स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः
सत्य है कि स्वस्थ वाद
से तत्वबोध की लब्धि होती है फिर भी इस आलेख को प्रस्तुत करते हुए मन में एक भय
है। भय यह है कि कहीं मेरे मुख से अग्नि वैश्वानर न निकल पड़े – ‘नेन्मेऽग्निर्वैश्वानरो
मुखान्निष्पद्याता’– अतः तार्क्ष्य अरिष्टनेमि से यह प्रार्थना है कि वे मेरा शुभ
करें – ‘स्वस्ति नः तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः’। किन्तु क्या अपने मन के भय से
निवृत्ति हेतु की जा रही प्रार्थना को किसी आलेख का शीर्षक बनाना उचित है? निश्चित
ही “नहीं”! तो फिर यह शीर्षक क्यों? क्योंकि आलेख इस वाक्यांश से पूर्णतया
सम्बंधित है अतः मुझे यह शीर्षक उचित प्रतीत होता है।
ऋग्वेद प्रथम मण्डल का
८९वां सूक्त स्वस्ति–सूक्त के नाम से भी जाना जाता है। कर्मकाण्डों के अवसर पर
पुरोहित यजमान की कल्याण–कामना करते हुए इस सूक्त का पाठ किया करते हैं और इस
सूक्त की छठवीं ऋचा है– “स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥”
बाल्यावस्था से ही इस
सूक्त का पुरोहित द्वारा किया गया सस्वर पाठ मुझे अत्यंत आकर्षक एवं लुभावना
प्रतीत होता था। उस अवस्था में और कुछ समझ नहीं आया तो मैंने वह सूक्त कण्ठस्थ कर
लिया। शनैः शनैः जब वेदों के प्रति रुचि बढ़ी तो सूक्त की ऋचाओं के सामान्य अर्थ भी
ज्ञात हो गये किन्तु इनका कोई निहितार्थ भी होगा यह नहीं सोच सका। समय के साथ इस
मन्त्र के सम्बन्ध में विद्वानों की टिप्पणियाँ मेरे समक्ष आयीं और उन टिप्पणियों
ने मुझे उलझा दिया।
किसी विद्वान्–विशेष का
नाम बताने का कोई लाभ नहीं क्योंकि वे टिप्पणियाँ किसी एक विद्वान् की नहीं हैं।
सभी की टिप्पणियाँ लगभग एक जैसी ही हैं, मात्र भाषा एवं शैली में अन्तर है।
सामान्य भाषा में समझाने वालों ने बताया है कि यह ऋचा या यह मन्त्र जो भी आप कहना
चाहें, चारो दिशाओं को अभिव्यक्त करती हैं और जिन्होंने परिष्कृत भाषा–शैली का
उपयोग किया वे कहते हैं कि यह “ख–स्वस्तिक” है। दोनों कथनों का आशय समान है –
समलम्ब पर काटती दो अदृश्य रेखायें।
एकाक्षर कोष के अनुसार “ख” के कई अर्थ हैं जैसे – गर्त,
रिक्त स्थान, निर्गम या निकास, छिद्र, बिल, इन्द्रिय, श्वांस–नली, कुआँ, बाण से बना घाव, किसी वाहन के पहिये के केंद्र में धुरा लगाने का
छिद्र, शून्य, आकाश, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, देवलोक, बोध, ब्रह्म, सूर्य, प्रपात या
झरना, अभ्रक, और क्षेत्र। प्रयोग किस सन्दर्भ में हुआ है इस के आधार पर
तत्सम्बन्धी अर्थ ग्रहण करना होता है। ख–स्वस्तिक के सन्दर्भ में ख का अर्थ है
आकाश या अन्तरिक्ष। अतः ख–स्वस्तिक का आशय है अन्तरिक्ष में बनने वाला एक स्वस्तिक
और स्वस्तिक भी परस्पर समलम्ब पर काटती हुई दो भुजाओं से ही निर्मित होता है अतः
इसका अर्थ हुआ – अन्तरिक्ष में वे दो रेखाएं जो अन्तरिक्ष को ९० अंश के चार भाराबर
भागों में बाँट दें; और चार दिशाओं के रूप में इस ऋचा का आशय समझाने वालों का
मंतव्य तो स्पष्ट ही है – पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण को व्यक्त करने हेतु एक
दूसरे को परस्पर समलम्ब पर काटने वाली दो रेखायें, या यदि दिशाओं का नाम न भी दिया
जाये तो अल्पशः समलम्ब पर काटती दो रेखाएं तो अवश्य!
किन्तु जहाँ तक ‘ख–स्वस्तिक’से इस आशय को ग्रहण करने का सम्बन्ध
है, सामान्यतया मात्र इस प्रकरण को समझने–समझाने के लिये मान लिया जाये तो वह अन्य
बात है अन्यथा ‘ख–स्वस्तिक’ज्योतिष एवं खगोल का एक पारिभाषिक शब्द है तथा यह
समलम्ब पर काट रही चार भुजाओं से बनने वाले किसी स्वस्तिक का नहीं बल्कि मात्र एक
बिन्दु का परिचायक है। ज्योतिष–गोलशास्त्र में ख–स्वस्तिक का अर्थ मूलतः निरीक्षक या
द्रष्टा के ठीक सिर के ऊपर, आकाश–गोले पर स्थित बिन्दु —
अर्थात् zenith /शीर्षबिन्दु है। गोलपरिभाषा,
श्लोक १३ में इसकी परिभाषा है—
भूमिगर्भात्
स्वदेशार्धकसूतं यत्र नभस्तदाम्।
गोले
लग्नं खमध्यं तत् खस्वस्तिकमपीरितम् ॥
भूमि
के गर्भ (भूकेन्द्र) से स्वदेश को स्पर्श करने वाला सूत्र आकाशगोले में जहाँ लगता
है, वही खमध्य अथवा ख–स्वस्तिक है। और स्वदेश या स्वस्थान कहते हैं उस स्थान
को जिस स्थान पर कोई प्रेक्षक स्थित है –
भूमौ
तिष्ठति यो यत्र पृष्ठस्थानं तदुच्यते।
स्वदेशोऽपि
स एवास्य कथ्यते गणितागमे॥
अतः इस मन्त्र के सन्दर्भ में अथवा चार नक्षत्रों के सन्दर्भ
में विद्वत्–जन जिसे ‘ख–स्वस्तिक’कह कर व्याख्यायित करते हैं वह तो स्पष्टतया
अशुद्ध है। उनके मंतव्य के परिप्रेक्ष्य में उसे स्वस्तिक मात्र कहा जा सकता
है।
अन्तरिक्ष कोई द्विविमीय तल नहीं है। खगोल–एवं ज्योतिष की दृष्टि में अन्तरिक्ष है एक अनन्त रूप से विशाल आभासी त्रिविमीय गोला। अतः यदि चार समकोण में विभाजन को स्वीकार करना हो तो इसके किसी अनुप्रस्थ या अनुदैर्ध्य या किसी नत तल की काट वाले किसी वृत्तीय पटल या किसी चकती जैसे तल को स्वीकार करना होगा तथा अंतरिक्ष में ‘ऊपर’, ‘नीचे’, ‘दाएं’या ‘बाएं’जैसा कुछ नहीं होता इसलिए, नक्षत्रों, तारों और ग्रहों आदि के सन्दर्भ में बातों को समझने और समझाने हेतु दो समतलों को संदर्भ मानना विवशता है। वे दो तल है खगोलीय भूमध्य रेखा का तल तथा क्रान्तिवृत्तीय समतल। यदि हम पृथ्वी की भूमध्य रेखा को चारों तरफ अंतरिक्ष में अनंत तक बढ़ा दें, तो जो काल्पनिक समतल बनेगा, उसे खगोलीय भूमध्य रेखा समतल कहते हैं। यह खगोलीय गोले (Celestial Sph ere) को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में उसी प्रकार द्विभाजित करता है जैसे पृथ्वी की भूमध्य रेखा वाला तल पृथ्वी को दो गोलार्धों में द्विभाजित करता है। अन्य शब्दों में खगोलीय भूमध्य रेखा पृथ्वी की भूमध्य रेखा (Equator) का ही काल्पनिक रूप से अंतरिक्ष में फैला हुआ रूप है।
क्रान्तिवृत्तीय समतल (Epliptic) वह तल
है जो पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के पथ को काल्पनिक रूप से अनन्त तक प्रसरित
कर देने पर प्राप्त होता है। इसी तल पर सुदूर अन्तरिक्ष में एक काल्पनिक वृत्त है
जिसके केंद्र से ८ अंश ऊपर तथा ८ अंश नीचे तक की एक पट्टी पर हमारे
ज्योतिर्विज्ञान एवं खगोल के बहुश्रुत नक्षत्र स्थित हैं। ज्योतिषीय भाषा में इस
पट्टी को ही भचक्र कहा जाता है। इस पट्टी की वृत्ताकार परिधि को १३ अंश २० कला के
२७ विभाजनों में बाँटने पर एक–एक नक्षत्र का प्रभाव क्षेत्र है जिसे उस नक्षत्र की
परास, उसका कुल भोगांश आदि कहा जाता है। मान्यता के अनुसार अश्विनी नक्षत्र के
प्रभाव क्षेत्र का आदि बिन्दु इस नक्षत्र–माला का आरम्भ है। इसी बिन्दु से ३०
अंशों का क्रमिक विभाजन एक–एक कर क्रमशः बारह राशियों का क्षेत्र माना जाता है अतः
इस पट्टी को राशि–चक्र भी कहा जाता है किन्तु इस आलेख में प्रसंग नक्षत्रों का है;
अतः कतिपय विशिष्ट विवशताओं के निरसन के अतिरिक्त राशियों का इस आलेख में कोई
स्थान नहीं है।
उल्लिखित मन्त्र के
सम्बन्ध में विद्वानों की टिप्पणियाँ भी कोई अकारण नहीं प्रतीत होतीं। इस मन्त्र
में जिन चार देवताओं द्वारा स्वस्ति–कामना की गयी है वे चारो चार नक्षत्रों के
अधिदेवता हैं। मन्त्र में उल्लिखित प्रथम देवता है इन्द्र–वृद्धश्रवा जो चित्रा
नक्षत्र का अधिदेवता है, द्वितीय है पूषा जो द्वादश आदित्यों में से एक है एवं रेवती
नक्षत्र का अधिदेवता है, तृतीय है तार्क्ष्य–अरिष्टनेमि जिसको विषय ही बनाया गया
है और चतुर्थ देवता है बृहस्पति जो पुष्य नक्षत्र का अधिदेवता है। मन्त्र इस
प्रकार है – “स्वस्ति नो इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नो पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।”
एक विद्वान् महोदय
इन्द्र से सम्बंधित नक्षत्र चित्रा को नहीं बल्कि ज्येष्ठा को मानते हैं। अधिदेवताओं
के आधार पर विचार करने पर उनका सोचना भी सामान्यतः कोई बहुत त्रुटिपूर्ण नहीं
प्रतीत होता क्योंकि ज्येष्ठा का अधिदेवता भी इन्द्र ही है, जबकि चित्रा का देवता
इन्द्र नहीं बल्कि इन्द्राग्नि है; किन्तु इस मन्त्र के प्रसंग में उनकी भी
टिप्पणी यही है कि ये चार नक्षत्र चार दिशाओं के सूचक हैं तो ज्येष्ठा और रेवती तो
कहीं से भी १८० अंश पर नहीं हैं अतः अपने कथन का निरसन तो वे स्वयं ही कर रहे हैं
क्योंकि यदि नक्षत्र ज्येष्ठा है तो उसके सम्मुख आधी कृतिका एवं आधी रोहिणी पड़ेगी
और तब तो यह ऋचा समलम्ब पर काटती हुई दो रेखाओं को अभिव्यक्त ही नहीं करती और यदि दिशाओं
वाली मान्यता को लेखे में रखना ही है तो वह नक्षत्र चित्रा ही होना चाहिये क्योंकि
कम से कम वह रेवती से १८० पर तो है और इस मन्त्र में उल्लिखित दूसरा नक्षत्र तो स्पष्टतया
रेवती ही है क्योंकि पूषा या पूषन् रेवती नक्षत्र का ही अधिदेवता है अतः रेवती को
त्यागा नहीं जा सकता।
वास्तव में चित्रा का
देवता इन्द्र नहीं बल्कि इन्द्राग्नि है और मन्त्र में कहा गया – स्वस्ति नो
इन्द्रः वृद्धश्रवाः। वृद्धश्रवा भी इन्द्र के ही एक अन्य नाम के रूप में स्वीकृत है
किन्तु यथार्थतः यह इन्द्र का नाम नहीं बल्कि विशेषण है। वृद्धश्रवा का शाब्दिक
अर्थ है वृद्ध + श्रवस्/श्रवा “जिसकी कीर्ति, जिसका यश महान
या प्राचीन है”, अथवा “जिसका यश बहुत बढ़ा
हुआ है”। वैदिक प्रयोग में श्रवस् प्रायः कीर्ति, यश, प्रसिद्धि आदि के अर्थ में ही आता है इसलिए वृद्धश्रवा
विशेषण इन्द्र के प्रति रूढ़ है क्योंकि इन्द्र ऋग्वैदिक काल के प्रमुख देवताओं में
भी प्रमुखतर है किन्तु इस विशेषण का प्रयोग अग्नि के लिए भी होना भाषिक रूप से
सम्भव भी है एवं उचित भी; क्योंकि ऋग्वेद में अग्नि को भी इन्द्र के ही तुल्य
महत्व प्राप्त है।
अग्नि ऋग्वैदिक आर्यों
का प्रथम देवता है। ऋग्वेद का प्रथम सूक्त ही अग्नि–सूक्त है एवं ॐ अग्निमीले पुरोहितं
यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥ अग्नि पूर्वेभिॠषिभिरिड्यो नूतनैरुत। स देवाँ
एह वक्षति॥ आदि द्वारा ऋषियों ने अग्नि का यशगान किया है। “अग्नि
पूर्वेभिॠषिभिरिड्यो नूतनैरुत – जो अग्नि पूर्वकालीन ऋषियों द्वारा प्रशंसित है
तथा आधुनिक वेदज्ञों द्वारा स्तुत्य है” जैसे वेद वचनों के आश्रय से ऋषि द्वारा अग्नि
के लिए भी “वृद्धश्रवा” विशेषण के
प्रयोग की पूरी सम्भावना है इसे अर्थ–साम्य एवं भाव–साम्य के आधार पर ग्रहण किया
जा सकता है। वैसे तो है यह मात्र अटकलबाजी ही किन्तु यह सत्य के सन्निकट है और इस
अटकलबाजी के आधार पर चलें तो “इन्द्रः वृद्धश्रवाः” को संयुक्त रूप से इन्द्र एवं
अग्नि “इन्द्राग्नि” मान सकते हैं। यदि यह अटकलबाजी स्वीकृत होने योग्य नहीं है तब
भी रेवती नक्षत्र से १८० अंश पर होने के कारण इस प्रकरण में ‘इन्द्रः वृद्धश्रवाः’से
चित्रा नक्षत्र का ही ग्रहण सुसंगत है।
‘पूषा विश्ववेदाः’का
तात्पर्य है – वह पूषन जिसको विश्व का सबकुछ विदित है। पूषा सूर्य का ही एक पर्याय है जो रेवती का अधिदेवता है अतः स्पष्ट है कि
यदि स्वस्तिक अथवा चारो दिशाओं की परिकल्पना को स्वीकार कर लिया जाये तो इस ऋचा
द्वारा सङ्केतित प्रथम नक्षत्र है चित्रा और दूसरा नक्षत्र है रेवती, जिन दोनों की
स्थिति परस्पर १८० अंश पर है।
‘स्वस्ति नो
बृहस्पतिर्दधातु’इस आधार पर स्पष्टतया पुष्य नक्षत्र से सम्बन्धित है क्योंकि पुष्य
का अधिदेवता बृहस्पति है और उसका नाम मन्त्र में स्पष्ट रूप से आया है। समस्या
है स्वस्ति ‘नस्तार्क्ष्यो
अरिष्टनेमिः’के सम्यबन्ध में। तार्क्ष्य को गरुड एवं अरिष्टनेमि को विष्णु मानते
हुए इससे सम्बंधित नक्षत्र श्रवण माना गया है। तो इसमें समस्या क्या है? समस्या यह
है कि गरुड विष्णु का वाहन मात्र है और श्रवण का अधिदेवता विष्णु है तो मन्त्र में
ऋषि ने गरुड का नाम क्यों प्रयुक्त किया? और विष्णु तो अरिष्ट–सूदन है फिर
अरिष्टनेमि का अर्थ विष्णु कैसे? अतएव इस तार्क्ष्य अरिष्टनेमि पर
चर्चा आवश्यक है।
अभी कुछ समय के लिये इसे स्वीकार
कर लेते हैं और मान लेते हैं कि ‘तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः’का अर्थ गरुडासीन विष्णु
है किन्तु फिर भी पुष्य क्षेत्र तथा श्रवण क्षेत्र के बिन्दुओं को मिलाती हुई रेखा,
इस दिशाओं अथवा स्वस्तिक अथवा समलम्ब पर काटती दो रेखाओं की परिकल्पना का समर्थन
नहीं करती क्योंकि –
नक्षत्र–मण्डल में
पुष्य नक्षत्र की परास ९३०२०’००” से
१०६०४०’००” तक है तथा श्रवण नक्षत्र की परास २८००००’००”
से २९३०२०’००” तक है अतः पुष्य के आरम्भिक बिन्दु से श्रवण का आरम्भिक
बिन्दु १८६०४०’००” दूर है जो १८० अंश से ०६०४०’००” अधिक है।
३६० अंश के वृत्त पर १०० अंश पर अर्थात पुष्य नक्षत्र के भीतर ६०४०’००”
से मापना प्रारम्भ करें तो इस बिन्दु से १८०० पर श्रवण नक्षत्र का भाग प्राप्त
होने लगेगा जो पुष्य के अंतिम बिन्दु १०६०४०’००” तक श्रवण के आधे भाग
तक रहेगा। किन्तु यह रेवती के अंतिम बिन्दु से १०० अंश बाद प्राप्त होगा, ९० अंश या
इसके सन्निकट नहीं। और इससे ९० अंश आगे अर्थात १९० अंश पर स्वाति का क्षेत्र प्राप्त
होगा जिसकी परास १८६०४०’००” से २०००००’००” तक है। चित्रा तो
१८६०४०’००” पर समाप्त हो जाती है।
इस प्रकार प्राप्त पुष्य का
भाग न तो रेवती
की ही परास से ९० अंश पर स्थित है और न ही चित्रा की परास से। श्रवण नक्षत्र के
भाग की स्थिति भी न तो रेवती से ९० अंश पर है और न ही चित्रा से। यदि हम परस्पर ९०
अंश पर काटती दो शलाकाओं से एक मीन–यन्त्र (कम्पास) बनाएं तथा उसे नक्षत्र–मालिका
पर आरोपित करें तो मात्र रेवती एवं चित्रा परस्पर १८० अंश पर प्राप्त होते हैं;
पुष्य तथा श्रवण इनसे ९० – ९० अंश के अंतर पर नहीं प्राप्त होते अर्थात् दिक्सूचक
की अन्य दो सुइयों पर नहीं आते। तात्पर्य यह है कि स्वस्तिक की चारो भुजाओं में से
चारो के चारों क्रमशः एक साथ इन चार नक्षत्रों में नहीं आते। यदि
हम रेवती के अंतिम बिन्दु को भी मान कर चलें जहाँ से आज–कल नक्षत्र–गणना प्रारम्भ
होती है तब भी ९० अंश पर पुनर्वसु के तृतीय एवं चतुर्थ चरण की संधि आती है और वहाँ
से ठीक १८० अंश पर उत्तराषाढ़ के प्रथम एवं द्वितीय चरण की संधि आती है। अर्थात
रेवती और चित्रा क्षेत्र के वे दो बिन्दु जो परस्पर १८० पर भी हों उनको मिलाने
वाली रेखा को ९० अंश पर काटने वाली रेखा कदापि पुष्य एवं श्रवण से हो कर नहीं
जाती। यह
कौन सा स्वस्तिक है जिसकी भुजायें एक दूसरे को समकोण पर नहीं काटतीं? यह कौन सा
दिशा निर्देशक है जिसकी सुइयाँ परस्पर समकोण पर नहीं हैं? स्पष्टतः ये चारो
नक्षत्र दिक्सूचक या स्वस्तिक वाली परिकल्पना पर सटीक नहीं बैठते और यदि इनका
तात्पर्य स्वस्तिक या दिक्सूचक का ही है तो मैं अल्पशः यह तो नहीं ही मान सकता कि
अनुमानित रूप से ९० अंश के लगभग अंतर वाले चार नक्षत्रों को लेकर ऋषि ने यह ऋचा
उच्चरित कर दी होगी क्योंकि जिन ऋषियों ने एक छोटे से मन्त्र में बड़े–बड़े
सिद्धान्तों के दर्शन किये हों, उनमें से किसी द्वारा ऐसे असोढव्य त्रुटि की आशा
करना उस ऋषि के साथ अन्याय है। तो इससे निष्कर्ष क्या निकला? यह कि
इन चारों नक्षत्रों द्वारा व्यक्त ऋषि का अभिप्राय वह नहीं है जो हम समझ रहे हैं
अथवा अल्पशः इनमें से किसी एक का तात्पर्य वह नहीं है जो हम समझ और मान रहे हैं।
रेवती और चित्रा में कोई
भ्रम नहीं है क्योकि वे १८० अंश पर हैं और पुष्य को नहीं छोड़ा जा सकता
क्योंकि जिस आधार पर दिशाओं या स्वस्तिक की यह परिकल्पना खड़ी होती है वह है
अधिदेवता के नाम के आधार पर नक्षत्रों का ग्रहण और पुष्य का अधिदेवता बृहस्पति
मन्त्र में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है। अतः प्रथमतया विचार श्रवण पर ही करना होगा,
क्योंकि सर्वाधिक भ्रम इस नक्षत्र के ही साथ हैं। ऋषि का तार्क्ष्य अरिष्टनेमि से
अभिप्रेत श्रवण से ही था या कुछ अन्य?
