तु वे करेंगे भी नहीं और कर भी नहीं पायेंगे! क्योंकि अपने कुनबे का पेट उन्हें भी तो पालना है कि नहीं? और जब आज ज्योतिष का अर्थ ही बस होरा – बस फलित-ज्योतिष है और वह भी स्थूलतम रूप में, तो चलने दो जैसा चल रहा है! दादा बोले रहे कि सरसोइये लदिहो! तो सबही लाद रहेन हैं, हमहूँ लादिये रहेन हैं!

          एक बात और! ये जो वाराहमिहिर भाई थे न? आर्ष-ज्योतिष को जितना इस व्यक्ति ने विकृत किया, अन्य किसी ने नहीं किया! लौरिया-घमोह सिद्धान्त आधारित यवन-ज्योतिष के प्रचण्ड प्रशंसक थे ये महानुभाव! जहाँ देखो वहीं यावनी-मन्तव्य घुसा देते थे। एक नहीं अनेक उदारहण हैं! तो पता नहीं कि भाई ने ग्रहों के मन्दोच्च तथा शीघ्रोच्च की गणना स्वयं की थी कि कहीं से नकलिया ली थी। कहाँ त्रेता? जब सूर्य मीन में उच्च था? और कहाँ कलि विक्रमी के प्रारम्भिक वर्ष! विक्रमी सम्वत के तो प्रारम्भ के समय ही कलियुग के ३०४४ वर्ष (युद्धिष्ठिर सम्वत) व्यतीत हो चुके थे, त्रेता के राम-जन्म के पश्चात अवशेष वर्ष और द्वापर के गत वर्ष और जोड़ दो! इतने वर्षों में, सूर्य का मंदोच्च रेवती से विस्थापित हो कर मात्र अश्विनी के दस अंश तक ही आया? और आज संवत् २०८३ है तो मात्र २०८३ वर्षों में अश्विनी के दस अंशों से पुनर्वसु के प्रारम्भिक अंशों तक पहुँच गया? मेष से मिथुन तक? किन्तु महाराज विक्रमादित्य का वरद-हस्त था उन के शीश पर! और एक बार पिण्डी पुजा गयी तो पुजा गयी! अब वह पिण्डी नहीं देवता है! किन्तु वराहमिहिर के बताये मंदोच्च एवं शीघ्रोच्च संदिग्ध है भिया! मानो, या न मानो!

 

यदि पृथ्वी का उपसौर-अयन १० विकला ३६ प्रतिविकला है

तो २०८३ वर्षों में कुल चालन कितना हुआ?

(१० विकला ३६ प्रतिविकला) × २०८३ = २२०७९ विकला ४८ प्रतिविकला

गणना की सुगमता हेतु ४८ प्रतिविकला को छोड़ते हैं तो

चूंकि ६० विकला = १ कला तथा ६० कला = १ अंश अतः

२२०७९ विकला =३६७ कला ५९ विकला = ६ अंश ७ कला ५९ विकला

और अब छोडी गयी ४८ प्रति विकला को भी जोड़ लें तो अंतिम परिणाम

= ६ अंश ७ कला ५९ विकला ४८ प्रतिविकला।

इस प्रकार वाराहमिहिर के समय से आज तक का सूर्य का मंदोच्च चालन मात्र ६ अंश ७ विकला लगभग ही हुआ है अतः वाराहमिहिर के समय में उसे मिथुन राशि के १४ अंशों के सन्निकट ही कहीं होना चाहिये था।

पुनश्च

द्वापर युग के कुल वर्ष   = ८६४०००

युधिष्ठिर वर्ष           =    ३०४४

वर्तमान सम्वत         =    २०८३

          --------------------------------

योग                 = ८६९१२७ वर्ष

इन ८६९१२७ वर्षों में १० विकला ३६ प्रतिविकला प्रति वर्ष के मान से सूर्य के मंदोच्च का चालन

= १० विकला ३६ प्रतिविकला × ८६९१२७ वर्ष  

= ९२१२७४६ विकला ५९ प्रतिविकला  

चूंकि ६० प्रतिविकला = १ विकला अतः ५९ प्रतिविकला को एक कला माना जा सकता है 

अतः ९२१२७४६ विकला ५९ प्रतिविकला  को ९२१२७४७ विकला मान कर गणना की जा रही है (किन्तु इस मान को अंततः जोड़ लिया जायेगा।)।

चूंकि ६० विकला = १ कला अतः

९२१२७४७ विकला = १५३५४५ कला ४७ विकला

और चूंकि ६० कला = १ अंश अतः

१५३५४५ कला ४७ विकला = २५५९ अंश ५ कला ४७ विकला

अब एक चक्र = ३६० अंश

अतः २५५९ अंश ५ कला ४७ विकला

= ३६० × ७ चक्र + ३९ अंश ५ कला ४७ विकला

अतः द्वापर के प्रथम दिन मेष के आदि बिन्दु से ३९ अंश ५ कला ४७ विकला पर

या कहें कि वृष राशि में ९ अंश के आस-पास कहीं सूर्य का उच्च बिन्दु होना चाहिये था।