प्रथमतः तार्क्ष्य को पकड़ने
का प्रयास करते हैं। जैसा कि यास्क जैसे विद्वान् बता गये हैं, तार्क्ष्य का तात्पर्य
यदि तृक्ष का पुत्र है तो उसका अर्थ गरुड हो सकता है क्योंकि गरुड कश्यप का पुत्र
है, और कश्यप को कुछ स्थानों पर त्रिक्ष या तृक्ष कहा गया है किन्तु मुझे जो आभास
होता है वह यह कि इस तार्क्ष्य को गरुड सिद्ध करने को ही कश्यप को बलात् यह नाम दे
दिया गया क्योंकि कश्यप तो स्वनाम–धन्य व्यक्तित्व है और उसे त्रिक्ष या तृक्ष नामक
कोई पर्याय देना बहुत युक्ति–युक्त नहीं प्रतीत होता। ब्रह्मा के बाद मरीचि और फिर
कश्यप और फिर गरुड, इस वंश–क्रम में तृक्ष नाम का कोई व्यक्ति भी नहीं! फिर भी गरुड
को तार्क्ष्य कहने की परम्परा है, अतः मानना पड़ेगा। किन्तु जब बात नक्षत्रों की हो
रही है तो उस दृष्टि से विचारने पर ऋक्ष का अर्थ तारा और नक्षत्र दोनों होता है
अतः तार्क्ष्य का अर्थ हुआ त्रि–ऋक्ष्य – तीन तारों वाला नक्षत्र। और श्रवण
नक्षत्र में तीन तारे हैं जिनके आधुनिक खगोल–विज्ञान द्वारा स्वीकृत नाम अल्फा
अक्विला, बीटा अक्विला तथा गामा अक्विला हैं तथा इनको अल्तेयर, अलशैन तथा तराज़ेद
भी कहा जाता है। अल्तेयर (या अल्फा अक्विला) ही श्रवण नक्षत्र का योगतारा ‘श्रवण’है।
स्पष्ट कहें तो वैदिक ऋषियों ने इसी तारे के नाम पर ही श्रवण नक्षत्र का नाम रखा
था और इसी तारे को भारतीय परम्परा में श्रवण तारा कहा जाता है। जिस तारामण्डल में
ये तीनों तारे पड़ते हैं उसकी सम्मिलित रूप से जो कल्पित आकृति मानी जाती है वह गरुड
के आकृति की है। संभवतः इसी कारण इस तारामण्डल का नाम गरुड तारामण्डल रखा भी गया
होगा। तो इस आधार पर तो तार्क्ष्य का अर्थ गरुड उचित ही प्रतीत होता है एवं तब तो
तार्क्ष्य से श्रवण नक्षत्र की ही पुष्टि होती प्रतीत होती है। ऋग्वेद १०.१७८.१ का एक मन्त्र भी
है –
त्यं ऊ षु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानाम् ।
अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं
स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम ॥
किन्तु इस मन्त्र में “उस वेगवान्,
देवों द्वारा प्रेरित, बलवान्, रथों को पराजित करने वाले, अक्षत–नेमि वाले, सेनाओं को जीतने वाले, शीघ्रगामी तार्क्ष्य का हम
यहाँ अपने कल्याण के लिए आह्वान करें।” कह कर अपनी कल्याण–कामना
हेतु तार्क्ष्य का आवाहन किया जा रहा है और श्रवण नक्षत्र से इस मन्त्र का कोई
सम्बन्ध है अथवा नहीं यह स्पष्ट नहीं है। इतना अवश्य है कि इस ऋचा में तार्क्ष्य
भी आया है तथा अरिष्टनेमि भी और यह तार्क्ष्य अरिष्टनेमि गरुड हो भी सकता है, नहीं
भी हो सकता है।
पुनः श्रवण अकेला ऐसा
नक्षत्र नहीं है जिसमें तीन तारे हों और श्रवण नक्षत्र–मण्डल जिस गरुड तारामण्डल
का भाग है उसकी गरुड जैसी जो आकृति कल्पित है वह है तो कल्पित ही? अश्विनी, अपभरणी
(भरणी का शुद्ध नाम), मृगशीर्ष, पुष्य, हस्त एवं ज्येष्ठा इन सभी नक्षत्रों में
तीन–तीन तारे हैं; यह और बात है कि इनमें से कोई भी दिक्सूचक की उस चौथी सुई के
निकट वाला नहीं है। वहाँ सबसे निकट श्रवण ही है और वह दिक्सूचक की सुई से ६०४०’००” बाद
में है अतः तार्क्ष्य शब्द से ऋषि का आशय गरुड से तथा श्रवण से ही है
इसे अभी पुनर्विचार की श्रेणी में ही रखना उचित है।
अब आते हैं अरिष्टनेमि
शब्द पर। इस शब्द को विष्णु का पर्याय क्यों माना जाना चाहिये? नेमि का अर्थ यास्क
से ले कर अन्य सभी विद्वान् किसी “पहिये की परिधि” या “चक्राकार वस्तु की परिधि”
बताते हैं और इस कारण इसे विष्णु के सुदर्शन–चक्र से जोड़ कर देखा जाये तो चलो ठीक
है किन्तु शब्द मात्र नेमि नहीं, अरिष्ट–नेमि है और अरिष्ट का एक अर्थ है सङ्कट या
विपत्ति! विष्णु का एक नाम यदि अरिष्ट–सूदन है – सङ्कटों का नाश करने वाला तो इस
प्रकार अरिष्टनेमि का अर्थ हुआ “सङ्कट की परिधि”! तब तार्क्ष्य
अरिष्टनेमि का तात्पर्य विष्णु कैसे हो गया?
वैसे, अरिष्ट एक ऐसा शब्द
है जिसके एक साथ विपरीतार्थक अर्थ प्राप्त होते हैं। कुछ स्थानों पर अरिष्ट को
√रिष् से व्युत्पन्न मान कर अ–रिष्ट अर्थात जिसे क्षति न पहुँचती हो ऐसी
व्युत्पत्ति भी प्राप्त होती है और यदि इस व्युत्पत्ति को स्वीकार करें तो “अक्षता
नेमिः यस्य सः अरिष्टनेमिः” – जिस चक्र की परिधि अक्षत हो वह अरिष्टनेमि है – का
सीधा अर्थ सुदर्शन चक्र लिया जा सकता है किन्तु तब प्रश्न यह उठता है कि ऋषि ‘गरुड’एवं
‘सुदर्शन चक्र’के उल्लेख द्वारा ‘विष्णु’का तात्पर्य ग्रहण करने हेतु इतने दूर के
सङ्केत क्यों दे रहा है जबकि वह विष्णु का कोई भी पर्याय उपयोग में ले सकता था?
विष्णु के न्यूनतम सहस्र नाम प्रचलित हैं उनमे से कोई भी नाम चुना जा सकता था!
वैदिक मन्त्रों के अर्थ
वे नहीं जो हम समझ पाते हैं। वैदिक मन्त्रों के वास्तविक अर्थ तो वही हैं जो उन
मन्त्रों द्वारा वैदिक ऋषियों को अभिप्रेत था और मुझे जो प्रतीत होता है वह यह कि
ऋषि का अभिप्रेत विष्णु से था ही नहीं क्योंकि इस प्रकार दिक्सूचक की चारो सुइयों
के आधार पर तथा तार्क्ष्य अरिष्टनेमि के निहितार्थ के आधार पर यह अभिकल्पना
ग्राह्य नहीं प्रतीत होती कि तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः से ऋषि का अभिप्रेत विष्णु के
अधिदैवत्व वाले नक्षत्र श्रवण से था और जैसा कि हम देख चुके हैं, दिक्सूचक की दो
सुइयों को क्रमशः रेवती के अंतिम चरण में तथा चित्रा के द्वितीय चरण में स्थापित
कर दें तो उसकी एक सुई पुष्य की परास में तो आ जाती है किन्तु शेष चौथी सुई उत्तराषाढा की परास में होती है; किन्तु उत्तराषाढ़ा का
अधिदेवता विश्वेदेव है और मन्त्र में विश्वेदेव का कोई उल्लेख ही नहीं है अतः उत्तराषाढा तो स्वीकार्य
ही नहीं है।
किन्तु हम नक्षत्रों के इस
परिधि पर एक नक्षत्र को भूल रहे हैं। वह नक्षत्र है अभिजित्! वैदिक काल में
अभिजित् को एक स्वतंत्र नक्षत्र की मान्यता प्राप्त थी इसका सबसे स्पष्ट वैदिक
प्रमाण अथर्ववेद १९.०७.०४ है जहाँ नक्षत्रों की क्रमिक सूची में पूर्वाषाढ़ा,
उत्तराषाढ़ा के बाद अभिजित् और उसके बाद श्रवण तथा श्रविष्ठा (धनिष्ठा)
आते हैं:
अन्नं पूर्वा रासतां मे अषाढा ऊर्जं देव्युत्तरा आ वहन्तु ।
अभिजिन् मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सुपुष्टिम् ॥
[पूर्वाषाढ़ा हमें अन्न दे,
उत्तराषाढ़ा ऊर्जा दे, अभिजित् हमें पुण्य प्रदान करे, तथा श्रवण और श्रविष्ठा हमें उत्तम पुष्टि दें।]
और इसके ठीक अगले मन्त्र में नक्षत्रों
की कुल संख्या आती है – अष्टाविंशानि शिवानि शग्मानि सह योगं भजन्तु मे। अर्थात्
यहाँ २८ नक्षत्रों की संकल्पना स्पष्ट है।
ब्राह्मण–ग्रंथों की परम्परा में अभिजित् के नाम की व्युत्पत्ति भी दी गयी
है। तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.२.३–४ में देवासुर–संग्राम के प्रसंग में कहा गया है –
देवासुराः संयत्ता आसन्। ते देवास्तस्मिन्न् नक्षत्रेऽभ्यजयन्। यदभ्यजयन्
तदभिजितोऽभिजित्स्वम् । अर्थात् देव और असुर युद्ध में थे। देवों ने उस नक्षत्र
में विजय प्राप्त की। जिसमें वे जीते, उसी कारण उसका नाम
अभिजित् हुआ। तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.२.५ में एक और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन है:
यस्मिन् ब्रह्माभ्यजयत् सर्वमेतत्। अमुं लोकमिदं च सर्वम्। तन्नो नक्षत्रम् अभिजिद्विजित्य
श्रियं दधात्वहणीयमानम्। जिस नक्षत्र में ब्रह्मा ने इस समस्त (सृष्टि) को जीत
लिया, वह अभिजित् है; वह हमें विजय और
श्री प्रदान करे।
पराशरतन्त्र के नक्षत्रोपसर्ग अध्याय में अभिजित्
का वर्णन मिलता है – तथा अभिजिता मध्यतारोपतापः शोषयति देवान्। द्वितीयोत्तरेण ब्राह्मणानृषिगणांश्च।
तृतीया दक्षिणेन नृपराष्ट्रकामात्यान्।
बाद
के ज्योतिषीय ग्रंथों में भी बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् के चतुर्विंशं नक्षत्रप्रकरणम्
में नक्षत्रों के देवता, ताराओं की संख्या, आकृति, गोत्र और कर्मफल का वर्णन करते हुए रचनाकार
कहता है – अभिजिद्ब्रह्मदैवत्यं त्रीणि ताराणि कारयेत्। यात्रागारसमुद्दिश्य
ब्रह्मणो वचनं यथा॥ इत्यभिजित्।
इसके
बाद तुरन्त श्रवण का वर्णन है – वैष्णवं श्रवणं विद्याद्वर्तुलं त्रीणि तारकम्।
अगस्त्यं चैव गोत्रेण सर्वकर्माणि कारयेत् ॥
पुनः “अभिजिन्नक्षत्रं त्रितारं गोशीर्षसंस्थानं
षण्मुहूर्तयोगं वाय्वाहारं ब्रह्मदैवतं ब्रह्मावतीयं गोत्रेण।” (दिव्यावदान,
शार्दूलकर्णावदान, अवदान ३३, नक्षत्रव्याकरण–प्रकरण, ३३५.०१५) “अभिजित् नक्षत्र तीन तारों वाला है, इसकी आकृति
गोशीर्ष के समान है, इसका योग छह मुहूर्त का है, इसका आहार वायु है, इसका देवता ब्रह्मा है और गोत्र
ब्रह्मावतीय है”। अभिजित के तीन तारे जिनका आधुनिक नाम वेगा,
शेलियाक और सुलाफात (अल्फा लायरा, बीटा
लायरा और गामा लायरा) हैं जो लायरा तारामण्डल में स्थित हैं। लायरा का
भारतीय नाम वीणा तारामंडल है तथा वेगा या अल्फा लायरा ही अभिजित् नाम का वह तारा
है जो कभी ध्रुवतारे के रूप में स्वीकृत था। अतः श्रवण की ही भाँति अभिजित् भी
तार्क्ष्य की संज्ञा का अधिकारी तो अवश्य है।
मुहूर्त चिन्तामणि
के विवाह–प्रकरण में अभिजित् नक्षत्र की परास निकालने का सूत्र इस प्रकार है – “वैश्वप्रान्त्याङ्घ्रिः
श्रुतितिथिभागतोऽभिजित्स्यात्”। वैश्व का अर्थ है उत्तराषाढ़ा (विश्वेदेव–अधिदेवता
वाला नक्षत्र) प्रान्त्याङ्घ्रिः से तात्पर्य है उसका अन्तिम पाद/चतुर्थ चरण,
श्रुतिः का अर्थ है श्रवण नक्षत्र, तिथिभाग अर्थात् पन्द्रहवाँ भाग। अर्थात्
उत्तराषाढ़ा का अन्तिम पाद तथा श्रवण का आरम्भिक १/१५ भाग मिला कर अभिजित् नक्षत्र
होता है। उत्तराषाढ़ा का चौथा पाद ३°२०’००” तथा
श्रवण का आरम्भिक १/१५ भाग (१३°२०’)/१५ = ००°५३’२०” = ०४°१३’२०”। अर्थात् श्रवण के आदि बिन्दु से
३°२०’००” पीछे से अर्थात् २७६°४०’००”
से प्रारम्भ हो कर श्रवण के ००°५३’२०” तक। इस प्रकार भचक्र
में २७६°४०’००” से २८०°५३’२०” तक का
भाग अभिजित् नक्षत्र का है और नक्षत्र–मण्डल में इस की परास २७६°४०’००” से २८०°५३’२०” तक कुल परास ०४°१३’२०” है।
इस आधार पर हमें मन्त्र में सङ्केतित रेवती एवं चित्रा के पश्चात एक ऐसा
क्षेत्र मिल जाता है जो उत्तराषाढ़ के चतुर्थ चरण से प्रारम्भ होता है जो साथ ही
अभिजित् नक्षत्र का भी आदि–बिन्दु है तथा श्रवण नक्षत्र के अन्त तक जाता है, तो
क्या तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः से ऋषि का तात्पर्य अभिजित् से ही है? निश्चित रूप से
तो नहीं कहा जा सकता किन्तु सम्भावना तो बनती है।
अब तनिक अभिजित् की स्थिति पर विचार करें तो प्राचीन ग्रंथों में इसके
अनेक उदाहरण उपलब्ध है जिनमें यह २८ नक्षत्रों में से एक है किन्तु राशि–व्यवस्था
स्वीकृत हो जाने के कारण अधुना इसे नक्षत्र–मण्डल की आतंरिक व्यवस्था में स्थान
नहीं प्राप्त है। इसके अपने पर्याप्त कारण हैं। पहला कारण यह कि इसका विस्तार
अत्यन्त कम (कुल परास ०४°१३’२०” मात्र) है, दूसरे, यह नक्षत्रों वाली पट्टी से अन्य नक्षत्रों की
तुलना में अधिक दूर भी है क्योंकि इसकी उत्तरा–क्रान्ति बहुत अधिक ८४ अंश लगभग है।
एक अन्य कारण यह भी है। यह नक्षत्र नक्षत्र–मण्डल से परिधि की सुसंगत दिशा में न
हो कर उससे कुछ–कुछ लम्बवत है। यही कारण रहे होंगे कि कालान्तर में इस नक्षत्र को राशि–मण्डल
से बहिर्गत कर दिया गया तथा अभिजित्–पतन जैसी कथाओं का जन्म हुआ किन्तु क्या आप
सोच सकते हैं कि इस छोटी सी परास वाले नक्षत्र को राशियों में स्थान न देते हुए भी
हमारे ऋषियों ने नक्षत्रों में स्थान क्यों दिया होगा?
आपने कभी किसी लोहार को किसी धातु की छोटी–छोटी शलाकाओं को जोड़ कर वृत्तीय
आकार देने का प्रयास करते देखा है? जिस बिन्दु पर उसके दोनों सिरे मिलते हैं वहाँ
जोड़ पर एक खुला स्थान छूटता ही छूटता है। यदि यह खुला स्थान नगण्य हो तो दोनों
सिरों को सटा कर वहाँ वेल्डिंग की जा सकती है। किन्तु यदि दोनों सिरों में
पर्याप्त रिक्ति हो तो? तब उस रिक्ति को भरने हेतु एक छोटी सी छड़ को लगा कर बाँधना
(या वेल्डिंग करना) पड़ेगा ही पड़ेगा और यदि ऐसा न किया जाये तो वृत्त का मुख खुला
रहेगा ही रहेगा और वास्तव में नक्षत्रों को जोड़ कर बनने वाली नक्षत्र–मलिका वाली
परिधि के साथ भी कुछ ऐसा ही है। ऐसा कैसे? १३०२०’००” के सताईस विभाजन
संयुक्त हो कर ३६० अंश वाली एक पूरी परिधि बनाते तो है! तो रिक्ति कहाँ है? है
रिक्ति!
स्थूलं कृतं भानयनं यदेतज्ज्योतिर्विदां संव्यवहार हेतोः ॥७१॥
सूक्ष्मं प्रवक्ष्येऽथ मुनिप्रणीतं विवाहयात्रादिफलप्रसिद्धयै ।
अध्यर्धभोगानि षडत्र तज्ज्ञाः प्रोचुर्विशाखादितिभध्रुवाणि ॥७२॥
षडर्धभोगानि च भोगिरुद्रवातान्तकेन्द्राधिपवारुणानि ।
शेषाण्यतः पञ्चदशैकभोगान्युक्तो भभोगः शशिमध्यभुक्तिः ॥७३॥
सर्वर्क्षभोगोनितचक्रलिप्ता वैश्वाग्रतः स्यादभिजिद्भभोगः ॥७४॥
अर्थात् नक्षत्रों का १३°२०’का स्थूल विभाजन ज्योतिषियों के सामान्य व्यवहार के लिये है। अध्यर्धभोगानि षडत्र तज्ज्ञाः प्रोचुर्विशाखादितिभध्रुवाणि। विशाखा, पुनर्वसु, रोहिणी, और तीनों उत्तरा – ये ६ अधि–अर्द्ध (अधि–अर्द्ध का तात्पर्य है एक से आधा अधिक=डेढ़=१.५) भोगा हैं; षडध्यर्धभोगानि च भोगिरुद्रवातान्तकेन्द्राधिपवारुणानि – आश्लेषा, आर्द्रा, स्वाती (या स्वाति), भरणी, ज्येष्ठा और शतभिषक् ये ६ अर्द्ध–भोगा हैं तथा शेषाण्यतः पञ्चदशैकभोगान्युक्तो भभोगः शशिमध्यभुक्तिः –अन्य १५ नक्षत्र चंद्रमा की मध्यमा–भुक्ति द्वारा एक–भोगा हैं। चन्द्रमा की मध्यमा–भुक्ति ७९०’३५” = १३°१०’३५” मात्र है। इस प्रकार अध्यार्द्ध भुक्ति वाले नक्षत्रों का मान १.५ × ७९०’३५” = ११८५’५२”३०”‘= १९°४५’५२”३०”‘तथा अर्द्ध–भुक्ति वाले नक्षत्रों का मान ०.५ × ७९०’३५” = ३९५’१७”३०”‘= ६°३५’१७”३०’” मात्र है। इस प्रकार २७ नक्षत्रों की समेकित परास = (१९°४५’५२”३०”‘×६)+(६०३५’१७”३०”‘×६)+(१५ × १३°१०’३५”) = ११८°३५’१५” + ३९°३१’४५” + १९७°३८’४५” = ३५५°४५’४५” मात्र है और यह मान ३६० अंश से कम है। परिधि की इस हीनता को कैसे भरा जाये? ग्रंथकार कहता है कि ‘यह जो मान हीन रह गया है उसे वैश्वा अर्थात् उत्तराषाढ़ा के बाद अभिजित् को स्थान दे कर पूर्ण किया जाये’– “सर्व ऋक्ष भोग ऊनित चक्र लिप्ता वैश्व अग्रतः स्याद् अभिजित् भभोगः”। वह मान कितना हुआ? ३६०° – ३५५°४५’४५” = ०४°१४’१५”। किन्तु जब नक्षत्रों की मान्य गणितीय परास १३ अंश २० कला मानी गयी तब अभिजित् को उत्तराषाढ़ा का चौथा पाद ३°२०’००” तथा श्रवण का आरम्भिक १/१५ भाग (१३°२०’/१५ = ००°५३’२०”) प्रदान करते हुए ०४°१३’२०” का मान लिया गया। अस्तु! इस प्रकार हम देख सकते हैं कि उत्तराषाढ़ और श्रवण की सन्धि पर अभिजित् कुछ इसी प्रकार स्थित है जैसे उस शलाका द्वारा निर्मित चक्र की परिधि के खुले वाले स्थान पर उसे रख कर रिक्त स्थान की पूर्ति की गयी हो। अब जब हम सभी नक्षत्रों की परास १३°२०’मानते हैं तो यह अभिजित् बेचारा निरर्थक सा प्रतीत होने लगता है अतः इसका कुछ भाग थोड़ा सा उत्तराषाढ़ में (अंतिम पाद) और थोड़ा सा श्रवण में (पन्द्रहवां भाग) मान कर बेचारे को सन्तोष प्रदान करने का प्रयास कर लिया जाता है, किन्तु सत्य यही है कि नक्षत्रों की वास्तविक परास भिन्न–भिन्न है तथा अभिजित् ने उत्तराषाढ़ और श्रवण की परास को अधिग्रहीत नहीं किया है बल्कि यह दोनों के सिरों के साथ अलग से चिपका हुआ भचक्र की एक बहुत बड़ी रिक्ति की पूर्ति कर रहा है। नक्षत्रों की वृत्ताकार अवस्थिति यदि एक नेमि है, एक चक्र–परिधि है जिसमें उत्तराषाढ़ और श्रवण की परास के संधि–स्थल पर एक रिक्ति है तो अभिजित् नक्षत्र उन दोनों के जोड़ के रूप में, उनके अ–रिष्ट रूप में स्थित हो कर उस नक्षत्र–माला की परिधि के खुले हुए भाग को पूर्ण करता हुआ, एक खुले जोड़ को जोड़ता हुआ, उसे खुले रह जाने से बचाता हुआ, स्पष्ट रूप से अ–रिष्ट–नेमिः की संज्ञा को सार्थक करता है। इस प्रकार अभिजित् तीन तारों वाला नक्षत्र होने से तार्क्ष्य भी है और अरिष्टनेमि भी अतः मन्त्र में तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः अभिजित् नक्षत्र हेतु ही प्रयुक्त हुआ है यह सिद्ध है फिर भी संभव है कि तार्क्ष्योऽरिष्ट्नेमिः ‘श्रवण के साथ अभिजित् नक्षत्र हेतु’संयुक्त रूप से प्रयुक्त हुआ हो, क्योंकि इसका संङ्केत पुराणों से प्राप्त होता है। ब्रह्माण्डपुराण के पूर्वभाग (अनुषङ्गपाद) का २३ वाँ अध्याय मुख्य रूप से सूर्य देव और उनके रथ के संचालन, सौर मंडल की काल–गणना, तथा देवताओं व ऋषियों द्वारा सूर्य की उपासना से सम्बन्धित है जिसमें खगोलीय पिण्डों की गति, दिन–रात के कारण और बारह महीनों के चक्र में विभिन्न देवगणों की भूमिका का विस्तार से वर्णन मिलता है। इस अध्याय के श्लोक १४ में “श्येनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।।” द्वारा बताया गया है कि श्येनजित् तथा सुषेण सूर्य के रथ पर सेनानी एवं ग्रामणी हो कर स्थित होते हैं। तथा इसी क्रम में श्लोक १८ में “तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ ।।” में तार्क्ष्य एवं अरिष्टनेमि के मध्य का ‘च’यह स्पष्ट करने को पर्याप्त है कि जैसे श्येनजित् एवं सुषेण दो भिन्न संज्ञाएँ हैं उसी प्रकार तार्क्ष्य और अरिष्टनेमि भी दो भिन्न संज्ञायें हैं जो सूर्य के रथ में सेनानी और ग्रामणी के रूप में स्थित होते हैं। विष्णुपुराण द्वितीयांश, अध्याय १० के श्लोक १४ में भी सामान प्रकार का विवरण है किन्तु उसमें तार्क्ष्य का उल्लेख नहीं है। विष्णुपुराण में अरिष्टनेमि को माघ मास में सूर्य के रथ पर स्थित रहने वाले अधिकारियों में से एक ‘यक्ष’कहा गया है – “क्रतुर्भगस्तथोर्णायुः स्फूर्जः कार्कोटकस्तथा, अरिष्टनेमिश्च एवान्या पूर्वाचित्तिर्वराप्सराः।” आदि पुराणों के ये सन्दर्भ सङ्केत करते हैं कि तार्क्ष्य एवं अरिष्टनेमि एक ही नहीं अपितु दो हैं। अतः उपरोक्त साक्ष्यों एवं विश्लेषण के आलोक में तार्क्ष्य को श्रवण एवं अभिजित् को अरिष्टनेमि मान लेने में कुछ अनुचित नहीं प्रतीत होता।
यहाँ एक और भी महत्वपूर्ण
तथ्य की ओर सङ्केत करना आवश्यक प्रतीत होता है। महीनों का नामकरण सर्वप्रथम तो
वेदों में ही मिलता है और यह नामकरण सौर मासों के अनुसार तथा उन मासों में ऋतुओं
की प्रकृति के अनुसार किया गया है। यजुर्वेद में यह नामकरण निम्नानुसार किया गया
है –
मधुश्च
माधवश्च वासन्तिकावृतू। (१३–२५) – मधु एवं माधव मास वसन्त ऋतु
शुक्रश्च
शुचिश्च ग्रैष्मावृतू। (१४–६) – शुक्र एवं शुचि ग्रीष्म
ऋतु
नभश्च
नभस्यश्च वार्षिकावृतू। (१४–१५) – नभ एवं नभस्य वर्षा ऋतु
इषश्चोर्जश्च
शारदावृतू। (१४–१६) – इष एवं ऊर्ज शरद ऋतु
सहश्च
सहस्यश्च हेमंतिकावृतू। (१४–२७) – सह एवं सहस्य हेमन्त ऋतु तथा
तपश्च
तपस्यश्च शैशिरावृतू। (१५–२७) – तप एवं तपस्य शिशिर ऋतु होते
हैं।
इस वर्णन के अनुसार बारह सौर मासों के नाम – मधु, माधव, शुक्र, शुचि, नभ, नभस्य, इष, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य हैं तथा वेदों के अनुसार वर्ष का प्रारंभ मधु मास से होता है और यह वसंत ऋतु में पड़ता है। और भौगोलिक आधार पर वर्ष का प्रारम्भ बसन्त सम्पात से ही होता है अतः बसन्त सम्पात के समय से ‘मधु’मास, ग्रीष्म अयनान्त के समय से ‘शुचि’मास, शरद सम्पात के समय ‘इष’मास एवं शीत अयनान्त के समय ‘सहस्य’मास ही हुआ करता था और यही होना भी चाहिये। राशियों की परिकल्पना के स्वीकरण के पश्चात् इन मासों को राशियों से जोड़ दिया गया एवं एक अनुचित परम्परा चल निकली जो चली जा रही है और इसी कारण आज ऋतुओं में होने वाले विपर्यय को परिभाषित करने वाला कोई समाधान उपलब्ध नहीं है। वास्तव में नियमानुसार बसन्त—सम्पात से वर्ष का प्रारम्भ तथा बसन्त का भी प्रारम्भ माना जाना ही उचित है भले ही चान्द्र—मास कोई भी हो और यही कारण है कि ब्रह्माण्ड पुराण अथवा विष्णु–पुराण के वर्णन ऋतुओं की दृष्टि से अधुना ग्राह्य नहीं हैं तथा इस आलेख में भी ग्राह्य नहीं है क्योंकि विष्णुपुराण पराशर द्वारा कहलवाया गया है एवं ब्रह्माण्ड पुराण सूत द्वारा। इनके काल में एवं वैदिक ऋषि के काल में पर्याप्त अन्तर है किन्तु ‘तार्क्ष्य’ एवं ‘अरिष्टनेमि’ नामक दो संज्ञाओं को अलग–अलग पहचान सकने हेतु ये सन्दर्भ पर्याप्त सहयोगी हैं। अस्तु। इस प्रकार यदि हम सामान्य १३°२०’के विभाजन को स्वीकार करें और अभिजित् को उत्तराषाढ़ा के तृतीय पादान्त से श्रवण के पञ्चदशांश तक अतिव्यापी मानें तो हमें ‘तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः’के लिये उत्तराषाढ़ा के अंतिम पाद सहित पूरा श्रवण क्षेत्र अर्थात् २७६०४०’००” से २९३०२०’००” तक की कुल १६०४०’००” की परास मिल जाती है और यदि भास्कराचार्य द्वारा ज्योतिषियों को वास्तविकता का स्मरण कराने वाला सूक्ष्म विभाजन स्वीकार करें तो श्रवण की परास १३°१०’३५” और उससे पूर्व अभिजित् की परास ०४°१४’१५”, कुल मिला कर १७°२४’५०” का परास–खण्ड प्राप्त हो जाता है। भूमध्य रेखा पर नक्षत्रों के वास्तविक सूक्ष्म विभाजन की परास–तालिका निम्नवत है –
|
क्रम |
नक्षत्र |
प्रारम्भ |
अंत |
परास |
|
१ |
अश्विनी (एक–भोगा) |
००°००’००” |
१३°१०’३५” |
१३°१०’३५” |
|
२ |
भरणी (अर्द्ध–भोगा) |
१३°१०’३५” |
१९°४५’५२.५” |
६°३५’१७.५” |
|
३ |
कृत्तिका (एक–भोगा) |
१९°४५’५२.५” |
३२°५६’२७.५” |
१३°१०’३५” |
|
४ |
रोहिणी (अध्यर्धभोगा) |
३२°५६’२७.५” |
५२°४२’२०” |
१९°४५’५२.५” |
|
५ |
मृगशीर्ष (एक–भोगा) |
५२°४२’२०” |
६५°५२’५५” |
१३°१०’३५” |
|
६ |
आर्द्रा (अर्द्ध–भोगा) |
६५°५२’५५” |
७२°२८’१२.५” |
६°३५’१७.५” |
|
७ |
पुनर्वसु (अध्यर्धभोगा) |
७२°२८’१२.५” |
९२°१४’०५” |
१९°४५’५२.५” |
|
८ |
पुष्य (एक–भोगा) |
९२°१४’०५” |
१०५°२४’४०” |
१३°१०’३५” |
|
९ |
आश्लेषा (अर्द्ध–भोगा) |
१०५°२४’४०” |
१११°५९’५७.५” |
६°३५’१७.५” |
|
१० |
मघा (एक–भोगा) |
१११°५९’५७.५” |
१२५°१०’३२.५” |
१३°१०’३५” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी (एक–भोगा) |
१२५°१०’३२.५” |
१३८°२१’०७.५” |
१३°१०’३५” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी
(अध्यर्धभोगा) |
१३८°२१’०७.५” |
१५८°०७’००” |
१९°४५’५२.५” |
|
१३ |
हस्त (एक–भोगा) |
१५८°०७’००” |
१७१°१७’३५” |
१३°१०’३५” |
|
१४ |
चित्रा (एक–भोगा) |
१७१°१७’३५” |
१८४°२८’१०” |
१३°१०’३५” |
|
१५ |
स्वाती (अर्द्ध–भोगा) |
१८४°२८’१०” |
१९१°०३’२७.५” |
६°३५’१७.५” |
|
१६ |
विशाखा (अध्यर्धभोगा) |
१९१°०३’२७.५” |
२१०°४९’२०” |
१९°४५’५२.५” |
|
१७ |
अनुराधा(एक–भोगा) |
२१०°४९’२०” |
२२३°५९’५५” |
१३°१०’३५” |
|
१८ |
ज्येष्ठा (अर्द्ध–भोगा) |
२२३°५९’५५” |
२३०°३५’१२.५” |
६°३५’१७.५” |
|
१९ |
मूल (एक–भोगा) |
२३०°३५’१२.५” |
२४३°४५’४७.५” |
१३°१०’३५” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा (एक–भोगा) |
२४३°४५’४७.५” |
२५६°५६’२२.५” |
१३°१०’३५” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा
(अध्यर्धभोगा) |
२५६°५६’२२.५” |
२७६°४२’१५” |
१९°४५’५२.५” |
|
२२ |
अभिजित् अरिष्टनेमि (विशेष) |
२७६°४२’१५” |
२८०°५६’३०” |
४°१४’१५” |
|
२३ |
श्रवण (एक–भोगा) |
२८०°५६’३०” |
२९४°०७’०५” |
१३°१०’३५” |
|
२४ |
धनिष्ठा (एक–भोगा) |
२९४°०७’०५” |
३०७°१७’४०” |
१३°१०’३५” |
|
२५ |
शतभिषा (अर्द्ध–भोगा) |
३०७°१७’४०” |
३१३°५२’५७.५” |
६°३५’१७.५” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा (एक–भोगा) |
३१३°५२’५७.५” |
३२७°०३’३२.५” |
१३°१०’३५” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा
(अध्यर्धभोगा) |
३२७°०३’३२.५” |
३४६°४९’२५” |
१९°४५’५२.५” |
|
२८ |
रेवती (एक–भोगा) |
३४६°४९’२५” |
३६०°००’००” |
१३°१०’३५” |
किन्तु क्या नक्षत्र–माला में अभिजित् को सम्मिलित कर लेने से समस्या का समाधान हो जाता है? आइये इस पर विचार करते हैं। मान लीजिये कि स्वस्तिक की एक भुजा रेवती नक्षत्र के अंतिम चरण में ३५९०५९’५५” पर स्थित है। तो इसके सामने वाली भुजा इस बिन्दु से १८० अंश पर चित्रा में १७९०५९’५५” पर होगी और यहाँ से आगे ९० अंश पर एक भुजा २६९०५९’५५” पर पुनः उत्तराषाढ़ में ही रहेगी जो अभिजित् की परास से अभी ६०४२’२०” पीछे है, और इसके सम्मुख वाली भुजा ८९०५९’५५” पर पुनर्वसु में, पुष्य से २०१४’१०”। अतः अभिजित् को नक्षत्र–मालिका में सम्मिलित भी कर लें तब भी दिक्सूचक की सूइयाँ श्रवण एवं पुष्य को स्पर्श तक नहीं करतीं और रेवती में स्थित ३५९०५९’५५” वाले बिन्दु को तनिक भी खिसकाया तो वह रेवती से बाहर हो जायेगा। पुनः रेवती एवं चित्रा को तो छोड़ा जा ही नहीं सकता। अतः स्पष्ट है कि इस ऋचा में संदर्भित चारो नक्षत्र ९० अंश के अंतराल पर नहीं हैं और इस प्रकार ये न तो किसी दिक्–योजना के परिचायक हैं और न ही स्वस्तिक की चार भुजाओं के अभिव्यञ्जक।
वैसे यदि व्यावहारिक पक्ष को कुछ समय के लिये स्थगित कर दें तो दिशाओं की परिकल्पना हमारे अपने विवशता जनित कारणों से हमारा एक पाला हुआ भ्रम है तथा यह विवशता इतनी बड़ी है कि इस भ्रम को अभिव्यक्त करने में भी हमें इसी शब्द का ही आश्रय लेना पड़ेगा। प्रातः उगता हुआ सूर्य हमें जिधर दिखता है उसे हम पूर्व दिशा कहते हैं और उधर की ओर स्थित संज्ञाओं को हम “पूर्व–दिशा में स्थित है” ऐसा ही मानते एवं अभिव्यक्त करते हैं। हमारे बायीं ओर उत्तर की दिशा है क्योंकि उधर की ओर पृथ्वी का ऊपर वाला आधा भाग है, या उत्तरी गोलार्ध है तथा हमारे दाँयीं ओर दक्षिण की दिशा है क्योंकि उधर की ओर पृथ्वी का नीचे वाला आधा भाग है, या दक्षिणी गोलार्ध है।
जिस ग्रह पर हम स्थित हैं उस ग्रह पर हमारे स्थिति के सापेक्ष स्थित
संज्ञाओं हेतु तो पूर्व तथा पश्चिम की यह परिकल्पना उपादेय है किन्तु इस विशाल
अन्तरिक्ष में दिशाओं की यह परिकल्पना हमारी कोई सहायता नहीं करती। संलग्न चित्र
पर ध्यान दें। सताईस या अट्ठाईस नक्षत्रों के सन्दर्भ में इसे प्रस्तुत करने में
एक व्यवहारिक जटिलता थी कि चित्र बहुत घना हो जाता अतः इसे राशियों के सन्दर्भ में
प्रस्तुत किया गया है। चित्र का भीतरी वृत्त पृथ्वी की परिधि है तथा बाहरी वृत्त
अन्तरिक्ष में स्थित क्रान्ति–वृत्त जिस पर नक्षत्रों एवं राशियों की परिकल्पना
है। पृथ्वी के केंद्र से एक क्षैतिज एवं एक उर्ध्वाधर रेखा जो परस्पर एक दूसरे को समलम्ब पर काटती है, प्रदर्शित है। राशियों
की स्थिति इस आधार पर प्रदर्शित है कि यह स्थिति बसंत विषुव के दिन की है जब
पृथ्वी के केंद्र को केंद्र मान कर अन्तरिक्ष की स्थिति जाँचें तो सूर्य सायन मान
से मीन एवं मेष राशि की संधि पर एवं रेवती
एवं अश्विनी नक्षत्र की संधि पर होगा तथा त्रि–विमीय परिदृश्य में पृथ्वी के
केंद्र से क्षैतिज खींची हुई रेखा के सापेक्ष शून्य अंश पर भी होगा।
अब मान लीजिये कि हम पृथ्वी की परिधि पर (वास्तव में हम पृथ्वी की परिधि पर ही हो सकते हैं।) उस स्थान पर खड़े हैं जहाँ केंद्र से जाने वाली उर्ध्वाधर रेखा है। तो सूर्योदय की ओर देखते हुए हमारी दृष्टि–रेखा अन्तरिक्ष के उस भाग से हो कर जायेगी जो मीन राशि के परिक्षेत्र में पड़ता है। हमारी मान्यता के अनुसार हमारा दृष्टिपथ पूर्व दिशा में है तथा इस आधार पर हमारे पैरों के ठीक अधोदिशा होगी जहाँ मिथुन एवं कर्क की संधि है। अभी तत्काल के लिये मीन–मेष में न उलझें। मात्र इतना ध्यान दें कि हम निरंतर उसी ओर, उसी सीध में देखते रहें तो हमारी मान्यता के अनुसार हम पूर्व–दिशा में देख रहे हैं। किन्तु मात्र छह घंटे में पृथ्वी ९० अंश घूम गयी और हम जिधर देख रहे हैं उस सीध में मिथुन एवं कर्क की संधि आ गयी। तीन घंटे पहले जो राशि, जो नक्षत्र अधोदिशा में थे वे हमारे सम्मुख आ चुके हैं जब कि हम अब भी अपनी प्रारम्भिक–स्थिति में खड़े हैं, प्रारम्भिक दृष्टि–रेखा की ओर ही हमारी दृष्टि रेखा है। सत्य यही है किन्तु इस सत्य के आधार पर हमारा जीवन अत्यन्त जटिल हो जायेगा अतः हमने सत्य को नए रूप में परिभाषित किया कि हम जिधर देख रहे हैं उस दिशा में एक पीपल का वृक्ष भी है, एक सरोवर भी, या ऐसा ही कुछ या बहुत कुछ अन्य भी और प्रातः उसी सीध में सूर्य भी उदित होता है अतः उस दिशा को हम सदैव पूर्व की दिशा ही मानेंगे। स्पष्ट है कि दिशायें मानव की अभिकल्पना हैं एवं इस अभिकल्पना के आधार पर नक्षत्रों एवं राशियों की समय के साथ दिशा–क्रम में स्थिति तो जाँची जा सकती है इस आधार पर दिशाओं का निर्धारण नहीं किया जा सकता। हमारी दिशाओं के निर्धारण हेतु मूल आधार पृथ्वी के क्षितिज पर वह बिन्दु है जिस बिन्दु पर हमें प्रातःकालीन उदित होता सूर्य दिखायी देता है और वही पूर्व की दिशा है जिस के आधार पर अन्य चारो दिशायें कल्पित हैं अतः यह कथन कि रेवती, चित्रा, श्रवण एवं पुष्य ये चारों नक्षत्र दिशाओं के व्यंजक हैं, नितांत असंगत एवं त्रुटिपूर्ण है और यही कारण है कि ऋषियों ने दिशायें चार नहीं छह बतायी है – पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उर्ध्व एवं अधः। और नक्षत्रों की स्थिति यदि उत्तर—दक्षिण कहनी हो तो इसके लिये पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष के गोले को आधे पर बांटने वाली भूमध्य रेखा तथा क्रान्तिवृत्तीय रेखा के सन्दर्भ में कहना होगा क्योंकि नक्षत्र—मालिका तो पूर्व से पश्चिम की ओर के एक वृत्त में उर्ध्व एवं अधः की ओर होती हुई नियोजित हैं। नक्षत्रों की दिशाओं के सापेक्ष परिकल्पना ही असंगत है। स्वस्तिक की परिकल्पना स्वीकार की जा सकती है।
वे चारो बिन्दु है क्रमशः
बसन्त विषुव, ग्रीष्म अयनांत, शरद विषुव एवं शरद अयनांत के बिन्दु। खगोल एवं
ज्योतिष से अनभिज्ञ सामान्य पाठक हेतु इन बिन्दुओं के सम्बन्ध में थोड़ा सा बता
देना उचित है।
संलग्न चित्र को ध्यान से देखें। अपनी धुरी पर झुकी हुई पृथ्वी के अक्ष पर ठीक मध्य में भूमध्य रेखा है। पृथ्वी की नति जो सामान्यतः २३ अंश ३० कला (साढ़े तेईस अंश) कही जाती है उसकी वर्तमान नति वास्तव में तेईस अंश २६ कला ८ विकला ५४ प्रतिविकला (२३° २६’०८” ५४”‘) है।
अक्ष की इसी नति के कारण
ही हमारी धरती पर अलग–अलग समय में अलग–अलग ऋतुएँ होती हैं क्योंकि अपनी वार्षिक
गति में अपनी कक्षा के पथ पर पृथ्वी एक बार ऐसी स्थिति में पहुँचती है जब इसकी
भूमध्य रेखा पर एक बिन्दु क्रांतिवृत्त के एक बिन्दु के एकदम सीध में आ जाता है
तथा पृथ्वी का झुकाव सूर्य से समानान्तर पर होता है। फिर अपने परिक्रमा पथ पर बढ़ती
हुई पृथ्वी अपने दीर्घवृत्ताकार पथ पर सबसे दूर जा पहुँचती है और उस समय इसका
झुकाव सीधे सूर्य की ओर होता है। अपने परिभ्रमण काल में पुनः पृथ्वी एक बार पहली
स्थिति के विपरीत दिशा में पुनः ऐसी स्थिति में पहुँचती है जब पुनः इसकी भूमध्य
रेखा पर एक बिन्दु क्रांतिवृत्त के एक बिन्दु के एकदम सीध में आ जाता है तथा
पृथ्वी का झुकाव सूर्य से समानान्तर पर किन्तु पहली वाली स्थिति से विपरीत दिशा
में होता है और एक बार पृथ्वी ऐसी स्थिति में पहुँचती है जब वह अपनी दीर्घवृत्तीय
कक्षा में सूर्य के निकट होती है, इसका झुकाव सूर्य से विपरीत दिशा में होता है।
इस प्रकार पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव एक बार सीधे सूर्य की ओर होता है, फिर लगभग तीन
माह पश्चात इसकी दिशा सूर्य के समानान्तर हो जाती है, फिर तीन माह पश्चात इसकी
दिशा सूर्य के सीधे विपरीत दिशा में हो जाती है और फिर तीन माह पश्चात इसकी दिशा
सूर्य के समानांतर किन्तु उस दिशा के विपरीत हो जाती है जब पिछली बार उसकी दिशा
सूर्य के समानांतर थी। इस तरह वर्ष भर में चार बार पृथ्वी पर सूर्य के प्रकाश के
पड़ने की स्थितियों में परिवर्तन होता है, चार बार बसन्त सम्पात, ग्रीष्म अयनान्त,
शरद सम्पात एवं शीत अयनान्त क्रम से घटित हुआ करते हैं एवं चार बार ऋतुओं में
परिवर्तन होता है।
पृथ्वी
के गोले को ठीक बीचो–बीच से इसे दो भागों में बाँटती हुई इसकी भूमध्य रेखा का तल
क्रांतिवृत्त के तल को उतने ही अंश पर काटता है जितना पृथ्वी का झुकाव होता है अतः
इन ऊपर वर्णित चारो स्थितियों में पृथ्वी के स्थिति क्रान्तिवृत्तीय तल के आधार पर
भी बदलती है। दो बार जब पृथ्वी के अक्ष का झुकाव सूर्य के समानान्तर हुआ करता है
तब सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधे लम्बवत पड़ती है किन्तु अन्य दो स्थितियों
में एक बार पृथ्वी क्रांतिवृत्त से कुछ ऊपर होती है और तब सूर्य की किरणें दक्षिणी
गोलार्द्ध में मकर रेखा पर तथा एक बार जब पृथ्वी क्रान्तिवृत्त से कुछ नीचे होती
है तब सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत पड़ती हैं। कर्क
रेखा एवं मकर रेखा पृथ्वी की भूमध्य रेखा से क्रमशः उत्तर एवं दक्षिण गोलार्द्ध
में कल्पित दो रेखाएं हैं जिनकी स्थिति भूमध्य रेखा से उतनी ही उत्तर तथा उतनी ही
दक्षिण कल्पित है जितना पृथ्वी की नति का कोण हुआ करता है।
पृथ्वी का यह झुकाव हमेशा
एक जैसा नहीं रहता। वर्तमान में यह झुकाव भी लगभग ४६.८ सेकेण्ड प्रति शताब्दी
(सौ वर्षों में ४६ विकला ४८ प्रतिविकला) की
बहुत धीमी गति से घट रहा है। पृथ्वी का यह अक्षीय झुकाव एक प्राकृतिक चक्र (जिसे Milankovitch
Cycles नाम दिया गया है) के तहत प्रतेक ४१,००० वर्षों में २२.१ अंश से २४.५
अंश के बीच बदलता रहता है और इसका कारण यह है कि पृथ्वी के अक्ष का उत्तरी सिरा एक
कल्पित बिन्दु (ध्रुव तारे की स्थिति) के चतुर्दिक पराक्रमा सा करता है जैसे किसी लट्टू
का ऊपरी सिरा डगमगाया करता है। इस वृत्तीय डगमगाहट को रैखिक अक्ष पर देखें तो यह
एक सिरे से दूसरे सिरे तक अपना झुकाव परिवर्तित करता हुआ प्रतीत होता है। ४१०००
वर्षों में यह झुकाव २२ कला ६ विकला से बढता हुआ २४ कला ३० विकला तक उन्नत होता है
और फिर वहाँ से घटते हुए पुनः २२ कला ६ विकला तक आ जाता है।
अब चूंकि पृथ्वी का अक्ष
झुका है; झुके हुए अक्ष के लम्बवत तथा पृथ्वी के केन्द्र से हो कर जाने वाली काट
पर है पृथ्वी की भूमध्य रेखा; इस भूमध्य रेखा के समान्तर उत्तर एवं दक्षिण दिशा
में दो अन्य रेखाएं हैं कर्क एवं मकर रेखा; पृथ्वी का झुकाव परिवर्तनशील है; और
रुचिकर बात यह भी है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा का पथ या इसको व्युत्क्रम
से समझें तो जिस पथ पर सूर्य पृथ्वी से देखने पर गतिमान दिखाई देता है उसका अक्ष
तथा पृथ्वी की भूमध्य रेखा का अक्ष भी सदैव उतना ही रहता है जितने कोण पर पृथ्वी
का झुकाव है अर्थात्? अर्थात् यदि पृथ्वी की नति परिवर्तित होती है तो भूमध्य रेखा
एवं क्रांतिवृत्त का कोण भी परिवर्तित होता है और पृथ्वी की नति जितने अंश की होती
है, पृथ्वी की भूमध्य–रेखा के परितः कल्पित चकती और सूर्य–पथ वाले दीर्घवृत्त वाली
चकती का कोण उतना ही होता है अतः सम्पात बिन्दुओ एवं अयनांत बिन्दुओं में परिवर्तन
स्वाभाविक है। व्यावहारिक रूप से यह परिवर्तन इतना सूक्ष्म है कि इसे नगण्य मान
लिया जाता है।
अब जब पृथ्वी का यह नति–परिवर्तन
इतना सूक्ष्म है तो इसे लेकर इतना कठोर होने की क्या आवश्यकता है? है आवश्यकता! यद्यपि
यह परिवर्तन कुछेक वर्षो में नगण्य सा ही रहता है, फिर भी दीर्घ–अवधि में यह
पर्याप्त प्रभावी होता है अतः गणितीय दृष्टिकोण से इस नति को स्वीकार करना ही होगा
और यदि पृथ्वी की नति परिवर्तित होगी तो इन दोनों रेखाओं की स्थिति भी परिवर्तित
होगी और जब गणित एवं सिद्धान्त की बात होगी और दशकों एवं शताब्दियों की नहीं बल्कि
हजारों वर्षों की बात होगी तो सत्य यही है कि भूमध्य रेखा से पृथ्वी की नति के
तुल्य अंतर पर ही उत्तर की ओर कर्क रेखा रहेगी एवं उतने ही अंतर पर दक्षिण की ओर
मकर रेखा। महाकाल्लेश्वर की स्थिति २३°१०’५८” उत्तर अक्षांश
पर है और कभी कर्क रेखा यहाँ से हो कर जाती थी किन्तु आज के दिनों में, जब २३
दिसंबर २०२६ को शरद सम्पात के क्षण ००:०५ सार्वभौम समय तदनुसार ०५:३५ प्रातः
भारतीय मानक समय पर समय पृथ्वी की नति २३°२६’१६”४८”‘थी अतः
कर्क रेखा का आधुनिक वास्तविक अक्षांश २३°२६’१६”४८”‘है अतः
कर्क रेखा उज्जयिनी के महाकालेश्वर से लगभग २८ किलोमीटर उत्तर की ओर खिसक चुकी है।
विशेष ध्यातव्य यह भी है कि इस वर्तमान कर्क–रेखा के अत्यन्त सन्निकट २३°२७’२७” उत्तर पर भी एक अत्यन्त पुरातन शिवालय “खकपर्ता शिवमंदिर” विद्यमान
है जो झारखंड के लोहरदगा जिले में खकपरता ग्राम में है और एक संरक्षित पुरास्थल के
रूप में अभिलिखित है।
‘ख’के अनेक अर्थों में से
एक अर्थ खगोलीय पिंडों से भी है – और ‘क’ के
अनेक अर्थों में से कुछ अर्थ हैं – सूर्य,
प्रजापति, संवत्सर, काल/समय तथा ग्रन्थि। पर्ता अथवा परता अपभ्रंशित है। मूल शब्द
प्रता रहा होगा! प्रता शब्द प्रतन् से व्युत्पन्न है जिसके अर्थ व्युत्पत्ति एवं
विस्तार दोनों हैं। अथर्ववेद ८.७.४ में “प्रतन्वतीः ओषधीः” हो, या शुक्ल यजुर्वेद
वाजसनेयी संहिता १३.२१ में “या शतेन प्रतनोषि” हो, या ऋग्वेद में ही “प्रतन्वज्जनय
गिरः” हो, इन सभी के व्याज से प्रता शब्द विस्तार–बोधक है। भर्तृहरि ने नीति–शतक ३.२४ में “ख्यातस्त्वम् विभ्वैर्यशान्सि कवयो
दिक्षु प्रतन्वन्ति नः” और माघ ने शिशुपालवध (२.३०) में “तदूरीकृत्य
कृतिभिर्वाचस्पत्यम् प्रतायते” कह कर प्रतन् (प्र + तन्) का विस्तृत करने अर्थ में
ही प्रयोग किया है अतः “खकपर्ता” वास्तव में अपने मूल में “खकप्रता” रहा होगा और
सोद्देश्य रहा होगा। इस नाम का निहितार्थ “नक्षत्र एवं ग्रह–मण्डल का सूर्य,
प्रजापति, संवत्सर, काल/समय तथा काल–ग्रन्थि के सापेक्ष वितन्वन या विस्तारी–करण
है। चूंकि वर्तमान आलेख का विषय “खकपर्ता शिवमंदिर” नहीं है अतः इस सम्बन्ध में
पुनः कभी!