          ज्योतिष का आधार है गणित तथा ज्योतिष का प्रमाण है गणितागत परिणाम! अब यदि गणित में प्रारम्भिक मान ही अशुद्ध प्रयुक्त हों तो परिणाम शुद्ध कैसे होगा? आज की तिथि में ज्योतिषियों द्वारा उपयोग में लाया जा रहा वर्षमान तक तो शुद्ध है नहीं! भारतीय पञ्चाङ्ग भी स्वयं में एक समस्या हैं। ६ तरह के तो अयनांश प्रचलित हैं। लाहिरी का चित्र-पक्षीय अयनांश भी निकटतम ही है, दृक्-शुद्ध नहीं! अशुद्ध मान पर आधारित गणना के परिणाम अशुद्ध ही तो होंगे? तो उन अशुद्ध परिणामों पर आधारित निष्कर्ष कैसे सत्य सिद्ध होंगे? जिन आधारशिलाओं पर ज्योतिष का महालय खड़ा है, तर्कसम्मत गणित-कार्य के अभाव में वे आधारशिलायें अपने निश्चित स्थान से विचलित हो चुकी हैं अतः ज्योतिष के महालय की भित्तियाँ भी चिरिया गयी हैं, दरक गयी हैं। भविष्यवाणियाँ असत्य हो नहीं रही हैं, भविष्यवाणियाँ असत्य होने हेतु विवश हैं।

          यदि इस परिस्थिति को बदलना है तो ज्योतिष को मात्र-होराशास्त्रियों की झोलम-झाल वाली झोली से निकालना होगा। पहले तो यह स्वीकार करना होगा कि ज्योतिष के मूल-सिद्धान्त भले अपरिवर्तनीय हैं किन्तु प्रकृति के नियम उनके द्वारा प्रतिबाधित नहीं हैं अतः प्रेक्षणों द्वारा खमंडलीय पिण्डों एवं बिन्दुओं में आ चुके परिवर्तनों को नये सिरे से अभिलिखित करना अब आवश्यक हो चुका है। स्वीकार करना होगा कि प्रायः समस्त स्थिरांक तथा अनेक सिद्धान्त अब काल-बाह्य हो चुके हैं अतः उनमें गणित के आधार पर यथोचित संस्कार करना आवश्यक है और यह संस्कार करना भी होगा। निष्कर्षतः नवीन प्राप्तियों के आधार पर होरा-शास्त्र के सिद्धान्तों में भी संशोधन करना होगा। स्पष्टतः जो दोष-पूर्ण परम्परायें प्रचलित हो चुकी हैं जैसे अशुद्ध वर्ग-कुंडलियों का निर्माण आदि, उनको दृढ़ता के साथ निरस्त करते हुए शुद्ध आर्ष-पद्धति को पुनः प्रचलन में लाना होगा। और यह सब कुछ एक या दो व्यक्तियों द्वारा एक या दो वर्षों में संभव नहीं है। इस कार्य में एकनिष्ठ लक्ष्य हेतु अनेकों की तपःनिष्ठ संलग्नता चाहिये, युगों का समय चाहिये, सत्ता का समर्थन चाहिये, जनता का प्रोत्साहन चाहिये। और चूंकि यह सब कुछ प्राप्त होना असंभव है अतः विशुद्ध वैदिक ज्योतिष की पुनर्प्रतिष्ठा भी अब असंभव है।

          पृथ्वी एक अनिश्चित परिक्रमा-पथ पर चलते-चलते आज भारतीय समयानुसार अर्द्धरात्रि से आधे घंटे पूर्व, ठीक ११ बज कर ३० मिनट रात्रि पर अपने परिक्रमण-केंद्र सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर होगी। अर्थात् हम सूर्य-संताने आज अपने उद्भव-स्रोत से सर्वाधिक दूर होंगे!

          की फर्क पेंदा ए?

          पेंदा ए बाऊजी! तैनू जानदे ही नई कि त्वाडा जोशी एक गल्त पत्रा बांच रया!

          हम और आप अपने दैनिक कार्यक्रमों में, और तुच्छ सामाजिक/राजनीतिक समस्याओं के समाचारों को सुनने-सुनाने मात्र में व्यस्त हैं। इसरो या नासा या ई एस ए या जाक्सा या रोस्कोस्मोस या सी एन एस ए या स्पेस एक्स आपको आपके ज्योतिष सम्बन्धी अनुसंधानों में सहायता नहीं करने वाली क्योंकि उनका लक्ष्य यह है ही नहीं! और सूर्य-सिद्धान्त के नाम पर आपको चूतिया बनाने वाले, बिन्ने जैसे लोग, त्रुटिपूर्ण वर्षमान, त्रुटिपूर्ण अयनांश, त्रुटिपूर्ण मंदोच्च आदि के आधार पर आपको सर्वोत्कृष्ट पञ्चांग देने का दावा भी करेंगे, किन्तु मेरी मानो, तो इस भ्रष्ट हो चुके ज्योतिष पर विश्वास करना बंद करो! तुम्हारा भाग्य पढ़ा जा सकता है अवश्य! किन्तु वह जिस भाषा में लिखा गया है न, वह भाषा विकृत हो चुकी है। और वह भाषा मैं शुद्ध कर सकता हूँ!

       किन्तु करूँगा नहीं! क्योंकि इसके लिये मुझे जो शिष्य चाहिये वे स्वयं गुरु हैं, जो अवधि चाहिये वह व्यतीत हो चुकी, जो संस्थान चाहिये वे तमस् को ही ज्यौतिष कह कर उन आधारों पर प्रमाण-पत्र दे रहे हैं, गणित का ग तक नहीं जानने वाले ज्यौतिष-मार्तण्ड हैं, और मुझे जो समाज चाहिये वह आर्ष शब्द से घृणा करता है। अतः    

 

         बहुत कठिन है डगर पनघट की।

         जा भर ला किसी गड़ही से मटकी।

 

 

त्रिलोचन नाथ तिवारी.

(कृपया कॉपी पेस्ट न करें।)



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