वार्षिक गति के समय
पृथ्वी की चार स्थितियों का जो वर्णन ऊपर किया गया है वे स्थितियाँ दो बार भूमध्य
रेखा के साथ तथा एक–एक बार कर्क एवं मकर रेखा के साथ सम्बन्ध रखती हैं। इन
स्थितियों में दो बार सूर्य से आने वाली किरणें भूमध्य रेखा पर लम्बवत होती है जिस
समय पृथ्वी पर दिन एवं रात लगभग समान अवधि के होते हैं तथा एक बार तब, जब सूर्य भूमध्य रेखा से ऊपर की ओर
जाता प्रतीत होता है और इसे बसन्त विषुव कहा जाता है और एक बार तब जब सूर्य भूमध्य
रेखा से दक्षिण की ओर जाता प्रतीत होता है जिसे शरद विषुव कहा जाता है। जब सूर्य
की किरणें कर्क रेखा से लम्बवत होती हैं और इस दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे लम्बा
दिन एवं सबसे छोटी रात होती है (दक्षिणी गोलार्ध में इसका उलटा होता है)। यह दिन
ग्रीष्म अयनांत का होता है। जब सूर्य की किरणे मकर रेखा से लम्बवत होती हैं तो उस
दिन उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन एवं सबसे लम्बी रात हुआ करती है (दक्षिणी
गोलार्ध में उलटा होता है)। यह दिन शीत अयनांत का होता है। ये चारो खगोलीय घटनायें
प्रतिवर्ष लगभग तीन महीने के अंतराल पर हुआ करती हैं और विशेष यह भी है कि ये
घटनाएं जब–जब होती हैं तब तब क्रांतिवृत्त पर सूर्य की स्थिति परस्पर पिछली खगोलीय–स्थिति
से सटीक ९० अंश पर ही हुआ करती है अतः ये चार घटनाएँ वसंत–विषुव, ग्रीष्म अयनांत,
शरद विषुव तथा शीत अयनांत के समय क्रांति वृत्त पर सूर्य पृथ्वी के सापेक्ष चार
ऐसे बिन्दुओं पर हुआ करता है जो क्रमशः ९० अंश के अंतराल पर होते हैं और यही चार
बिन्दु एक स्वस्तिक का निर्माण करते हैं। आगे से इन चार बिन्दुओं को ऋतु–बिन्दु के
नाम से उल्लिखित किया जायेगा।
बसन्त विषुव के दिन चूंकि
सूर्य उस बिन्दु पर होता है जहाँ सूर्य का भ्रमण–पथ (क्रांतिवृत्त) तथा भूमध्य
रेखा का विस्तारित तल एक दूसरे को काटते हैं, सायन मान से इसे रेवती नक्षत्र एवं
अश्विनी नक्षत्र की संधि एवं मीन तथा मेष राशि की संधि मानते हैं। निरयण मान से यह
किस बिन्दु पर प्राप्त होगा यह तात्कालिक अयनांश साधित गणना द्वारा ही ज्ञात किया
जा सकता है। पाश्चात्य ज्योतिष निरयण मान को स्वीकार नहीं करता किन्तु आर्ष—ज्योतिष
या वैदिक ज्योतिष सायन एवं निरयण दोनों को स्वीकार करता है क्योंकि अनन्त
विस्तीर्ण अन्तरिक्ष में किसी भी बिन्दु या पिण्ड की स्थिति का निर्धारण दो एनी
बिन्दुओ के सापेक्ष जितनी सटीकता से हो सकता है उतनी सटीकता से किसी एक बिन्दु के
सापेक्ष सम्भव ही नहीं है। अतः आर्ष—वैदिक—भारतीय ज्योतिष नक्षत्रों की स्थिति एवं
बसन्त सम्पात की स्थिति दोनों के आधार पर ग्रहों, या ज्योतिषीय बिन्दुओं की स्थिति
का निर्धारण करता है। इसके आधार पर चित्रा नक्षत्र के योगतारे को स्थिर मान कर
उसके ठीक १८० अंश पर रेवती नक्षत्र एवं अश्विनी नक्षत्र की सन्धि पड़ती है। तथा
चूंकि समय के साथ परिक्रमा पथ पर विषुव एवं अयनांत के बिन्दु क्रमशः पीछे की ओर भी
सरक रहे हैं, इनकी पश्चवर्ती गति ही अयन—चलन तथा रेवती एवं अश्विनी के सन्धि से
बसन्त सम्पात के अंतर को अयनांश कहा जाता है। यद्यपि नक्षत्रों की स्थिति को स्थिर
माना अवश्य गया है किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। दीर्घकालिक अंतराल पर नक्षत्रों
में भी एक निश्चित विचलन देखा गया है।
विषुव बिन्दुओं से ही
ऋतुओं का निर्धारण हुआ करता है। वसन्त विषुव से वसंत का आगमन तथा वर्ष का प्रारम्भ
भी माना जाता रहा है। निरयण मान से यही बसन्त विषुव कभी मृगशिरा में पड़ता था, फिर
यह रोहिणी में पड़ने लगा, फिर कभी कृतिका नक्षत्र की सीध में भी पड़ता रहा, फिर भरणी
में, फिर अश्विनी में पड़ने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब वराहमिहिर के समय में बसन्त
विषुव रेवती तथा अश्विनी के संधि पर भी पडा था।
जब बसन्त विषुव रेवती तथा
अश्विनी के संधि पर पडा तब उस मास में पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सूर्य से ठीक १८०
अंश पर चित्रा क्षेत्र के भीतर रहा और इस कारण हमारा वर्ष–प्रारम्भ चैत्र से
प्रारम्भ होना माना गया जो मान्यता अब तक चल रही है यद्यपि आज के दिनों बसन्त
विषुव निरयण मान से रेवती तथा अश्विनी के संधि पर नहीं बल्कि निरयण मान से पूर्वा–भाद्रपद
के ०२°२६’३२” पर पड़ता है। इस वर्ष विक्रम संवत २०८३ (ईस्वी सन २०२६) में चारो
ऋतु–बिन्दुओं की स्पष्ट स्थिति निम्नवत है जो भू–केन्द्रीय सूर्य के निरयण
क्रान्तिवृत्तीय देशांतर के आधार पर हैं तथा तात्कालिक अयनांश के आधार पर उनकी निरयण
नक्षत्रगत स्थिति प्राप्त की गयी है।
|
ऋतु–बिंदु |
सायन देशान्तर |
तात्कालिक अयनांश |
निरयण देशान्तर |
निरयण नक्षत्रगत स्थिति |
|
वसन्त सम्पात |
००°००’०३” |
२४°१३’२४” |
३३५°४६’३१” |
उत्तरभाद्रपद ०२°२६’३२” |
|
ग्रीष्म अयनान्त |
९०°००’००” |
२४°१३’३७” |
६५°४६’२३” |
मृगशीर्ष १२°२६’२३” |
|
शरद सम्पात |
१८०°००’०४” |
२४°१३’५०” |
१५५°४६’१०” |
हस्त ०९°०६’१०” |
|
शीत अयनान्त |
२७०°००’०५” |
२४°१४’०२” |
२४५°४६’०३” |
मूल ०५°४६’०३” |
उपरोक्त तालिका में आप देख सकते हैं कि चारो ऋतु–बिन्दुओं का वृत्तीय
परिप्रेक्ष्य में क्रमशः अंतराल ९० अंश का ही है और गणितीय मान में अंतर यदि कुछ
है तो विकला में है, और वह भी इस कारण है कि गणना में हर तीन महीने के बाद का
स्पष्ट अयनांश गणना में प्रयोग किया गया है जो इस आलेख में आगे नहीं किया जाएगा,
क्योंकि वास्तविक मानों में अंतर बहुत कम है तथा गणना में समय अधिक लगता है।। ये
चार बिन्दु ही वास्तव में एक स्वस्तिक रच सकने में सक्षम बिन्दु हैं।
अब पुनः प्राकृत विषय पर
लौटें और यदि हम मान लें कि ऋषि का अभिप्राय इस स्वस्तिक से ही था तो चूंकि ऋषि
द्वारा सङ्केतित नक्षत्रों की परास ऋतू—बिन्दुओं के नब्बे अंश के अंतराल वाले इस पूर्वबंध
से कदापि मेल नहीं खाती और तब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि यदि ऋषि का अभिप्राय
इसी स्वस्तिक से था तो ऋषि ने इन्ही चार नक्षत्रों को ही अपने मन्त्र में स्थान
क्यों दिया? दिशा का सङ्केत करना हो अथवा ऋतू—बिन्दुओं का, यदि परस्पर समकोण पर
चार नक्षत्र चुनना था तो रेवती एवं चित्रा के साथ पुनर्वसु एवं उत्तराषाढ़ को ही
चुनना चाहिये था! ये दोनों तो रेवती और चित्रा से सटीक नब्बे अंश पर प्राप्त होने
की स्थिति में हैं।
जब प्रश्न किसी अन्य का
हो तो उससे बच कर निकल जाना अपेक्षाकृत सरल हुआ करता है किन्तु जब प्रश्न स्वयं का
हो और स्वयं से ही किया गया हो तो उससे बच सकना बहुत कठिन है। ऐसे प्रश्न एक बेताल
की भाँति विक्रम के शीश पर बैठे अहर्निश उसके कपाल पर ठोकर देते रहते हैं – “देख
विक्रम! यदि इस प्रश्न का उत्तर नहीं देगा तो तेरे शीश के सौ टुकड़े हो जायेंगे।”
अतः सबसे पहले एक ऋतु–बिन्दु
को पकड़ते हैं। माना वह बसन्त सम्पात है। और हमारे समक्ष चार नक्षत्र हैं – रेवती, पुष्य,
चित्रा एवं श्रवण ।
रेवती में बसन्त सम्पात की
घटना तो बहुत निकट के वर्षों की है। निरयण मान के अनुसार वसन्त सम्पात (Vernal
Equinox) ईसा की छठी शताब्दी में लगभग ४९९ ईस्वी से ५७२ ईस्वी के
आसपास रेवती नक्षत्र में पड़ा करता था। ज्योतिषीय गणनाओं और ऐतिहासिक खगोलीय
ग्रंथों जैसे सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय के अनुसार, ४९९
ईस्वी से ५७२ ईस्वी के मध्य वसंत सम्पात रेवती नक्षत्र के अंतिम बिंदु तारा जीटा
पिसियम पर था। स्पष्ट है कि वैदिक ऋषि के समय बसन्त सम्पात रेवती में नहीं था।
यद्यपि “को बड़ छोट कहत
अपराधू” फिर भी मन्त्र में उल्लिखित नक्षत्र पुष्य को बसन्त सम्पात हेतु ग्रहण
नहीं किया जा सकता क्योंकि मन्त्र में वह दूसरे अर्धांश में तथा अंतिम है अतः
सहायक की श्रेणी में है। वह बिन्दु ग्रीष्म अयनान्त या शीत अयनान्त का हो सकता है।
और प्रथम रेखा के अन्त्य—बिन्दुओं को तो स्वयं ऋषि ने ही निर्धारित कर दिया है –
चित्रा एवं रेवती। अतः बसन्त सम्पात के बिन्दु के लिये रेवती के बाद चित्रा नक्षत्र
को ही ग्रहण करना होगा जिसकी समान विभाजन के आधार पर नक्षत्र–चक्र में स्थिति १७३०२०’००”
से १८६०४०’००” तक तथा असमान विभाजन के आधार पर १७१०१७’३५”
से १८४०२८’१०” तक है।
अभी स्थूल गणना करते हैं और
सामान्य समान विभाजन के आधार पर रेवती एवं अश्विनी की सन्धि पर (शून्य अंश पर)
बसन्त सम्पात ईस्वी सन २८५ में था तथा अयन चलन का मान ५० विकला १६ प्रतिविकला १२
प्रतिप्रतिविकला (५०.२७”) प्रति वर्ष की दर से है तो एक अंश का अयन चलन ७१ वर्ष ७
माह १० दिन १८ घंटे ४८ मिनट और ३७ किंवा ३८ सेकेण्ड (७१.६१३२८ = माना ७१.६) वर्षों
में होता है। अतः
१७३०२०’००” से ०००००’००” तक आने में ९३०२०’००”×७१.६ वर्ष =१२४११ वर्ष।
१८६०४०’००” से ०००००’००” तक आने में १८६०४०’००”×७१.६ वर्ष=१३३६५ वर्ष।
इनमें शून्य अयनांश के माने गये २८५ वर्ष जोड़ दें तो १२६९६ से १३६५० वर्ष ईसा
पूर्व तक बसन्त सम्पात चित्रा नक्षत्र में हुआ करता था।
ऊपर वर्णित एक उदाहरण में
जहाँ हमने माना है कि यदि एक बिन्दु सायन मान से १७९०५९’५५” पर या
चित्रा में ०६०३९’५५” पर हो। इस बिन्दु पर सम्पात के पहुँचने के लिये
पश्चवर्ती विस्थापन
= {(१७९०५९’५५” – १७३०२०’००”)/१३०२०’००”}×९५४ = ४७६.९ वर्ष (माना ४७७ वर्ष)
अतः १२६९६ ईसा पूर्व से ४७७ वर्ष पूर्व = १३१७३ ईसा पूर्व या इसके निकट कुछ
वर्षों में बसन्त सम्पात १७९०५९’५५” पर चित्रा नक्षत्र के ६०३९’५५”
पर या उसके सन्निकट रहा होगा।
अब तक की ये गणनायें
स्थूल मान से तथा स्थूल विधि से की गयी थीं और वह इस कारण कि कम से कम एक ऐसे
बिन्दु तक तो पहुँचा जाये जहाँ से सूक्ष्म गणनाओं को प्रारम्भ किया जा सके!
क्योंकि अयनांश का परिशुद्ध मान ५० विकला १६ प्रतिविकला १२ प्रतिप्रतिविकला (५०.२७”)
आज के युग का अयनांश है तथा दीर्घकालिक वर्षों में इसका मान परिवर्तित होता रहा है
फिर भी सूक्ष्म गणना के लिये प्रवृत्त होने हेतु एक सन्निकट मान तो चाहिये ही था। गणना करने के लिये अपनी गणितीय समझ के अतिरिक्त इस परिकल्पना
को पुष्टि देने हेतु मेरे पास न तो समय था और न ही समुचित संसाधन, फिर भी मन में
निरन्तर चीत्कार करते इस प्रश्न को मैंने पूरे एक वर्ष दिया।
१२५६० ईसा से १३२०० ईसा
पूर्व तक के लिये मध्यमान वर्ष ग्रहण करते हुए निरंतर गणना के पश्चात् १२५९६ ईसा पूर्व हेतु वह स्पष्ट मान प्राप्त हुआ जब निरयण
मान से बसन्त सम्पात १७९°५९’१५” पर चित्रा नक्षत्र में था।
उस अवधि में पृथ्वी की माध्य नति २४°१०’११.२०” तथा वास्तविक
नति २४°१०’१८.५०” (नूतन—चलन/Nutation
प्रभाव सहित) थी। इसी को आगे के गणना हेतु
चुना गया। इस आधार पर ९० अंश के अंतराल पर
चारो ऋतु–बिन्दुओं का लगभग मान निम्नवत है –
१२५९६ ईसा
पूर्व— चारों तात्कालिक ऋतु—बिन्दु
|
ऋतु—बिन्दु |
तात्कालिक अयनांश |
पृथ्वी की माध्य नति |
पृथ्वी की वास्तविक नति |
सायन मान |
निरयण मान |
निरयण नक्षत्र एवं स्थिति |
|
बसन्त सम्पात |
१७९°५९’१५” |
२४°१०’११.२०” |
२४°१०’१८.५०” |
००°००’००.००” |
१७९°५९’१५” |
चित्रा ६°३९’१५” |
|
ग्रीष्म अयनान्त |
१७९°५९’११.२” |
२४°१०’१८.५०” |
२४°१०’१६.१०” |
९०°००’००.००” |
२६९°५९’११.२०” |
उत्तराषाढ़ा ३°१९’११.२०” |
|
शरद् सम्पात |
१७९°५९’०७.५” |
२४°१०’१०.५०” |
२४°१०’१९.२०” |
१८०°००’००.००” |
३५९°५९’०७.५०” |
रेवती १३°१९’०७.५०” |
|
शीत अयनान्त |
१७९°५९’०३.८०” |
२४°१०’१०.१०” |
२४°१०’१५.४०” |
२७०°००’००.००” |
०८९°५९’०३.८०” |
पुनर्वसु ९°५९’०३.८०” |
Solving a problem is a triangulation
of explanation, prediction and testing in th e context of a th eory in context
of background—knowlwdge. किसी भी समस्या का समाधान एक चरणबद्ध त्रिकोणीय
प्रक्रिया होती है जिसमें ‘समस्या की व्याख्या’, ‘संभावित समाधान’तथा उस ‘समाधान
का उपलब्ध ज्ञान, सिद्धान्त एवं प्रमाणों के आधार पर परीक्षण’सम्मिलित होते
हैं। उपलब्ध ज्ञान, सिद्धान्त एवं प्रमाण
के रूप में मेरी परिकल्पना को पुष्टि की ओर ले जा सकने अथवा इस परिकल्पना के पूर्णतया
निरसन हेतु ज्योतिर्विज्ञान की तीन अवधारणायें सक्षम हैं किन्तु तीन में कोई एक नहीं
बल्कि तीनों। और वे अवधारणायें थी जिनमें प्रथम तो यही कि नक्षत्रों की वास्तविक
परास १३ अंश २० कला की नहीं है और यह समान विभाजन मात्र गणितीय सरलता की दृष्टि से
किया गया विभाजन है तथा उनका वास्तविक मान अर्द्धाभोगा, एकभोगा, और अध्यर्द्धभोगा नियम
द्वारा प्राप्त परिमाण के तुल्य होता है जो बताया जा चुका है, और दूसरी यह कि –पृथ्वी
के भिन्न–भिन्न स्थानों पर, यहाँ तक कि भूमध्य रेखा पर भी, नक्षत्रों एवं राशियों
का दृश्य परास उनके मान्य परिमाण के समान नहीं है।
यह वज्र–धारणा, कि
राशियों की परास ३० अंश एवं नक्षत्रों का परास–मान १३०२०’००” है जबकि
आर्ष–वैदिक ज्योतिष में यह धारणा मान्य नहीं है। आर्ष–वैदिक ज्योतिष की मान्यता यह
है कि राशियाँ एवं नक्षत्र समान मान के नहीं हैं जो इसी आलेख में पहले स्पष्ट किया
जा चुका है। पुनः आर्ष–वैदिक ज्योतिष द्दृग्–गणित आधारित है और किसी स्थान के
सापेक्ष राशियों एवं नक्षत्रों की परास उनको आवंटित मान के तुल्य नहीं बल्कि उस
स्थान–विशेष से देखने पर जो कोण अंतरित होता हो उसके तुल्य मानी जानी चाहिये। भूमध्य
रेखा पर भी कोई द्रष्टा किस स्थान पर है इसके आधार पर नक्षत्रों एवं राशियों की
दृश्य परास उनके गणितीय मान से छोटी या बड़ी हो सकती है, बल्कि होती ही है। इसी
सिद्धान्त के आधार पर ही राशियों की ह्रस्व–सम–दीर्घ मान्यता आधारित है। साधारण
चित्रकार भी दृष्टि–परास की इस विषमता को समझता है। राशियों की परास ३० अंश एवं
नक्षत्रों का परास मान १३०२०’००” गणितीय आधार पर एक सामान्य विभाजन है जो
पृथ्वी के केंद्र के आधार पर है और हम पृथ्वी के केंद्र पर नहीं बल्कि उसके पृष्ठ
पर स्थित हैं। जब भूमध्य रेखा के निरक्ष बिन्दु पर भी राशियों एवं नक्षत्रों की
परास इस मानक–विभाजन के अनुरूप नहीं है तो पृथ्वी के अन्य स्थानों से देखने पर तो
इनकी परास और भी व्यतिक्रमित मान वाली हुआ करती है। और मान लीजिये कि पृथ्वी अपने
सूर्य–परिक्रमा के भ्रमण काल में अश्विनी की सीध से चित्रा की सीध में पहुँच गयी
तो क्या द्रष्टा के लिये नक्षत्रों के परास का कोण वही होगा जो तब था जब पृथ्वी
अश्विनी की सीध में थी? इसी कारण हमारे आर्ष–ज्योतिषियों ने राशियों एवं नक्षत्रों
का लङ्कोदय एवं स्वदेशोदय मान निकालने का गणित हमें बताया था।
लङ्कोदय शब्द से इस भ्रम
में नहीं पड़ना चाहिये कि लङ्कोदय का अर्थ आज की श्रीलङ्का में राशियों या
नक्षत्रों का उदयमान है। ऋषियों का तात्पर्य तो रावण की उस वास्तविक प्राचीन लङ्का
से था जो निरक्ष बिन्दु पर थी और कभी की समुद्र–गर्भ में विलीन हो चुकी। आज की
श्रीलङ्का तो कभी सिहल द्वीप के नाम से जानी जाती थी जो बाद में सीलोन हुई और २२
मई १९७२ को लङ्का और बाद में १९७८ में श्रीलङ्का कर दिया गया। किन्तु कुबेर की
वास्तविक लङ्का का नाम लङ्का पड़ा ही इस कारण था कि वह पृथ्वी के निरक्ष बिन्दु पर
थी अतः लङ्का एक स्थान का नाम तो था ही, इस शब्द का खगोल एवं ज्योतिष से सम्बंधित अपना
एक विशेष अर्थ भी है।
लं पृथिव्यात्मकम्। एकाक्षर कोश के अनुसार ल
पृथ्वी–वाचक वर्ण है। और अङ्का अर्थात गोद में! ल अङ्के भाति स लङ्का। जो पृथ्वी
की गोद में है वह लङ्का है। पृथ्वी की गोद कहाँ है? जहाँ सबकी गोद होती है वहीं –
क्षैतिज एवं उर्ध्वाधर रूप से केंद्र में; और भले ही आज पृथ्वी की शून्य देशांतर
रेखा (जीरो मेरिडियन लाइन) ग्रीनविच से हो कर खीची गयी मानी जा रही है किन्तु अनादि
काल से विश्व को खगोल एवं ज्योतिष का ज्ञान देने वाले हमारे ऋषियों एवं ज्योतिषियों
ने इस शून्य देशांतर रेखा को उत्तरी ध्रुव से रोहितक (आधुनिक रोहतक), अवन्ती (उज्जैन) और सन्निहित सरोवर (कुरुक्षेत्र) को मिलाने वाली काल्पनिक
रेखा के रूप में परिभाषित किया है, जो परिभाषा हमारे दासता के दिनों में ईस्वी सन
१८८४ में हमसे छीन ली गयी अन्यथा हमारे ज्योतिष—ग्रन्थ उस लङ्का एवं उससे हो कर जा
रही शून्य याम्योत्तर रेखा की पहचान स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर गये हैं –
लङ्का कुमारी नगरी च काञ्ची पानाटमद्रिश्च सितः षडास्यः ।
श्रीवत्सगुल्मं च पुरी ततश्च माहिष्मती चोज्जयिनी प्रसिद्धा ॥
स्यादाश्रमोऽस्मान्नगरं
सुरम्यं ततः पुरं पट्टशिवाभिधानम् ।
श्रीगर्गराटं च सरोहिताक्षस्थानेश्वरं शीतगिरिः सुमेरुः ॥
इतीव
याम्योत्तरगां धराया रेखामिमां गोलविदो वदन्ति ।
अन्यानि रेखास्थितिभाजि लोके ज्ञेयानि तज्ज्ञैः पुटभेदनानि ॥
—
श्रीपति, सिद्धान्तशेखर, श्लोक ९५–९७
[लङ्का, कन्याकुमारी, काञ्चीपुरम, अपर्णाऽर्द्रि (कर्णतसित्तचल – कर्नाटक
क्षेत्र का एक पहाड़ी स्थल), कर्नाटक के बेल्लारी जनपद में स्थित कुमारस्वामी
मंदिर, श्रीवत्सगुल्म (वाशिम–महाराष्ट्र), पुरी, माहिस्माती जो उज्जयिनी के नाम से
प्रसिद्ध है, रुहेलखण्ड (रोहिणी खण्ड जहाँ इस ग्रन्थ के रचयिता श्रीपति का आश्रम
था), पट्टशिवाभिधान – (आज का पट्टसीमा – आन्ध्रप्रदेश) श्रीगर्गराट (उज्जैन से
उत्तर की ओर स्थित प्राचीन नगरी), रोहिताक्ष (कहीं कहीं इसे ही रोहीतक या रोहितक भी कहा गया है, आज का रोहतक), स्थानेश्वर (थानेसर
– कुरुक्षेत्र) और शीतगिरि सुमेरु (उत्तरी ध्रुव) यह पृथ्वी की याम्योत्तर रेखा
है।)
बटेश्वर सिद्धान्त में यही तथ्य तनिक
रूपांतर के साथ है –
लङ्का कुमारी तु ततस्तु काञ्ची
मानाटमश्वेतपुरी त्वथोदक् ।
श्वेतोऽचलोऽस्मादपि वात्स्यगुल्मं पूः
स्यादवन्ती त्वतु गर्गराटम् ॥ १ ॥
आश्रमपत्तनमालवनगरे पट्टशिवमेव
रोहितकम् ।
स्थाण्वीश्वरस्तु हिमवान्
मेरुलेखाध्वकर्म नास्त्येषाम्
यल्लङ्कोञ्जयिनीपुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशत् ।
सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः ॥
और भास्कराचार्य सिद्धान्त शिरोमणि,
ग्रहगणित में कहते हैं:
अर्थात् जिस रेखा का सूत्र लङ्का–उज्जयिनी
आदि स्थानों से होकर मेरु की ओर जाता है, विद्वानों ने उसे
पृथ्वी की मध्यरेखा कहा है।
राक्षसालयदेवौकःशैल्योर्मध्यसूत्रगा।
रोहितकमवन्ती च यथा सन्निहितं सरः॥
(सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार अध्याय १, श्लोक ६२)
यह शून्य देशांतर रेखा राक्षसों के निवास स्थान राक्षसालय (लंका / भूमध्य
रेखा पर स्थित एक काल्पनिक संदर्भ बिन्दु जहाँ राक्षस–राज रावण की नगरी थी। यह कवि–स्वातंत्र्य
है जो लङ्का के प्रचलित एवं मान्य अर्थ को प्रयोग करने की सुविधा देता है।) और देवताओं
के निवास स्थान (इसे भी कवि–स्वातंत्र्य ही समझें जो मेरु पर्वत/उत्तरी ध्रुव का
परिचायक है) को आपस में मिलाने वाली सीधी रेखा है। यह काल्पनिक रेखा मार्ग में रोहितक
(आधुनिक रोहतक), अवन्ती (उज्जयिनी) और सन्निहित सरोवर (कुरुक्षेत्र) जैसे प्रमुख स्थानों
से होकर जाती है।
पुनः ब्रह्मगुप्त के
ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त में भी स्पष्ट उल्लेख है कि
उज्जयिनीरोहितककुरुयमुनाहिमनिवासिमेंरूणां।
देशान्तरं न कार्यं तल्लेखामध्यसंस्थत्वात् ॥
उज्जयिनी, रोहितक, कुरु,
यमुना, हिमनिवासी और मेरु—इनका देशान्तर–संस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये
उस रेखा (शून्य देशान्तर रेखा) के मध्य स्थित हैं। अन्य देशान्तर के लिये संस्कार
आवश्यक है। अस्तु।
भास्कराचार्य अपने
सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय श्लोक १६ में
भचक्रपादास्तिथिविनाडिकाभिः पृथक् समुद्यन्ति निरक्षदेशे।
चक्रार्धमाद्यं च तथा द्वितीयं सर्वत्र पूर्णाग्निमिताभिरेव ॥१६॥
भूमध्यरेखीय अर्थात् निरक्ष प्रदेश में (भी) राशिचक्र के विभिन्न भाग समान
समय में नहीं, बल्कि अपने–अपने निश्चित उदयकाल में क्षितिज पर आते हैं।
साथ ही इसी अध्याय में वे आगे कहते हैं कि —
तदाश्रितं खे जलयन्त्रवत्तथा भ्रमद्भचक्रं निजमस्तकोपरि॥४८॥
उदग्दिशं याति यथा यथा नरः तथा तथा खान्नतमृक्षमण्डलम् ।
उदग्ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षितेः तदन्तरे योजनजाः पलांशकाः॥४९॥
यह श्लोक निरक्षदेश से उत्तर की ओर जाने पर आकाशीय ध्रुव और भचक्र में ऋक्ष
मण्डलम् – नक्षत्र–मण्डल की स्थिति बदलने का गोलकीय सिद्धान्त देते हैं।
सूर्यसिद्धान्त—त्रिप्रश्नाधिकार, ३.४१–४४ में लङ्कोदयासु की मूल गणना की विधि दी हुई
है –
त्रिभद्यु–कर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ।
क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक् पृथक् ॥४१॥
स्वाधोधः परिशोध्याथ मेषाल्लङ्कोदयासवः ।
खागाष्टयोऽर्थगोगैकाः शरत्र्यङ्कहिमांशवः ॥४२॥
यहाँ एक राशि, दो राशियों और तीन राशियों के उदयासु निकालने के लिए त्रिभुज–ज्यामिति (जो
आज त्रिकोणमिति कही जाती है) दी गयी है जिन्हें क्रमशः घटाकर मेष, वृषभ और मिथुन के लङ्कोदयासु प्राप्त किये जाते हैं। मेष के लिए १६७०, वृषभ के
लिए १७९५ और मिथुन के लिए १९३५ असु का निर्देश है।
पुनः श्लोक ३.४३ में लङ्कोदय से स्वदेशोदय प्राप्त करने हेतु
स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥४३॥ अर्थात् अपने देश के चरखण्ड को लङ्कोदयासु
से घटाने पर स्वदेशोदयासु मिलता है।
तथा ३.४४ में शेष अन्य राशियों हेतु विधान है –
व्यस्ता व्यस्तैः स्वैः स्वैः कर्कटाद्यास्ततस्त्रयः ।
उत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास्तुलादयः ॥४४॥
अर्थात् मेष–वृषभ–मिथुन से कर्कादि तथा फिर तुलादि राशियों के उदयासु निकाले जाते हैं।
सिद्धान्तशिरोमणि — गोलाध्याय, त्रिप्रश्नाधिकार, ५४–५९ में
भास्कराचार्य ने इसी गणना को और अधिक ज्यामितीय रूप में दिया है।
एकस्य राशेर्बृहती ज्यका या द्वयोस्त्रिभस्यापि कृतिकृतानाम् ।
स्वस्वापमज्याकृतिवर्जितानां मूलानि तासां त्रिगुणा हतानि ॥५४॥
स्वस्वद्यु–मौर्व्यं विभजेत् फलानां चापान्यधोऽधः परिशोधितानि ।
क्रमोत्क्रमस्थानि निरक्षदेशे मेषादिकानामुदयासवः स्युः ॥५५॥
यहाँ स्पष्टतः निरक्षदेशे मेषादिकानामुदयासवः कहा गया है—अर्थात् यही लङ्कोदय/निरक्षोदय की गणना है।
पुनः श्लोक ५६
में –
कीटादिराश्यन्तजकोटिजीवास्त्रिज्या
गुणाः स्वस्वदिनज्ययाप्ताः ।
चापीकृताः प्राग्वदधो विशुद्धाः कीटादिकानामुदयासवो वा ॥५६॥
मकरादि से मीन तक उसी निरक्षोदय को उलटे क्रम में निकालने की पद्धति है।
और श्लोक ५७ में तीसरी और भी सरल विधि
मेषादिजीवास्त्रिगृहद्यु–मौर्व्या क्षुण्णा हृताः स्वस्वदिनज्यया वा ।
चापीकृताः प्राग्वदधो विशुद्धा मेषादिकानामुदयासवः स्युः ॥५७॥
ज्योतिषियों हेतु विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि गणना–पद्धति सरल है। यहाँ
मेषादि राशियों की ज्या × त्रिगृहद्यु–मौर्वी ÷ स्वस्वदिनज्या, फिर चाप और क्रमिक शोधन द्वारा उदयासु निकाले जाते हैं और उन असुओं को कोणीय मान में परिवर्तित कर लिया जाता है।
श्लोक ५८–५९ में स्वदेशोदय निकलने की विधि बताते हुए भास्कराचार्य कहते हैं –
निरक्षस्वदेशाकर्षोदययोरन्तरं
चरम् ।
निरक्षे स्वदेशे च मेषादिः सममुदेति ।
कि निरक्षोदय से चरखण्ड के संस्कार द्वारा स्वदेशोदय प्राप्त होगा।
वटेश्वरसिद्धान्त — त्रिप्रश्नाधिकार, अध्याय ८, लग्नादिविधि
श्लोक: १–६ में वटेश्वराचार्य ने सीधे “लङ्कोदयप्राणाः” शब्द का प्रयोग किया है जो मूल
लङ्कोदय सूत्र है –
अजवृषमिथुनान्तज्या मिथुना
तद्युज्यया हता भक्ताः ।
स्वरूपद्युज्ययाप्तधनुरन्तराणि लङ्कोदयप्राणाः ॥१॥
मेष, वृषभ और मिथुनान्त की ज्याओं को परमाल्पद्युज्या से गुणित करके अपनी–अपनी
द्युज्या से भाग देने पर प्राप्त चापों के क्रमिक अन्तर लङ्कोदयप्राण हैं।
पुनः वैकल्पिक गणना के रूप में
क्रान्तिज्या राशिज्या
कृतिविवरपदे हता त्रिभज्याप्ताः ।
स्वद्युज्ययाप्तधनुषो विवराण्यथवा निरक्षराश्युदयाः ॥२॥
यहाँ सीधे लङ्कोदय = निरक्ष–राश्युदय कहा गया है।
ते चाङ्कागाङ्गभुवो व्यस्तास्तथा चरदलोनयुता निजदेशे षट्सु चोत्क्रमतः ॥५॥
निजसप्तम उदयासुभिरस्तं राशिः समेति नियमेन ।
लङ्कोदयासुभिः स्वैर्याम्योत्तरवृत्तमायाति ॥६॥
यहाँ लङ्कोदयासु और स्वदेशीय चरखण्ड के सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है।
ब्रह्मगुप्त के खण्डखाद्यक में लङ्कोदय के संख्यात्मक मान और फिर स्वदेशोदय
का प्रत्यक्ष नियम मिलता है। जहाँ मेष के लिये वसुभानि २७८, वृष के लिये छिद्रनवयमाः
२९९ मिथुन के लिये त्रिरदाः ३२३ आदि संख्याएं
दी हुई हैं।
वसुभानि, छिद्रनवयमाः, त्रिरदाः आदि
संख्याबोधक संज्ञाओं के उपयोग एवं अङ्कानाम बामतो गतिः के सिद्धान्त पर लिखी
संख्याएं हैं।
फिर मूल नियम:
स्वचरार्धोनाव्यस्ता व्यस्तयुताः स्वोदयविनाड्यः ॥४॥
अर्थात् लङ्कोदय में अपने चरार्ध का संस्कार करके स्वोदय–विनाड़ी प्राप्त
की जाती हैं। मेष २७८, वृषभ २९९, मिथुन ३२३ को लङ्कोदय–खण्डक बताया गया है
और आगे इन्हीं से स्वदेशोदय बनाने की पूरी प्रक्रिया समझायी गयी है।
सूर्यसिद्धान्त — त्रिप्रश्नाधिकार के श्लोक ४२ से
४५ तक एक साथ इस प्रकार हैं –
मत्स्यद्वयान्तरयुतेस् त्रिस्पृक्सूत्रेण भाभ्रमः ।
त्रिभद्युकर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः ॥ ४२ ॥
[भचक्र में स्थित राशियों और उनके परस्पर अन्तर को त्रिस्पृक्–सूत्र आदि की ज्यामितीय प्रक्रिया से निर्धारित किया जाता है। तीन राशियों से संबंधित कर्ण के अर्धभाग के गुणनफल को आधे दिन–रात के मान से विभाजित किया जाता है।]
क्रमाद् एकद्वित्रिभज्यास् तच्चापानि पृथक् पृथक् ।
स्वाधोऽधः परिशोध्याथ मेषाल् लङ्कोदयासवः ॥ ४३ ॥
[क्रमशः एक, दो और तीन ज्या (अर्थात् संबंधित ज्या–मान) लेकर उनके चाप अलग–अलग निर्धारित किये जाएँ। फिर उन्हें उनके उचित क्रम में घटाकर मेष से आरम्भ होने वाले लङ्कोदय के असु प्राप्त होते हैं।]
खागाष्टयोऽर्धगोऽगैकाः शरत्र्यङ्कहिमांशवः ।
स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥ ४४ ॥
[(पिछली गणना से प्राप्त) राशियों के उदयमानों में स्वदेश के चरखण्ड का उचित रूप से घटाव किया जाए; इस प्रकार अभीष्ट अथवा स्वदेशीय उदय के असु प्राप्त होते हैं।]
व्यस्ता व्यस्तैर् युताः स्वैः स्वैः कर्कटाद्यास् ततस् त्रयः ।
उत्क्रमेण षडेवैते भवन्तीष्टास् तुलादयः ॥ ४५ ॥
[इसके बाद कर्क आदि तीन राशियों के उदयमान अपने–अपने विपरीत राशियों के मानों के साथ विपरीत क्रम में लिये जाएँ। इसी प्रकार क्रम बदलकर तुला आदि छह राशियों के अभीष्ट उदयमान निर्धारित होते हैं।] इसी के साथ सिद्धान्तशिरोमणि, गोलाध्याय में श्लोक १६ से भास्कराचार्य द्वारा बताया गणित अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण है –
भचक्रपादास्तिथिविनाडिकाभिः
पृथक् समुद्यन्ति निरक्षदेशे ।
चक्रार्धमाद्यं च तथा द्वितीयं
सर्वत्र पूर्णाग्निमिताभिरेव ॥ १६ ॥
[निरक्षदेश (भूमध्यरेखीय देश) में भचक्र के विभिन्न भाग अलग–अलग नाड़ी–विनाड़ी के मान से उदित होते हैं। चक्र के दोनों अर्धभागों में उदय की यह व्यवस्था होती है और उनके उदयमान निश्चित माप से व्यक्त किये जाते हैं।]
मेषादेर्मिथुनान्तो नाडीभिस्तिथिमिताभिरुद्वृत्ते ।
लगति कुजे तदधःस्थे प्रथमं ताभिश्चरोनाभिः ॥ २० ॥
[मेष से मिथुन के अन्त तक के भाग का उदय निश्चित नाड़ी–मानों से होता है। जब संबंधित बिन्दु उस स्थिति में आता है, तब उन उदयमानों में चर से उत्पन्न संशोधन किया जाता है।]
कन्यान्ताङ्घनुषोऽन्तस्तिथिमितनाडीभिरुद्वलये।
लगति कुजे चोर्ध्वस्थे पश्चात् ताभिश्चराव्याभिः ॥ २१ ॥
[कन्या के अन्त से धनु के अन्त तक के राशिभागों के उदय भी निश्चित नाड़ी–मान से होते हैं। संबंधित स्थिति के अनुसार बाद में चर से संबंधित संशोधन किया जाता है।]
तद्रहितविंशद्भिः कन्यान्तो वा झषान्तो वा ।
चरखण्डैरूनाढ्यास्तेन निरक्षोदयाः स्वदेशे स्युः ॥ २२ ॥
[उक्त उदयमानों से आवश्यक मान घटाकर और चरखण्डों द्वारा उचित संशोधन करके, निरक्षदेश के उदयमानों से स्वदेश के उदयमान प्राप्त होते हैं।]
क्षितिजेऽजादिं कृत्वा गोलं भ्रमयन् प्रदर्शयेत् सर्वम् ।
उक्तमनुक्तं चान्यच्छिष्याणां बोधजननार्थम् ॥ २३ ॥
[क्षितिज पर मेष आदि को स्थापित करके गोल को घुमाते हुए सम्पूर्ण प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से दिखाना चाहिए, ताकि कही हुई तथा जो नहीं कही गयी हैं, ऐसी अन्य बातें भी शिष्यों को समझ में आ जाएँ।]
यह
श्लोक बताता है कि भास्कराचार्य इस विषय को केवल संख्यात्मक नियम के रूप में नहीं, बल्कि भ–गोल (celestial sphere) की प्रत्यक्ष ज्यामितीय
कल्पना द्वारा समझाने की बात कर रहे हैं।
स्पष्ट है कि निरक्ष देश पर अर्थात शून्य अक्षांश एवं शून्य देशांतर पर भी
राशियों की परास का मान समान नहीं है क्योंकि वह समान विभाजन पृथ्वी को केंद्र मान
कर किया गया है और द्रष्टा की स्थिति केंद्र पर नहीं, पृथ्वी की परिधि पर है। तो
भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण तथा शून्य देशांतर से पूरब या पश्चिम के किसी
स्थान पर राशियों एवं नक्षत्रों की परास समान कैसे हो सकती है? वह भी तब, जब
पृथ्वी निरंतर अपना स्थान भी परिवर्तित करती रहती है!
किन्तु स्वदेशोदय किसी स्थान–विशेष का होता है और एक ही क्षण हेतु भिन्न–भिन्न
स्थानों हेतु स्वदेशोदय का मान भिन्न–भिन्न प्राप्त होता है। मैंने १२५९६ ईसा
पूर्व नक्षत्रों का स्व्देशोदय ज्ञात करने हेतु जनकपुर
(वर्तमान में नेपाल में स्थित जनकपुर धाम) तथा अहिल्याधाम अहियारी, जाले, दरभंगा का चयन किया और दोनों के अक्षांश एवं
देशान्तर पर नक्षत्रों का स्व्देशोदय मान प्राप्त करने का निश्चय किया। समय के साथ
स्थानों के अक्षांश एवं देशांतर नहीं बदलते और जनकपुर तथा अहिल्याधाम का चुनाव एक
विशिष्ट प्रयोजन से किया गया। क्यों? अभी इस प्रश्न को
स्थगित रखिये। पहले मैं अपनी जिज्ञासा शांत कर लूँ तो आपकी जिज्ञासा भी शान्त कर
दूंगा।
चूंकि शास्त्रों में राशियों के स्वदेशोदय प्राप्त करने की विधि व्याख्यायित
है और प्राकृत विषय राशियों की नहीं नक्षत्रों की परास पर आधृत है अतः उस विधि को
नक्षत्रों पर आरोपित करके गणना हेतु माने गये निश्चित आधार एवं आर्ष गणितीय विधि को आधुनिक गणितीय परम्परा में परिवर्तित करने के पश्चात् गणना हेतु उस काल के स्थिरांक एवं गणना विधि इस प्रकार है –
|
वर्ष |
१२५९६ ईसा पूर्व |
|
खगोलीय वर्ष |
−१२५९५ |
|
जनकपुर अक्षांश एवं
देशान्तर |
२६°४३’४३.८” उत्तर, ८५°५५’३४.६”
पूर्व |
|
अहिल्याधाम अक्षांश एवं
देशान्तर |
२६°१८’३६.८६” उत्तर ८५°४८’५२” पूर्व |
|
पृथ्वी की माध्य नति |
२४°१०’११.२०” |
|
पृथ्वी की वास्तविक नति |
२४°१०’१८.५०” |
|
विशुद्ध चित्रपक्षीय निरयण
अयनांश |
१७९°५९’१५” |
|
विषुव पर सूर्य का सायन
देशान्तर |
०°००’००” |
|
समय–बिन्दु: |
१२५९६ ईसा पूर्व वसन्त
सम्पात का क्षण |
गणना के मुख्य सूत्र (जिससे यदि कोई चाहे तो स्वयं गणना कर
सके) इस प्रकार हैं –
स्वदेशोदय
की गणना हेतु प्रत्येक नक्षत्र–सीमा के लिए :
α=atan2(sinλ
cosε
/cosλ)
δ=sin−1(sin ε
sin λ)
फिर स्थानीय दिगंश–संशोधन/accessional
difference: A=sin−1(tanϕ
tanδ)
और स्थानीय उदयांश Ω=α−A
अतः किसी नक्षत्र का स्वदेशोदय: ΔΩ=Ω2−Ω1
नक्षत्र–सीमा में प्रयुक्त निरयण
देशान्तर तालिका में दिया गया है। किसी नक्षत्र–सीमा के लिए पहले विशुद्ध
चित्रपक्षीय अयनांश से उसका तत्कालीन सायन/ उष्णकटिबन्धीय देशांतर ecliptic
longitude लिया गया। फिर
α=tan−1 {(sin
λ
cos ε)/
cos λ} तथा δ=sin−1
(sinε
sinλ) से नक्षत्र–सीमाओं के निर्देशांक ज्ञात किये गये।
जनकपुर के अक्षांश (ϕ) पर नक्षत्रों के पूर्वोदय का घण्टा–कोण
(H our–Angle) H
0=cos−1(−tanϕ tanδ) से ज्ञात किया गया है। इसलिए नक्षत्र सीमा का उदय–बिन्दु Θrise=α−H
0 और प्रत्येक नक्षत्र का स्वदेशोदय
= दोनों सीमाओं के Θrise का अन्तर है। कोनों के मान
भचक्र के सन्दर्भ में 0∘ से 360∘
तक एवं नक्षत्रों के सन्दर्भ में उनके प्रारम्भ से आगणित मान के
रूप में लिये गये हैं। निरयण मान हेतु विशुद्ध चित्रपक्षीय अयनांश – संस्कार किया गया है।
यहाँ सूत्रों में प्रयुक्त चर :
·
λ
(लैम्ब्डा) = क्रान्तिवृत्तीय
देशान्तर(Ecliptic Longitude) — वसन्त सम्पात से पूर्व दिशा
में मापा गया कोण।
·
ε
(एप्सिलॉन) = पृथ्वी की नति /
क्रान्तिवृत्त की तिर्यकता (Obliquity of th e Ecliptic) — विषुववृत्त
और क्रान्तिवृत्त के बीच का कोण।
·
α
(अल्फा) = Righ t Ascension (विषुवांश) — खगोलीय विषुववृत्त पर वसन्त सम्पात से
पूर्व की ओर मापा गया कोण।
·
δ
(डेल्टा) = Declination (क्रान्ति)
— खगोलीय विषुववृत्त से उत्तर (+) या दक्षिण (−) की ओर कोणीय दूरी।
·
“देशोदय” को
स्थानीय अक्षांश पर क्रान्तिवृत्तीय सीमा–बिंदुओं के (oblique
ascension/rising arc) के रूप में लिया है—अर्थात्
प्रत्येक नक्षत्र के प्रारम्भ और अन्त के बीच जितना स्थानीय उदयमान चाप बनता है
उसका मान ही देशोदय है। यह वही ज्यामितीय अर्थ है जिसका मान किसी क्रान्तिवृत्तीय
बिंदु के उदय के अनुरूप विषुवतीय चाप (oblique ascension) के
बराबर है।
· जनकपुर के लिये अक्षांश ϕ
= २६°४३’४३.८” उत्तर तथा अहिल्याधाम के लिये अक्षांश ϕ
= २६°१८’३६.८६”
उत्तर लिया गया है जो उन स्थानों के वास्तविक अक्षांश हैं।
·
१२५९६ ईसा पूर्व बसन्त
सम्पात के दिन पृथ्वी की गणना द्वारा प्राप्त वास्तविक नति
ε
= २४°१०’१८.५०” ली
गयी है।
·
ब्रह्मसिद्धान्तीय असमान
भोग–सीमाएँ पिछले चरण की ही हैं तथा असमान परास के लिये गणना अलग से की गयी है जो सिद्धान्त–शिरोमणि (भास्कराचार्य) के पाठ के
अनुसार ६ नक्षत्र अध्यार्ध–भोगी, ६ अर्ध–भोगी और शेष १५
एक–भोगी बताये गये हैं तथा अभिजित् को शेष चक्रांश से निकाला जाता है।
·
१२५९६ ईसा पूर्व स्थान जनकपुर
के लिये समान भोग (१३ अंश २० कला) के आधार पर २८ नक्षत्रों का स्वदेशोदय निम्नवत
है। अभिजित को उत्तराषाढा का अंतिम १/४ भाग तथा श्रवण का प्रारम्भिक १/१५ भाग
प्रदत्त है –
१२५९६
ईसा पूर्व — जनकपुर — समान
भोग पर २८ नक्षत्रों का स्वदेशोदय
|
क्रम |
नक्षत्र |
क्रान्तिवृत्तीय
विस्तार |
भोग
मान |
देशोदय
आरम्भ |
देशोदय
अन्त |
स्वदेशोदय |
|
१ |
अश्विनी |
००°००’००”–१३°२०’००” |
१३°२०’००” |
००°००’००” |
११°३८’००” |
११°३८’००” |
|
२ |
भरणी |
१३°२०’००”–२६°४०’००” |
१३°२०’००” |
११°३८’००” |
२३°२८’००” |
११°५०’००” |
|
३ |
कृत्तिका |
२६°४०’००”–४०°००’००” |
१३°२०’००” |
२३°२८’००” |
३६°०६’००” |
१२°३८’००” |
|
४ |
रोहिणी |
४०°००’००”–५३°२०’००” |
१३°२०’००” |
३६°०६’००” |
५०°४६’००” |
१४°४०’००” |
|
५ |
मृगशीर्ष |
५३°२०’००”–६६°४०’००” |
१३°२०’००” |
५०°४६’००” |
६६°५८’००” |
१६°१२’००” |
|
६ |
आर्द्रा |
६६°४०’००”–८०°००’००” |
१३°२०’००” |
६६°५८’००” |
८३°४०’००” |
१६°४२’००” |
|
७ |
पुनर्वसु |
८०°००’००”–९३°२०’००” |
१३°२०’००” |
८३°४०’००” |
१००°००’००” |
१६°१८’००” |
|
८ |
पुष्य |
९३°२०’००”–१०६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१००°००’००” |
११४°४६’००” |
१४°४६’००” |
|
९ |
आश्लेषा |
१०६°४०’००”–१२०°००’००” |
१३°२०’००” |
११४°४६’००” |
१२७°५६’००” |
१३°१०’००” |
|
१० |
मघा |
१२०°००’००”–१३३°२०’००” |
१३°२०’००” |
१२७°५६’००” |
१३९°५६’००” |
१२°००’००” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी |
१३३°२०’००”–१४६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१३९°५६’००” |
१५१°०४’००” |
११°०८’००” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी |
१४६°४०’००”–१६०°००’००” |
१३°२०’००” |
१५१°०४’००” |
१६१°३४’००” |
१०°३०’००” |
|
१३ |
हस्त |
१६०°००’००”–१७३°२०’००” |
१३°२०’००” |
१६१°३४’००” |
१७१°३६’००” |
१०°०२’००” |
|
१४ |
चित्रा |
१७३°२०’००”–१८६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१७१°३६’००” |
१८१°४६’००” |
१०°१०’००” |
|
१५ |
स्वाती |
१८६°४०’००”–२००°००’००” |
१३°२०’००” |
१८१°४६’००” |
१९२°१६’००” |
१०°३०’००” |
|
१६ |
विशाखा |
२००°००’००”–२१३°२०’००” |
१३°२०’००” |
१९२°१६’००” |
२०३°२४’००” |
११°०८’००” |
|
१७ |
अनुराधा |
२१३°२०’००”–२२६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२०३°२४’००” |
२१५°२४’००” |
१२°००’००” |
|
१८ |
ज्येष्ठा |
२२६°४०’००”–२४०°००’००” |
१३°२०’००” |
२१५°२४’००” |
२२८°३४’००” |
१३°१०’००” |
|
१९ |
मूल |
२४०°००’००”–२५३°२०’००” |
१३°२०’००” |
२२८°३४’००” |
२४३°२०’००” |
१४°४६’००” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा |
२५३°२०’००”–२६६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२४३°२०’००” |
२५९°३८’००” |
१६°१८’००” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा |
२६६°४०’००”–२७६°४०’००” |
१०°००’००” |
२५९°३८’००” |
२७३°३४’००” |
१३°५६’००” |
|
२२ |
अभिजित् |
२७६°४०’००”–२८०°५३’२०” |
०४°१३’२०” |
२७३°३४’००” |
२७९°०६’००” |
०५°३२’००” |
|
२३ |
श्रवण |
२८०°५३’२०”–२९३°२०’००” |
१२°२६’४०” |
२७९°०६’००” |
२९२°३०’००” |
१३°२४’००” |
|
२४ |
धनिष्ठा |
२९३°२०’००”–३०६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२९२°३०’००” |
३०८°४२’००” |
१६°१२’००” |
|
२५ |
शतभिषा |
३०६°४०’००”–३२०°००’००” |
१३°२०’००” |
३०८°४२’००” |
३२३°२२’००” |
१४°४०’००” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा |
३२०°००’००”–३३३°२०’००” |
१३°२०’००” |
३२३°२२’००” |
३३६°००’००” |
१२°३८’००” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा |
३३३°२०’००”–३४६°४०’००” |
१३°२०’००” |
३३६°००’००” |
३४७°५०’००” |
११°५०’००” |
|
२८ |
रेवती |
३४६°४०’००”–३६०°००’००” |
१३°२०’००” |
३४७°५०’००” |
३६०°००’००” |
११°३८’००” |
पूर्ण चक्र की जाँच: ∑१–२८देशोदय=३६००००’००”
विशेष : अभिजित् का देशोदय–परास=०५०३२’००”
है जबकि उसका क्रान्तिवृत्तीय भोग ४०१३’२०” था
जो उत्तराषाढ़ा के अंतिम पद एवं श्रवण के प्रारम्भ के १/१५ भाग के योग—तुल्य है और
इसी कारण उत्तराषाढ़ा से उसका अंतिम पद तथा श्रवण से उसका प्रारम्भिक पन्द्रहवां
भाग कम कर दिए गये हैं क्योंकि यह अंश अभिजित् को प्रदत्त है।
१२५९६
ईसा पूर्व — जनकपुर — असमान
भोग पर २८ नक्षत्रों का स्वदेशोदय
इस गणना हेतु अन्य
स्थिराङ्क पूर्ववत हैं किन्तु नक्षत्रों के असमान विभाजन के मान का
क्रान्तिवृत्तीय भोग: –
- एकभोग नक्षत्रों की परास = १३°१०’३५”
- अर्धभोग नक्षत्रों की परास = ६°३५’१७.५”
- अध्यर्धभोग नक्षत्रों की परास = १९°४५’५२.५”
- अभिजित् की परास = ४°१४’१५”
देशोदय के लिए जनकपुर का अक्षांश और १२५९६
ईसा पूर्व की क्रान्तिवृत्त–वक्रता लेकर प्रत्येक नक्षत्र के आदि एवं अन्त की सीमा
का oblique ascension निकाला गया। यही
क्रन्तिवृत्तीय बिन्दु (ecliptic point) के उदय का ज्यामितीय
मान है। गणना के सूत्र पूर्ववत हैं।
|
क्रम |
नक्षत्र |
असमान
क्रान्तिवृत्तीय विस्तार |
असमान
भोग विस्तार |
देशोदय
आरम्भ |
देशोदय
अन्त |
स्वदेशोदय |
|
१ |
अश्विनी |
००°००’००”–१३°१०’३५.००” |
१३°१०’३५.००” |
०°००’००.००” |
१२°२२’५४” |
१२°२२’५४” |
|
२ |
भरणी |
१३°१०’३५.००”–१९°४५’५२.५” |
१९°४५’५२.००” |
१२°२२’५४” |
१८°४५’२५” |
०६°२२’३१” |
|
३ |
कृत्तिका |
१९°४५’५२.५–३२°५६’२७.५” |
१९°४५’५३.००” |
१८°४५’२५” |
३१°४७’०८” |
१३°०१’४३” |
|
४ |
रोहिणी |
३२°५६’२७.५–५२°४२’२०” |
१३°१०’३५.००” |
३१°४७’०८” |
५२°१६’२६” |
२०°२९’१८” |
|
५ |
मृगशीर्ष |
५२°४२’२०”–६५°५२’५५” |
०६°३५’१७.००” |
५२°१६’२६” |
६६°५६’५८” |
१४°४०’३२” |
|
६ |
आर्द्रा |
६५°५२’५५”–७२°२८’१२.५” |
१९°४५’५३.००” |
६६°५६’५८” |
७४°३१’३८” |
७°३४’४०” |
|
७ |
पुनर्वसु |
७२°२८’१२.५”–९२°१४’०५” |
१३°१०’३५.००” |
७४°३१’३८” |
९६°५७’५२” |
२२°२६’१४” |
|
८ |
पुष्य |
९२°१४’०५”–१०५°२४’४०” |
०६°३५’१७.००” |
९६°५७’५२” |
१११°२७’२७” |
१४°२९’३५” |
|
९ |
आश्लेषा |
१०५°२४’४०”–१११°५९’५७.५” |
१३°१०’३५.००” |
१११°२७’२७” |
११८°३६’१२” |
०७°०८’४५” |
|
१० |
मघा |
१११°५९’५७.५”–१२५°१०’३२.५” |
१३°१०’३५.००” |
११८°३६’१२” |
१३२°२७’२४” |
१३°५१’१२” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी |
१२५°१०’३२.५”–१३८°२१’०७.५” |
१९°४५’५३.००” |
१३२°२७’२४” |
१४५°४८’०६” |
१३°२०’४२” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी |
१३८°२१’०७.५”–१५८°०७’००” |
१३°१०’३५.००” |
१४५°४८’०६” |
१६५°१६’५६” |
१९°२८’५०” |
|
१३ |
हस्त |
१५८°०७’००”–१७१°१७’३५” |
१३°१०’३५.००” |
१६५°१६’५६” |
१७७°५६’४१” |
१२°३९’४५” |
|
१४ |
चित्रा |
१७१°१७’३५”–१८४°२८’१०” |
०६°३५’१७.००” |
१७७°५६’४१” |
१९०°१३’४५” |
१२°१७’०४” |
|
१५ |
स्वाती |
१८४°२८’१०”–१९१°०३’२७.५” |
१९°४५’५३.००” |
१९०°१३’४५” |
१९६°१७’२३” |
०६°०३’३८” |
|
१६ |
विशाखा |
१९१°०३’२७.५”–२१०°४९’२०” |
१३°१०’३५.००” |
१९६°१७’२३” |
२१५°००’१५” |
१८°४२’५२” |
|
१७ |
अनुराधा |
२१०°४९’२०”–२२३°५९’५५” |
०६°३५’१७.००” |
२१५°००’१५” |
२२८°०४’३१” |
१३°०४’१६” |
|
१८ |
ज्येष्ठा |
२२३°५९’५५”–२३०°३५’१२.५” |
१३°१०’३५.००” |
२२८°०४’३१” |
२३४°४३’२३” |
६°३८’५२” |
|
१९ |
मूल |
२३०°३५’१२.५”–२४३°४५’४७.५” |
१३°१०’३५.००” |
२३४°४३’२३” |
२४८°३०’५८” |
१३°४७’३५” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा |
२४३°४५’४७.५”–२५६°५६’२२.५” |
१९°४५’५३.००” |
२४८°३०’५८” |
२६३°०८’१८” |
१४°३७’२०” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा |
२५६°५६’२२.५”–२७६°४२’१५” |
०४°१४’१५.००” |
२६३°०८’१८” |
२८५°०७’००” |
२१°५८’४२” |
|
२२ |
अभिजित् |
२७६°४२’१५”–२८०°५६’३०” |
०४°१४’१५.००” |
२८५°०७’००” |
२८९°४२’१५” |
४°३५’१५” |
|
२३ |
श्रवण |
२८०°५६’३०”–२९४°०७’०५” |
१३°१०’३५.००” |
२८९°४२’१५” |
३०३°३३’२०” |
१३°५१’०५” |
|
२४ |
धनिष्ठा |
२९४°०७’०५”–३०७°१७’४०” |
१३°१०’३५.००” |
३०३°३३’२०” |
३१८°०८’४०” |
१४°३५’२०” |
|
२५ |
शतभिषा |
३०७°१७’४०”–३१३°५२’५७.५” |
०६°३५’१७.००” |
३१८°०८’४०” |
३२५°३०’५५” |
७°२२’१५” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा |
३१३°५२’५७.५”–३२७°०३’३२.५” |
१३°१०’३५.००” |
३२५°३०’५५” |
३३९°२९’२०” |
१३°५८’२५” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा |
३२७°०३’३२.५”–३४६°४९’२५” |
१९°४५’५३.००” |
३३९°२९’२०” |
३५०°२२’४०” |
१०°५३’२०” |
|
२८ |
रेवती |
३४६°४९’२५”–३६०°००’००” |
१३°१०’३५.००” |
३५०°२२’४०” |
३६०°००’००.००” |
९°३७’२०” |
पूर्ण चक्र की जाँच: ∑१–२८देशोदय=३६००००’००”
विशेष : अभिजित् का देशोदय–परास=४०४६’३७.१५”
(लगभग) है जबकि उसका क्रान्तिवृत्तीय भोग ४०१४’१५” था।
यहाँ असमान भोगों का योग १५ ×
१३°१०’३५” + ६ × ६°३५’१७.५” + ६ × १९°४५’५२.५” = ३५५°४५’४५” है, अतः शेष ३६०° − ३५५°४५’४५” = ४°१४’१५” स्वाभाविक
रूप से अभिजित् का भोग बनता है। यही कारण है कि इस असमान–विभाजन में अभिजित् का मान
४°१४’१५” आता है।
इसी
प्रकार १२५९६ ईसा पूर्व अहिल्याधाम के लिये समान भोग (१३ अंश २० कला) के आधार
पर २८ नक्षत्रों का स्वदेशोदय निम्नवत है –
|
क्रम |
नक्षत्र |
क्रान्तिवृत्तीय
विस्तार |
भोग
मान |
देशोदय
आरम्भ |
देशोदय
अन्त |
स्वदेशोदय |
|
१ |
अश्विनी |
००°००’००”–१३°२०’००” |
१३°२०’००” |
०°००’००.००” |
१२°३१’४०” |
१२°३१’४०” |
|
२ |
भरणी |
१३°२०’००”–२६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१२°३१’४०” |
२५°१०’००” |
१२°३८’२०” |
|
३ |
कृत्तिका |
२६°४०’००”–४०°००’००” |
१३°२०’००” |
२५°१०’००” |
३८°०२’१०” |
१२°५२’१०” |
|
४ |
रोहिणी |
४०°००’००”–५३°२०’००” |
१३°२०’००” |
३८°०२’१०” |
५१°१७’४०” |
१३°१५’३०” |
|
५ |
मृगशीर्ष |
५३°२०’००”–६६°४०’००” |
१३°२०’००” |
५१°१७’४०” |
६५°०८’००” |
१३°५०’२०” |
|
६ |
आर्द्रा |
६६°४०’००”–८०°००’००” |
१३°२०’००” |
६५°०८’००” |
७९°२३’४०” |
१४°१५’४०” |
|
७ |
पुनर्वसु |
८०°००’००”–९३°२०’००” |
१३°२०’००” |
७९°२३’४०” |
९४°०८’००” |
१४°४४’२०” |
|
८ |
पुष्य |
९३°२०’००”–१०६°४०’००” |
१३°२०’००” |
९४°०८’००” |
१०९°०६’००” |
१४°५८’००” |
|
९ |
आश्लेषा |
१०६°४०’००”–१२०°००’००” |
१३°२०’००” |
१०९°०६’००” |
१२३°५८’१०” |
१४°५२’१०” |
|
१० |
मघा |
१२०°००’००”–१३३°२०’००” |
१३°२०’००” |
१२३°५८’१०” |
१३८°३३’५०” |
१४°३५’४०” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी |
१३३°२०’००”–१४६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१३८°३३’५०” |
१५२°३२’००” |
१३°५८’१०” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी |
१४६°४०’००”–१६०°००’००” |
१३°२०’००” |
१५२°३२’००” |
१६५°४७’२०” |
१३°१५’२०” |
|
१३ |
हस्त |
१६०°००’००”–१७३°२०’००” |
१३°२०’००” |
१६५°४७’२०” |
१७८°३८’००” |
१२°५०’४०” |
|
१४ |
चित्रा |
१७३°२०’००”–१८६°४०’००” |
१३°२०’००” |
१७८°३८’००” |
१९१°०४’००” |
१२°२६’००” |
|
१५ |
स्वाती |
१८६°४०’००”–२००°००’००” |
१३°२०’००” |
१९१°०४’००” |
२०३°३०’००” |
१२°२६’००” |
|
१६ |
विशाखा |
२००°००’००”–२१३°२०’००” |
१३°२०’००” |
२०३°३०’००” |
२१६°२०’४०” |
१२°५०’४०” |
|
१७ |
अनुराधा |
२१३°२०’००”–२२६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२१६°२०’४०” |
२२९°३६’००” |
१३°१५’२०” |
|
१८ |
ज्येष्ठा |
२२६°४०’००”–२४०°००’००” |
१३°२०’००” |
२२९°३६’००” |
२४३°३४’००” |
१३°५८’१०” |
|
१९ |
मूल |
२४०°००’००”–२५३°२०’००” |
१३°२०’००” |
२४३°३४’००” |
२५८°०९’५०” |
१४°३५’४०” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा |
२५३°२०’००”–२६६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२५८°०९’५०” |
२७३°०२’००” |
१४°५२’१०” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा |
२६६°४०’००”–२७६°४०’००” |
१०°००’००” |
२७३°०२’००” |
२८४°००’००” |
१०°५८’००” |
|
२२ |
अभिजित् |
२७६°४०’००”–२८०°५३’२०” |
०४°१३’२०” |
२८४°००’००” |
२८८°३५’१५” |
४°३५’१५” |
|
२३ |
श्रवण |
२८०°५३’२०”–२९३°२०’००” |
१२°२६’४०” |
२८८°३५’१५” |
२९९°३१’००” |
१०°५५’४५” |
|
२४ |
धनिष्ठा |
२९३°२०’००”–३०६°४०’००” |
१३°२०’००” |
२९९°३१’००” |
३१४°१५’२०” |
१४°४४’२०” |
|
२५ |
शतभिषा |
३०६°४०’००”–३२०°००’००” |
१३°२०’००” |
३१४°१५’२०” |
३२८°३१’००” |
१४°१५’४०” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा |
३२०°००’००”–३३३°२०’००” |
१३°२०’००” |
३२८°३१’००” |
३४२°२१’२०” |
१३°५०’२०” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा |
३३३°२०’००”–३४६°४०’००” |
१३°२०’००” |
३४२°२१’२०” |
३५५°३६’५०” |
१३°१५’३०” |
|
२८ |
रेवती |
३४६°४०’००”–३६०°००’००” |
१३°२०’००” |
३५५°३६’५०” |
३६०°००’००.००” |
४°२३’१०” |
पूर्ण चक्र की जाँच: ∑१–२८देशोदय=३६००००’००”
विशेष : अभिजित् का देशोदय–परास=४०२५’२९.०७”
है जबकि उसका क्रान्तिवृत्तीय भोग ४०१३’२०” था
१२५९६
ईसा पूर्व — अहिल्याधाम — असमान भोग पर २८ नक्षत्रों का स्वदेशोदय
|
क्रम |
नक्षत्र |
क्रान्तिवृत्तीय
विस्तार |
असमान
भोग मान |
देशोदय
आरम्भ |
देशोदय
अन्त |
स्वदेशोदय |
|
१ |
अश्विनी |
००°००’००”–१३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
०°००’००.००” |
१२°२३’४०” |
१२°२३’४०” |
|
२ |
भरणी |
१३°२०’००”–२६°४०’००” |
१९°४५’५२.००” |
१२°२३’४०” |
१८°३८’५०” |
०६°१५’१०” |
|
३ |
कृत्तिका |
२६°४०’००”–४०°००’००” |
१९°४५’५३.००” |
१८°३८’५०” |
३१°२७’२०” |
१२°४८’३०” |
|
४ |
रोहिणी |
४०°००’००”–५३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
३१°२७’२०” |
५१°१९’४०” |
१९°५२’२०” |
|
५ |
मृगशीर्ष |
५३°२०’००”–६६°४०’००” |
०६°३५’१७.००” |
५१°१९’४०” |
६५°३५’२०” |
१४°१५’४०” |
|
६ |
आर्द्रा |
६६°४०’००”–८०°००’००” |
१९°४५’५३.००” |
६५°३५’२०” |
७२°५७’३०” |
७°२२’१०” |
|
७ |
पुनर्वसु |
८०°००’००”–९३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
७२°५७’३०” |
९४°५६’००” |
२१°५८’३०” |
|
८ |
पुष्य |
९३°२०’००”–१०६°४०’००” |
०६°३५’१७.००” |
९४°५६’००” |
१०९°५१’४०” |
१४°५५’४०” |
|
९ |
आश्लेषा |
१०६°४०’००”–१२०°००’००” |
१३°१०’३५.००” |
१०९°५१’४०” |
११६°५६’००” |
०७°०४’२०” |
|
१० |
मघा |
१२०°००’००”–१३३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
११६°५६’००” |
१३०°५४’१०” |
१३°५८’१०” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी |
१३३°२०’००”–१४६°४०’००” |
१९°४५’५३.००” |
१३०°५४’१०” |
१४४°०९’३०” |
१३°१५’२०” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी |
१४६°४०’००”–१६०°००’००” |
१३°१०’३५.००” |
१४४°०९’३०” |
१६३°२०’००” |
१९°१०’३०” |
|
१३ |
हस्त |
१६०°००’००”–१७३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
१६३°२०’००” |
१७६°१२’१०” |
१२°५२’१०” |
|
१४ |
चित्रा |
१७३°२०’००”–१८६°४०’००” |
०६°३५’१७.००” |
१७६°१२’१०” |
१८८°४३’५०” |
१२°३१’४०” |
|
१५ |
स्वाती |
१८६°४०’००”–२००°००’००” |
१९°४५’५३.००” |
१८८°४३’५०” |
१९४°५६’००” |
०६°१२’१०” |
|
१६ |
विशाखा |
२००°००’००”–२१३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
१९४°५६’००” |
२१४°०६’३०” |
१९°१०’३०” |
|
१७ |
अनुराधा |
२१३°२०’००”–२२६°४०’००” |
०६°३५’१७.००” |
२१४°०६’३०” |
२२७°२१’५०” |
१३°१५’२०” |
|
१८ |
ज्येष्ठा |
२२६°४०’००”–२४०°००’००” |
१३°१०’३५.००” |
२२७°२१’५०” |
२३४°००’००” |
६°३८’१०” |
|
१९ |
मूल |
२४०°००’००”–२५३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
२३४°००’००” |
२४८°०८’४०” |
१४°०८’४०” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा |
२५३°२०’००”–२६६°४०’००” |
१९°४५’५३.००” |
२४८°०८’४०” |
२६३°०६’५०” |
१४°५८’१०” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा |
२६६°४०’००”–२७६°४०’००” |
०४°१४’१५.००” |
२६३°०६’५०” |
२७७°५९’००” |
१४°५२’१०” |
|
२२ |
अभिजित् |
२७६°४०’००”–२८०°५३’२०” |
०४°१४’१५.००” |
२७७°५९’००” |
२८२°३४’१५” |
४°३५’१५” |
|
२३ |
श्रवण |
२८०°५३’२०”–२९३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
२८२°३४’१५” |
२९३°३०’००” |
१०°५५’४५” |
|
२४ |
धनिष्ठा |
२९३°२०’००”–३०६°४०’००” |
१३°१०’३५.००” |
२९३°३०’००” |
३०८°१४’२०” |
१४°४४’२०” |
|
२५ |
शतभिषा |
३०६°४०’००”–३२०°००’००” |
०६°३५’१७.००” |
३०८°१४’२०” |
३१५°३०’००” |
७°१५’४०” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा |
३२०°००’००”–३३३°२०’००” |
१३°१०’३५.००” |
३१५°३०’००” |
३२९°२०’२०” |
१३°५०’२०” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा |
३३३°२०’००”–३४६°४०’००” |
१९°४५’५३.००” |
३२९°२०’२०” |
३४८°०३’१०” |
१८°४२’५०” |
|
२८ |
रेवती |
३४६°४०’००”–३६०°००’००” |
१३°१०’३५.००” |
३४८°०३’१०” |
३६०°००’००.००” |
११°५६’५०” |
स्पष्ट देखा जा सकता है कि जनकपुर तथा अहिल्याधाम के अक्षांशों पर
नक्षत्रों की परास का देशोदय कितना भिन्न उपलब्ध होता है जबकि ये दोनों स्थान लगभग
सामान देशान्तर पर स्थित हैं। समान परास एवं असमान परास के आधार पर तो देशोदय
भिन्न है ही!
मेरी परिकल्पना को पुष्टि की ओर ले जा सकने हेतु तीन सक्षम अवधारणाओं मे से
दूसरी यह है कि नक्षत्रों की अन्तरिक्ष में स्थिति सदा स्थिर नहीं है। कोई लाख
कहता रहे कि “न क्षरति, न सरति इति नक्षत्र:॥” अर्थात्– ”न हिलने वाला, न चलने वाला, जो स्थिर है उसे नक्षत्र कहते हैं”, किन्तु यह सत्य नहीं है! नक्षत्रों
की स्थिति भी गतिमान है। यह अवश्य है कि उनकी गति इतनी सूक्ष्म है कि नगण्य है अतः
सौ–दो सौ या पांच सौ आदि वर्षों हेतु तो यह परिभाषा मान्य हो सकती है किन्तु
सहस्राब्दियों हेतु विचार करने पर यह असत्य ही सिद्ध होती है। इस प्रकृति में एक
मात्र सत्य यह है कि कुछ भी स्थिर नहीं है। सूर्य तक गतिमान है! अतः जिस काल–खण्ड
पर हम विचार कर रहे हैं उस काल–खण्ड में नक्षत्रों के योग–ताराओं की स्थिति वह
नहीं थी जो आज है। यदि ऐसा न होता तो अभिजित् को अपना ध्रुव–पद छोड़ना नहीं पड़ता!
अब आप पूछेंगे कि योगतारा क्या? बताता हूँ।
प्रत्येक नक्षत्र क्षेत्र के भीतर बड़ी संख्या में तारे (नक्षत्र) होते
हैं। उनमें से कुछ पर्यवेक्षक की नग्न आँखों से दिखाई देते हैं और अन्य का पता मात्र
शक्तिशाली दूरबीनों के उपयोग से ही लगाया जा सकता है। प्रत्येक नक्षत्र क्षेत्र
में, एक विशिष्ट, प्रमुख, स्पष्ट रूप से चमकीले तारे (नक्षत्र) को भारतीय निरयण खगोलविदों द्वारा उस
क्षेत्र के भीतर नक्षत्र मंडल के मुख्य, अधिष्ठाता तारे के
रूप में पहचाना गया है। ऐसे तारे को नक्षत्र मंडल के “योगतारा”
के रूप में नामित और विनिर्दिष्ट किया गया है। भले ही ऐसे तारे का अपना एक नाम
(अंग्रेजी या भारतीय) होता है, लेकिन योगतारा के रूप में
चुने जाने के बाद इसे वही नाम मिल जाता है जो उस नक्षत्र मंडल का होता है जिसका
इसे अधिष्ठाता माना जाता है, जैसे कि अश्विनी योगतारा,
भरणी योगतारा आदि। इस प्रकार पत्येक नक्षत्र मंडलों का प्रतिनिधित्व
करने के लिए उनके विशिष्ट योगतारे निर्धारित किए गए थे/हैं।
सामान्य तौर पर, किसी भी तारे (नक्षत्र) को किसी
नक्षत्र क्षेत्र का ‘योगतारा’चुना और
नामित किया जा सकता है, यदि वह निम्नलिखित पूर्वबन्धों को
पूरा करता हो –
(अ) यह तारा –
प्रमुख, विशिष्ट, दिखने में बहुत
चमकीला और प्रेक्षक की सामान्य नग्न आँखों से आसानी से पहचाने जाने योग्य होना
चाहिए। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसा तारा होना चाहिए जिसका
प्रत्यक्ष दृश्य परिमाण (apparent visual magnitude) (+4) से
कम हो।
(ब) यह पूरी
तरह से उसी नक्षत्र क्षेत्र के भीतर होना चाहिए जिसका यह प्रतिनिधित्व करता है।
खगोलीय भाषा में इसका अर्थ है कि चुने गए तारे का ‘निरयण खगोलीय
रेखांश’(nirayana celestial longitude) उस नक्षत्र क्षेत्र
की रेखांश सीमाओं के भीतर होना चाहिए, जिसका प्रतिनिधित्व
इसे करना है।
और (स)
यह उस नक्षत्र क्षेत्र से बहुत दूर नहीं होना चाहिए जिस पर उसका नियंत्रण
है। अन्य शब्दों में, इसका ‘निरयण खगोलीय
अक्षांश’क्रांतिवृत्त (ecliptic) के
दोनों ओर लगभग चालीस अंश से कम होना चाहिए और यदि संभव हो, तो
यह अपने नक्षत्र क्षेत्र के बिल्कुल भीतर ही होना चाहिये।
भारतीय खगोलविदों, ज्योतिषियों और पञ्चाङ्ग–पंडितों
द्वारा इन पूर्वबंधों को “योगतारा की परिभाषा” के रूप में प्रस्तुत
और स्वीकृत किया गया है। इस प्रकार, नक्षत्र क्षेत्रों के
लिए उनके योगतारे निश्चित किये गये और नक्षत्रों का नाम वही रखा गया जिसका
प्रतिनिधित्व उस क्षेत्र में स्थित वे विशिष्ट योगतारे करते हैं। सूर्यसिद्धान्त नक्षत्रग्रहयुत्याधिकार
में योगताराओं की स्थिति निकालने का हस्त—गुर उल्लिखित है ——
प्रोच्यन्ते लिप्तिका भानाम् स्वभोगो अथ दशाहतः।
भवन्त्य् अतीतधिष्ण्यानाम् भोगलिप्तायुता ध्रुवाः।।
अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चषष्टिर् नगेषवः।
अष्टार्था अब्धयो अष्टागा अङ्गागा मनवस् तथा।।
कृतेषवो युगरसाः शून्यवाणा वियद्रसाः।
खवेदाः सागरनगा गजागाः सागरर्तवः।।
मनवो अथ रसा वेदा वैश्वम् आप्यार्धभोगगम्।
आप्यस्यैवाभिजित् प्रान्ते वैश्वान्ते श्रवणस्थितिः।।
त्रिचतुः पादयोः सन्धौ श्रविष्ठा श्रवणस्य तु।
स्वभोगतो वियन् नागाः षट्कृतिर् यमलाश्विनः।।
रन्ध्राद्रयः क्रमाद् एषाम् विक्षेपाः स्वाद् अपक्रमात्।
दिङ्मासविषयाः सौम्ये याम्ये पञ्च दिशो नव।।
सौम्ये रसाः खम् याम्ये अगाः सौम्ये खार्कास् त्रयोदश।
दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिम्शद् अथोत्तरे।।
याम्य अध्यर्धत्रिककृता नव सार्धशरेषवः।
उत्तरस्याम् तथा षष्टिस् त्रिम्शत् षट्त्रिम्शद् एव हि।
दक्षिणे त्व् अर्धभागस् तु चतुर्विम्शतिर् उत्तरे।
भागाः षड्विम्शतिः खम् च दास्रादीनाम् यथाक्रमम्।।
अशीतिभागैर् याम्यायाम् अगस्त्यो मिथुनान्तगः।
विम्शे च मिथुनस्याम्शे मृगव्याधो व्यवस्थितः।।
विक्षेपो दक्षिणे भागैः खार्णवैः स्वाद् अपक्रमात्।
हुतभुग्ब्रह्महृदयौ वृषे द्वाविम्शभागगौ।।
अष्टाभिस् त्रिम्शता चैव विक्षिप्ताव् उत्तरेण तौ।
गोलम् लब्ध्वा परीक्षेत विक्षेपम् ध्रुवकम् स्फुटम्।।
इन श्लोकों में अश्विनी से लेकर
पूर्वाषाढ़ा तक के योगताराओं के स्वभोग क्रम से ४८, ४० ६५, ५७, ५८, ४, ६८, ७६ १४,
५४, ६४, ५० ६०, ४०, ७४, ७८ ६४, १४, ६ तथा ४ दिये गये हैं। अंकों का उल्लेख
भूतसंख्या विधि में हुआ है जिसमें अङ्कों का निदर्शन अङ्कानाम् वामतो गतिः सिद्धान्त से होता है जैसे —
·
अष्टार्णवाः
= अष्ट (८) और अर्णव/समुद्र (४) अर्थात् ४८
·
शून्यकृताः
= शून्य और युग अर्थात् ४०
·
पञ्चषष्टिर्
= ६५
·
नगेषवः
= ईषु/बाण (५) और नग/पर्वत (७) अर्थात् ७५
·
युगरसाः
= रस (६) और ४ (युग) अर्थात् ६४, इत्यादि।
‘मनवो अथ .. .. श्रविष्ठा श्रवणस्य तु’ में
सिद्धान्तकार यह कुछ विशेष बताता है कि उत्तराषाढ़ का योगतारा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र के
आधे भाग पर स्थित है; अभिजित् का भोग पूर्वाषाढ़ा के अन्त में है; श्रवण का योगतारा
उत्तराषाढ़ के अन्त में है; श्रविष्ठा (धनिष्ठा) का योगतारा श्रवण के तीन चौथाई भाग
की सन्धि पर है। इस प्रकार कुछ विशिष्ट तारों के लिये सिद्धान्तकार ने स्वभोग अलग
से बताये हैं। पुनः शतभिषक् से रेवती तक के भोग क्रमशः ८०, ३६, २२ और ७९ बताये गये
हैं। पुनः अश्विनी से रेवती तक इन तारों के क्रान्ति—वृत्त विक्षेप क्रमशः १२, १२, ५ उत्तर को, ५, १०, ९ दक्षिण को, ६, ०
उत्तर को, ७ दक्षिण ०, १२, १३ उत्तर ११, २ दक्षिण ३७ उत्तर, १.५, ३, ४, ९, ५.५ ५
दक्षिण, ६०, ३०, ३६ उत्तर; ०.५ दक्षिण, २४, २६ और ० उत्तर बताया गया है। अगस्त्य
की स्थिति मिथुन राशि के अन्त में तथा विक्षेप ८० अंश दक्षिण, मृगव्याध(लुब्धक) की
स्थिति मिथुन के २० अंश पर तथा विक्षेप ४० अंश दक्षिण तथा अग्नि एवं ब्रह्महृदय
दोनों की स्थिति वृष राशि के २२ अंश पर तथा विक्षेप क्रमशः ८ अंश तथा ३० अंश उत्तर
की ओर हैं। इस विक्षेप को ही उत्तराक्रान्ति कहते हैं तथा आधुनिक संकेत—प्रणाली
में उत्तर को (+) एवं दक्षिण को (—) चिह्न के साथ प्रदर्शित किया जाता है।
इस हस्त—गुर से किसी योगतारे की स्थिति निकालने की विधि बहुत सरल है। उस
तारे के दत्त—भोग में दस का गुणा कर के उसमें गत नक्षत्रों के कुल सम—भोगांश जोड़
देने पर भचक्र में उनकी निरयण स्थिति प्राप्त हो जाती है जैसे यदि रोहिणी नक्षत्र
के योगतारे की स्थिति ज्ञात करनी हो तो रोहिणी का इस सूत्र में भोग—मान ५७ है तथा
अश्विनी से प्रारम्भ करके अश्विनी, भरणी एवं कृतिका तीन नक्षत्र गत/भुक्त हैं और एक नक्षत्र का समान भोग मान ८०० कला अथवा
१३ अंश २० कला है अतः (५७ × १०) + (३ ×
८००) = ५७० + २४५० कला = २९७० कला = ४९ अंश ३० कला पर रोहिणी के योगतारे की स्थिति
है तथा इसका विक्षेप (उत्तराक्रान्ति) क्रांतिवृत्त से ५ अंश दक्षिण की ओर है।
विशेष रूप से उल्लिखित तारों में सिद्धान्तकार ने उत्तराषाढ़ा को पूर्वाषाढा के आधे
भाग पर अर्थात् पूर्वाषाढ़ा का आधा =४०० कला और इसके पहले के १९ नक्षत्र × ८०० कला = १५६०० कला = २६० अंश पर तथा उत्त्राक्रान्ति ५.५ अंश दक्षिण की
ओर बताया है। इसी प्रकार अभिजित को पूर्वाषाढ़ा के अन्त में कहा है अतः उसकी स्थिति
२६६ अंश ४० कला हुई तथा श्रवण की स्थिति उत्तराषाढ़ के अन्त में अतः २१×८०० = १६८०० कला = २८० अंश पर श्रवण नक्षत्र की स्थिति होगी।
भिन्न—भिन्न सिद्धान्त—ग्रंथों में योगताराओं की स्थिति में कुछ अंतर
प्राप्त होता है किन्तु उसका अर्थ यह नहीं कि यह भिन्नता किसी त्रुटि के कारण है।
भिन्न—भिन्न गणितज्ञों के प्रेक्षण भिन्न समय पर तथा भिन्न स्थान से किये गये अतः
यह अंतर स्वाभाविक है। जैसा कि स्पष्ट किया जा चुका है, इस सृष्टि में कुछ भी
स्थिर नहीं है अतः उन योगतारों की स्थिति भी समय के साथ परिवर्तित होती रही है और ख–मण्डल
की जो स्थिति वाराहमिहिर के समय में थी वह न तो आज है और न वाराहमिहिर–काल से हजार
– दो हजार वर्ष या हजारों वर्ष पहले थी। वर्तमान में उन तारों की स्थिति कुछ अलग
है, वराहमिहिर के समय कुछ अलग थी और ईसा के १२५९६ वर्ष पूर्व तो वह कुछ और ही अलग थी।
२३ सितम्बर २०२६, शरद सम्पात के दिन सभी नक्षत्रों के योगताराओं की निरयण
स्थिति इस प्रकार है –
|
नक्षत्र |
योगतारा |
निरयण देशान्तर |
|
अश्विनी |
अश्विनी —
शेराटन |
१०°०७’४४” |
|
भरणी |
भरणी —
४१ एरिएटिस |
२३°०५’३७” |
|
कृत्तिका |
कृत्तिका —
अल्सायोन |
३६°०९’०५” |
|
रोहिणी |
रोहिणी —
ऐल्डेबारन |
४५°५६’५५” |
|
मृगशिरा |
मृगशीर्ष —
मीसा |
५९°५१’५७” |
|
आर्द्रा |
आर्द्रा —
बेटेलजूस |
६४°५४’४९” |
|
पुनर्वसु |
पुनर्वसु —
पोलक्स |
८९°२२’१३” |
|
पुष्य |
पुष्य —
ऐसेलस ऑस्ट्रेलिस |
१०४°५२’५३” |
|
आश्लेषा |
आश्लेषा —
ε हाइड्री |
१०८°३०’०६” |
|
मघा |
मघा — रेगुलस |
१२५°५९’११” |
|
पूर्वाफाल्गुनी |
पूर्वाफाल्गुनी —
ज़ोस्मा |
१३७°२८’४०” |
|
उत्तराफाल्गुनी |
उत्तराफाल्गुनी —
डेनेबोला |
१४७°४६’२७” |
|
हस्त |
हस्त —
जिएनाह |
१६९°३६’३२” |
|
चित्रा |
चित्रा —
स्पिका |
१८०°००’००” |
|
स्वाती |
स्वाती —
आर्कटूरस |
१८०°२३’३२” |
|
विशाखा |
विशाखा —
ज़ुबेनएलगेनुबी |
२०१°१४’२८” |
|
अनुराधा |
अनुराधा —
ड्शुब्बा |
२१८°४३’४८” |
|
ज्येष्ठा |
ज्येष्ठा —
एंटेरेस |
२२५°५५’१६” |
|
मूल |
मूल — शौला |
२५०°४४’२५” |
|
पूर्वाषाढ़ा |
पूर्वाषाढ़ा—
कॉस ऑस्ट्रेलिस |
२५१°१४’१४” |
|
उत्तराषाढ़ा |
उत्तराषाढ़ा —
नुंकी |
२५८°३२’४०” |
|
अभिजित् |
अभिजित् —
वेगा |
२६१°२८’३६” |
|
श्रवण |
श्रवण —
अल्टेयर |
२७७°५६’२२” |
|
धनिष्ठा |
धनिष्ठा —
डेनेब |
२९२°२९’५८” |
|
शतभिषा |
शतभिषा —
सदाल्मेलिक |
३१२°५२’२४” |
|
पूर्वाभाद्रपद |
पूर्वाभाद्रपदा —
मार्कब |
३२९°३८’३७” |
|
उत्तराभाद्रपद |
उत्तराभाद्रपदा —
अल्जेनिब |
३४५°१८’५१” |
|
रेवती |
रेवती —
ज़ीटा
पाइसियम |
३५६°०२’१४” |
यदि नक्षत्रों की स्थिर परास १३ अंश २०
कला मानी ही जाये तो आज के दिनों की स्थिति के अनुसार आप देख सकते हैं कि सूर्य
सिद्धान्त में योगतारों की बतायी हुई स्थिति से आज की स्थिति कितनी भिन्न है –
- आर्द्रा नक्षत्र का योगतारा α Ori — मृगशिरा के परास–क्षेत्र में है।
- स्वाति नक्षत्र का योगतारा α Boo — Arcturus चित्रा की परास–क्षेत्र में है।
- ज्येष्ठा नक्षत्र का योगतारा α Sco — Antares अनुराधा के परास–क्षेत्र में है।
- पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का योगतारा ε Sgr — Kaus Australis मूल नक्षत्र के परास–क्षेत्र में है।
- उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का योगतारा σ Sgr — Nunki पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के परास–क्षेत्र में है।
- अभिजित् को जो वाम—हस्त—प्रशस्ति दी गयी है उस आधार पर उसका योगतारा α Lyr — Vega भी उसे प्रदत्त परास से बाहर पूर्वाषाढा के द्वितीय चरण में है।
- श्रवण नक्षत्र का योगतारा α Aql — Altair उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के परास–क्षेत्र में है।
- श्रविष्ठा/धनिष्ठा नक्षत्र का योगतारा β Del — Rotanev उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के परास–क्षेत्र में है।
- विशेष ध्यान देने योग्य यह भी है कि योगतारा बनने के आवश्यक पूर्वबंधों के आधार पर धनिष्ठा नक्षत्र की परास (२९६°२०’००” से ३०६°४०’५८”) में तो कोई योगतारा है ही नहीं। हम यह भी देख सकते हैं कि ज्येष्ठा का योगतारा, अनुराधा और ज्येष्ठा के परास—विभाजन सीमा से बहुत निकट है, और ऐसा ही कुछ मूल नक्षत्र के योगतारा के भी साथ है, जो ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र मंडल के बीच की सीमा के अत्यन्त निकट है।
सूर्यसिद्धान्त में दी गयी योगताराओं की स्थिति ने मेरी परिकल्पना को लगभग
पुष्ट कर दिया था किन्तु मैंने इसे और भी सटीकता से जाँचना उचित समझा। अतः चलते
हैं आज से १२५९६ + २०२६ = १४९२५ वर्ष पहले! १२५९६ ईसा पूर्व! १२५९६ ईसा पूर्व बसन्त
सम्पात के क्षण २८ योगतारों की तात्कालिक स्थिति इस प्रकार थी –
|
क्रम |
योगतारा
— आधुनिक नाम |
α
— विषुवांश |
δ
— क्रान्ति |
λ
— सायन मान |
β
— क्रान्तिवृत्तीय अक्षांश |
λ
— निरयण मान |
क्रांतिवृत्त पर
नक्षत्र भोग |
|
१ |
अश्विनी — शेराटन |
१२h०८m१५.२s |
—००° ५४’ १०° |
१८२° ०३’ ४५° |
+०८° २९’ ४०° |
००° ०४’ ३०° |
अश्विनी ००° ०४’ ३०” |
|
२ |
भरणी — ४१ एरिएटिस |
१३h१३m५५.४s |
—०६° ५६’ ०२° |
१९८° ४६’ ०२° |
+१०° २६’ १२° |
१६° ४६’ ०७° |
भरणी ०३°२६’४७” |
|
३ |
कृत्तिका — अल्सायोन |
१४h०९m१०.१s |
—११° ४२’ १५° |
२११° ४०’ १२° |
+०४° ०३’ ०१° |
२९° ४०’ ५७° |
कृत्तिका ०३°००’५७” |
|
४ |
रोहिणी — ऐल्डेबारन |
१४h५३m४२.८s |
—२१° ३०’ ०५° |
२२१° २५’ १०° |
—०५° २८’ १०° |
३९° २५’ ५५° |
कृत्तिका १२°४५’५५” |
|
५ |
मृगशीर्ष — मीसा |
१५h५०m५८.३s |
—२९° ४५’ १२° |
२४३° २१’ ४८° |
—१३° २१’ ४५° |
५३° २२’ ३३° |
मृगशीर्ष ००° ०२’ ३३” |
|
६ |
आर्द्रा — बेटेलजूस |
१६h१३m३२.०s |
—३२° २२’ ५५° |
२४८° २९’ २०° |
—१६° ०१’ ३०° |
५८° ३०’ ०५° |
मृगशीर्ष ०५°१०’०५” |
|
७ |
पुनर्वसु — पोलक्स |
१६h५८m५५.१s |
—११° ३५’ ०२° |
२५५° ०९’ ३३° |
+०६° ४०’ १५° |
७३° १०’ १८° |
आर्द्रा ०६°३०’१८” |
|
८ |
पुष्य — ऐसेलस ऑस्ट्रेलिस |
१७h५२m४८.५s |
—००° ०८’ १५° |
२६७° ५२’ १४° |
+००° ०४’ ५०° |
८७° ५२’ ५९° |
पुनर्वसु ०७°५२’५९” |
|
९ |
आश्लेषा — ε हाइड्री |
१८h४३m१५.०s |
—४५° १५’ ००° |
२७८° ४४’ ०८° |
—२२° २४’ ३०° |
९८° ४४’ ५३° |
पुष्य ०५°२४’५३” |
|
१० |
मघा — रेगुलस |
२०h०५m३२.४s |
+०८° १६’ १०° |
२९९° ४९’ २५° |
+००° २७’ ४४° |
११९° ५०’ १०° |
आश्लेषा १३°१०’१०” |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी — ज़ोस्मा |
२०h५७m१२.२s |
+२३° १९’ ४५° |
३११° ०८’ ३४° |
+१४° २०’ १५° |
१३१° ०९’ १९° |
मघा ११°०९’१९” |
|
१२ |
उत्तराफाल्गुनी — डेनेबोला |
२१h३८m३५.०s |
+२४° ५८’ २०° |
३२१° ३५’ ५०° |
+१२° १८’ १०° |
१४१° ३६’ ३५° |
पू० फाल्गुनी ०८°१६’३५” |
|
१३ |
हस्त — जिएनाह |
२२h१३m४४.१s |
+००° ४५’ १०° |
३३३° २४’ १२° |
—१२° ११’ ५०° |
१५३° २४’ ५७° |
उ० फाल्गुनी ०६°४४’५७” |
|
१४ |
चित्रा — स्पिका |
२३h५९m५८.०s |
—०२° ४५’ ४५° |
३५९° ५९’ १५° |
—०२° ०३’ १५° |
१७९° ५९’ १५° |
चित्रा ०६°३९’१५” |
|
१५ |
स्वाती — आर्कटूरस |
००h४४m३५.२s |
+३५° ५५’ ००° |
०१४° ४५’ ४८° |
+३३° ४४’ १८° |
१९४° ५५’ ४८° |
स्वाती ०८°१५’४८” |
|
१६ |
विशाखा — ज़ुबेनएलगेनुबी |
०२h०२m५८.१s |
+१२° ३८’ २५° |
०३२° ०५’ १०° |
+००° २०’ १५° |
२१२° ०५’ १०° |
विशाखा १२°०५’१०” |
|
१७ |
अनुराधा — ड्शुब्बा |
०२h५३m४४.०s |
+१७° ११’ ००° |
०४४° ३६’ १८° |
+०१° ११’ ४०° |
२२४° ३६’ १८° |
अनुराधा ११°१६’१८” |
|
१८ |
ज्येष्ठा — एंटेरेस |
०३h४६m३५.९s |
+१५° २०’ ४०° |
०५७° २२’ ४५° |
—०४° ३४’ १५° |
२३७° २२’ ४५° |
ज्येष्ठा १०°४२’४५” |
|
१९ |
मूल — शौला |
०४h३१m५२.४s |
+०८° ४७’ ३०° |
०६७° १६’ ३०° |
—१३° ४७’ २०° |
२४७° १६’ ३०° |
मूल ०७°१६’३०” |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा— कॉस ऑस्ट्रेलिस |
०५h१४m२८.१s |
+१४° ५८’ १५° |
०७८° १५’ ४२° |
—०६° २८’ ३०° |
२५८° १५’ ४२° |
पू० षाढ़ा ०४°५५’१२” |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा — नुंकी |
०५h०१m१५.५s |
+२४° ५९’ २०° |
०८९° ४४’ ५०° |
—०३° २६’ ४४° |
२६९° ४४’ ५०° |
उ० षाढ़ा ०३°०४’५०” |
|
२२ |
अभिजित् — वेगा |
१७h३७m०३.३s |
+८५° २२’ ४०° |
०९८° ३८’ १२° |
+६१° ४४’ ०५° |
२७८° ३८’ १२° |
अभिजित् ०१°५८’१२” (उ०षाढ़ा ११°५८'१२") |
|
२३ |
श्रवण — अल्टेयर |
०६h३१m०२.४s |
+४४° ४२’ १५° |
०९७° ४३’ ५१° |
+२९° १८’ २४° |
२७७° ४४’ ३६° |
उ० षाढ़ा ११°०४’२६” |
|
२४ |
धनिष्ठा — डेनेब |
०८h१६m५२.०s |
+३४° ०१’ १०° |
१२१° ०५’ ३४° |
+३१° ५७’ १०° |
३०१° ०५’ ३४° |
धनिष्ठा ०५°३४’२०” |
|
२५ |
शतभिषा — सदाल्मेलिक |
०९h०५m३५.८s |
+१६° ४६’ ५०° |
१३३° ४२’ १५° |
—००° २३’ २०° |
३१३° ४२’ १५° |
धनिष्ठा ०७°०२’१५” |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा — मार्कब |
०९h४२m५२.१s |
+२९° ३८’ २०° |
१४६° १०’ २४° |
+१९° २४’ ४०° |
३२६° १०’ २४° |
पू० भाद्रपद ०६°१०’२४” |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा — अल्जेनिब |
१०h३७m०८.४s |
+२०° १८’ ४५° |
१५९° ०४’ ५२° |
+१२° ३६’ ००° |
३३९° ०४’ ५२° |
उ० भाद्रपदा ०५°४४’५२” |
|
२८ |
रेवती — ज़ीटा पाइसियम |
११h५९m५८.१s |
—००° ०२’ ५०° |
१७९° ५९’ १५° |
—००° १३’ ००° |
३५९° ५९’ १५° |
रेवती १३°१९’१५” |
·
१२५०६ ईसा पूर्व नक्षत्रों
के योगताराओं की स्थिति ज्ञात करने के लिये रैखिक गणनाओं के स्थान पर दीर्घ्कालीन
पुरस्सरण मॉडल (3 dimentional long term procession model) को चरणबद्ध रूप से लागू किया गया। Vondrák–Capitaine–Wallace के दीर्घकालीन ३—D precession model और उसके corrigendum
के अनुरूप ६—D तारकीय propagation को लागू किया गया है। Vondrák मॉडल दूरस्थ कालमान (epochs) के लिए बनाया गया है। पृथ्वी की दीर्घकालीन कक्षीय गति के संदर्भ—मॉडल
के रूप में La2010 को लिया गया है।
·
मानक खगोलीय युग
(J2000.0) से लक्षित वर्ष १२५९६ ईसा पूर्व (जूलियन
वर्ष —१२५९५) के बीच के कुल समय अंतराल
की गणना जूलियन शताब्दियों (T) में की गई:
· पृथ्वी के अक्षीय झुकाव की
गणना के लिए लास्कर (Laskar, १९८६) के दीर्घकालिक बहुपद समीकरणों (Polynomial Expressions for
Obliquity) का प्रयोग किया गया। इसके द्वारा वर्ष १२५९६ ईसा पूर्व के
लिए माध्य नति (Mean Obliquity) २४° १०’११.२” और नूतन—चलन (Nutation) के आवधिक प्रभावों को जोड़कर वास्तविक
नति (True Obliquity) २४° १०’१८.५” प्राप्त की गई।
·
δ—क्रान्ति का तात्पर्य है कि कोई तारा विषुवत् वृत्त से कितना उत्तर
(धनात्मक मान) या दक्षिण (ऋणात्मक मान) है।
β—क्रान्तिवृत्तीय अक्षांश का तात्पर्य है कि कोई तारा क्रान्तिवृत्त से कितना उत्तर (धनात्मक मान) या दक्षिण (ऋणात्मक मान) है।
·
सुदूर भूतकाल (१२५९६ ईसा पूर्व) के लिए तारों की प्रारंभिक स्थिति और उनकी
गतियों को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित वैश्विक डेटाबेस और कैटलॉग का उपयोग
किया गया है:
· विपो कैटलॉग
(Hipparcos Input Catalogue — HIC / ESA, १९९७): आधुनिक वेधशालाओं द्वारा संकलित इस उपग्रह डेटा से सभी २८ योगताराओं के मानक
युग (Epoch J२०००.०) के अत्यंत शुद्ध निर्देशांक (विषुवांश, क्रान्ति, लंबन और त्रिविमीय वेग) प्राप्त किए गए।
·
तारों की अपनी निजी सूक्ष्म
गतियों (Proper Motions) और उनके रेडियल वेग
(Radial Velocity) के सबसे आधुनिक और सटीक आंकड़ों को गैया कैटलॉग
(Gaia DR३ / ESA, २०२२) से
लिया गया, ताकि पिछले १४,९०० वर्षों में
तारों के आपसी विस्थापन को शुद्ध किया जा सके।
· जेपीएल डेवलपमेंट एफेमरीज (JPL Development Ephemeris — DE४४१
/ NASA): सुदूर भूतकाल (लाखों वर्षों के सौर मंडल
की गतिकी) के लिए पृथ्वी की कक्षा की विकेंद्रता
(Eccentricity) और घूर्णन अक्षीय विविधताओं के लिए नासा
(NASA) के इस दीर्घकालिक पंचांग को आधार बनाया गया।
· सुदूर भूतकाल में अयनचलन की
दर स्थिर नहीं थी (वह लगभग ४९.७८” प्रति वर्ष थी)। इसके समाधान
के लिए आईएयू २००६ (IAU २००६ / P०३)
के पुरस्सरण मैट्रिक्स (Precession Matrix) और
उसके त्रि—आयामी घूर्णन कोणों (zeta, z, theta) का समय के सापेक्ष समाकलन (Time Integration) किया गया।
इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन शुद्ध अयन कोण (Precession Angle) और चित्रापक्षीय अयनांश (True Chitrapaksha Ayanamsha) १७९° ५९’१५” निर्धारित हुआ।
·
चूंकि तारे स्थिर नहीं हैं;
पिछले लगभग १५,००० वर्षों में वे आकाश में अपने
पूर्व स्थितियों से विचलित हो चुके हैं इसलिए,
केवल पुरस्सरण ही नहीं, बल्कि प्रत्येक योगतारा
के स्थान को शुद्ध करने के लिए अंतरिक्ष में उनके त्रिविमीय वेग वेक्टर (U,
V, W) की गणना की गई। इससे सुदूर भूतकाल के लिए प्रत्येक तारे के शुद्ध
विषुवांश और क्रान्ति का निर्धारण हुआ।
· प्राप्त सायन क्रान्तिवृत्तीय
देशांतर में से तत्कालीन
चित्रापक्ष अयनांश (१७९° ५९’१५”) को घटाकर पारंपरिक निरयण देशांतर प्राप्त किया गया।
· इसके पश्चात,
संपूर्ण ३६०° के वृत्त को प्रत्येक नक्षत्र के
लिए १३° २०’(८०० कला) के समान भागों में विभाजित करके २७ नक्षत्रों के अंतर्गत योगताराओं की अंतिम
नक्षत्रगत स्थिति सुनिश्चित की गई।
इस प्रकार संपूर्ण गणना प्रक्रिया आधुनिक खगोल भौतिकी
(Modern Astrophysics) के कड़े वैज्ञानिक मापदंडों पर आधारित है फिर
भी गणना में यदि कहीं कोई दोष या असङ्गति लक्षित हो तो लेखक उसके प्रति
ध्यानाकर्षण हेतु उत्सुक एवं आग्रही है।
एक और तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण चाहूँगा! तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.२.३ में
अभिजित् की स्थिति इस प्रकार दी गयी है–‘अभिजिन्नामनक्षत्रमुपरिष्टादषाढानामवस्ताच्छ्रोणायाः’।”
व्याख्याकारों ने इस कथन का अर्थ “अभिजित् नामक नक्षत्र आषाढ़ाओं के ऊपर और श्रोणा
के नीचे है।” बताया है जो कि अशुद्ध है। यदि यह अर्थ नक्षत्र—मालिका
में अभिजित् की स्थिति बताता है तो इसके अनुसार अभिजित् का स्थान “उत्तराषाढ़ा के
पहले और श्रवण से बाद” होने के कारण ‘उपरिष्टादषाढानाम्
अवस्ताच्छ्रोणायाः’वाक्य ही असंगत हो जाता है। उत्तराषाढ़ा स्वयं श्रवण से पहले
पड़ता है तो कोई तारा दो क्रमागत तारों में से पहले वाले तारे से पहले और बाद वाले तारे
के बाद कैसे पड़ सकता है? वास्तव में यह वाक्य अभिजित्, उत्तराषाढ़ा तथा श्रवण नक्षत्र
के योगताराओं की उत्तराक्रान्ति का परस्पर सम्बन्ध बताता है तथा इस वाक्यांश का
अर्थ है – “अभिजित नामक नक्षत्र (उस) आषाढा
के ऊपर स्थित है जिसके नीचे (उत्तराषाढ़ा के नीचे) श्रवण स्थित है” और इसके अनुसार
अभिजित् की उत्तराक्रान्ति उत्तराषाढ़ा से अधिक है, उस उत्तराषाढ़ा से, जिसके नीचे
श्रवण स्थित है।
इस एक वाक्य के पीछे विद्वानों में बहुत विवाद भी हो चुका है। इस ऋषि—कथन
को लेकर एक प्रसिद्ध प्रशियाई—जर्मन प्राच्यविद्, इतिहासकार और संस्कृत के विद्वान
अल्ब्रेक्ट वेबर (Albrecht Weber, 1825–1901) और एक प्रसिद्ध
अमेरिकी भाषाविद्, संस्कृत के विद्वान और शब्दकोशकार विलियम
ड्वाइट व्हिटनी (William Dwight Whitney) परस्पर उलझ गये थे।
प्रशिया कभी यूरोप का एक शक्तिशाली और बड़ा राज्य था। बाद में प्रशिया साम्राज्य
ने जर्मनी के साथ एकीकरण करके आधुनिक जर्मन साम्राज्य (German Empire) का निर्माण किया था। ‘वेबर’
इसे आकाशीय स्थान (उत्तरा एवं दक्षिणा क्रान्ति आधारित) मानते तो थे किन्तु अर्थ वे
भी पहले से चला आ रहा वही घिसा—पिटा वाला ही लगाते थे कि “अभिजित् नामक नक्षत्र
आषाढ़ाओं के ऊपर और श्रोणा के नीचे है।” अतः
आकाशीय स्थिति के आधार पर वे अपनी मान्यता या कहें कि ऋषि—सत्य को सिद्ध नहीं कर
पाते थे और व्हिटनी तो वही पुराना राग अलापते थे कि यह वाक्य अभिजित् नक्षत्र की
आकाशीय स्थिति नहीं बल्कि नक्षत्रों में उसका क्रमागत स्थान बताता है। वाक्य का
मूल अर्थ किसी ने पकड़ा ही नहीं और अन्तरिक्ष में उनकी स्थिति ज्ञात करना या
सिद्धान्त—ग्रंथों में उनके विक्षेप से इस अभिकथन की तुलना करने का भी किसी को
ध्यान नहीं रहा (और अबतक इस अर्थ—विसंगति पर किसी का ध्यान नहीं है) अतः तैत्तिरीय
ब्राहमण के रचयिता का एक स्पष्ट वाक्य आज भी एक असंगत तथा अशुद्ध व्याख्या के साथ परोसा
जा रहा है क्योंकि अध्ययन के साथ चिन्तन एवं मनन भी आवश्यक है इस यथार्थ से किसी
को कोई प्रयोजन ही नहीं है तथा मक्षिका स्थाने मक्षिका की प्रवृत्ति अध्येताओं में
रच—बस सी चुकी है। मैंने कठिन प्रयत्न किया कि मेरे मुख से अङ्गार न चू पड़े ‘नेन्मेऽग्निर्वैश्वानरो
मुखान्निष्पद्याता’– किन्तु असंख्य प्रयासों के पश्चात् भी मुख से अंगार चू ही
पडा! इसी कारण तो स्वस्ति—मन्त्र का पाठ मन में अविरल चल रहा है। अस्तु!
अभिजित् की उत्तराक्रान्ति तो इतनी अधिक थी कि वह कभी पृथ्वी के उत्तरी
ध्रुव के लगभग सीध में हुआ करता था और आज के दिनों भी उसकी उत्तराक्रान्ति
उत्तराषाढ़ा से बहुत अधिक है। वह उत्तराषाढ़ा से नीचे कभी था ही नहीं! आज भी नहीं
है। इसी अधिक उत्तराक्रान्ति के कारण ही तो वह ज्योतिषीय नक्षत्र—मालिका में
सम्मिलित होने का अधिकारी नहीं है। अभिजित का δ—क्रान्ति देखने से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि १२५९६
ईसा पूर्व भी उसका विक्षेप (+)८५°२२’४०” था तथा β—क्रान्तिवृत्तीय अक्षांश, उसकी उत्तरा–क्रान्ति भी (+)६१°४४’०५” थी जिसके कारण वह
नक्षत्र–मण्डल में सम्मिलित होने योग्य था ही नहीं, किन्तु अन्य नक्षत्रों की उन
परासों का क्या करते जो नक्षत्र–मालिका के परासों को ३६० अंश तक की पूर्णता
प्राप्त होने नहीं दे रहे थे? अतः यद्यपि अभिजित
नक्षत्र–मालिका में सम्मिलित होने योग्य नहीं था किन्तु उसे सम्मिलित करना विवशता
थी! विवशता थी नक्षत्रों के वास्तविक परास के आधार पर नक्षत्र—परिधि में रह जा रहे
एक रिक्ति की पूर्ति हेतु! और गणित की इस विवशता ने अभिजित् को, जो तार्क्ष्य तो
था ही, अरिष्टनेमि भी बना दिया!
यहाँ मेरा उद्देश्य यह स्थापित करना नहीं है कि अभिजित् को नक्षत्र—मालिका
में या राशि—चक्र में क्यों नकारा गया या क्यों स्वीकारा गया। मैं तो ऋतु–बिन्दुओं
की नक्षत्र–गत स्थिति और सम्बंधित नक्षत्रों के योगतारों की स्थिति से उनकी तुलना
करना चाहता हूँ। १२५९६ ईसापूर्व बसन्त सम्पात के क्षण २८ योगताराओं की जनकपुर तथा
अहिल्याधाम के अक्षांशों पर समान भोग पद्धति एवं असमान भोग पद्धति के आधार पर नक्षत्रगत
स्थिति इस प्रकार थी —
|
क्रम |
नक्षत्र |
λ
— निरयण |
जनकपुर के अक्षांश पर समान भोग देशोदय के आधार पर योगतारों की नक्षत्रगत स्थिति |
जनकपुर के अक्षांश पर असमान भोग देशोदय के आधार पर योगतारों की नक्षत्रगत स्थिति |
अहिल्याधाम के अक्षांश पर समान भोग देशोदय के आधार पर योगतारों की नक्षत्रगत स्थिति |
अहिल्याधाम के अक्षांश पर असमान भोग देशोदय के आधार पर योगतारों की नक्षत्रगत स्थिति |
|
१ |
अश्विनी |
००°०४’३०° |
अश्विनी ००°०४’
३०" |
अश्विनी ००° ०४’
३०" |
अश्विनी ००°०४’३०" |
अश्विनी ००°०४’३०" |
|
२ |
भरणी |
१६°४६’०७° |
भरणी ०५°०८’
०७" |
भरणी ०४°२३’१३" |
भरणी ०४°१४’२७" |
भरणी ०४°२२’२७" |
|
३ |
कृत्तिका |
२९°४०’५७° |
कृत्तिका ०७° १२’
००° |
कृत्तिका १०°५५’३२° |
कृत्तिका ०४°३०’५७° |
कृत्तिका ११°०२’०७° |
|
४ |
रोहिणी |
३९°२५’५५° |
रोहिणी ०३°१९’५५° |
रोहिणी ०७°३८’४७° |
रोहिणी ०१°२३’४५° |
रोहिणी ०७°५८’३५° |
|
५ |
मृगशीर्ष |
५३°२२’३३° |
मृगशीर्ष ०३°२४’३३" |
मृगशीर्ष ०१°०६’०७" |
मृगशीर्ष ०२°०४’५३" |
मृगशीर्ष ०२°०२’५३" |
|
६ |
आर्द्रा |
५८°३०’०५° |
मृगशीर्ष ०७°४४’०५° |
मृगशीर्ष ०६°१३’३९° |
मृगशीर्ष ०७°१२’२५° |
मृगशीर्ष ०७°१०’२५° |
|
७ |
पुनर्वसु |
७३°१०’१८° |
आर्द्रा ०६°१२’१८° |
आर्द्रा ०६°१३’२०° |
आर्द्रा ०८°०२’१८° |
पुनर्वसु ००°१२’४८° |
|
८ |
पुष्य |
८७°५२’५९° |
पुनर्वसु ०४°१२’५९° |
पुनर्वसु १३°२१’२१° |
पुनर्वसु ०८°२९’१९° |
पुनर्वसु १४°५५’२९° |
|
९ |
आश्लेषा |
९८°४४’५३° |
पुनर्वसु १५°०४’५३° |
पुष्य ०१°४७’०१° |
पुष्य ०४°३६’५३° |
पुष्य ०३°४८’५३° |
|
१० |
मघा |
११९°५०’१०° |
आश्लेषा ०५°०४’१०° |
मघा ०१°१३’५८° |
आश्लेषा १०°५४’१०° |
मघा ०२°५४’१०° |
|
११ |
पूर्वाफाल्गुनी |
१३१°०९’१९° |
मघा ०३°१३’१९° |
मघा १२°३३’०७° |
मघा ०७°११’०९° |
पू०फाल्गुनी ००°१५’०९° |
|
१२ |
उ० फाल्गुनी |
१४१°३६’३५° |
पू०फाल्गुनी ०१°४०’३५° |
पू० फाल्गुनी ०९°०९’११° |
पू०फाल्गुनी ०३°०२’५०° |
पू०फाल्गुनी १०°४२’२५° |
|
१३ |
हस्त |
१५३°२४’५७° |
उ०फाल्गुनी ०२°२०’५७° |
उ० फाल्गुनी ०७°२६’५१° |
उ० फाल्गुनी ००°५२’५७° |
उ० फाल्गुनी ०७°१५’२७° |
|
१४ |
चित्रा |
१७९°५९’१५° |
चित्रा ०८°२९’१५° |
चित्रा ०२°०२’३४° |
चित्रा ०१°२१’१५° |
चित्रा ०३°४७’०५° |
|
१५ |
स्वाती |
१९४°५५’४८° |
विशाखा ०२°३९’४८° |
स्वाती ०४°४२’०३° |
स्वाती ०३°५१’४८° |
स्वाती ०६°११’५८° |
|
१६ |
विशाखा |
२१२°०५’१०° |
अनुराधा ०८°४१’१०° |
विशाखा १५°४७’४७° |
विशाखा ०८°३५’१०° |
विशाखा १७°०९’१०° |
|
१७ |
अनुराधा |
२२४°३६’१८° |
ज्येष्ठा ०९°१२’१८° |
ज्येष्ठा ०९°३६’०३° |
अनुराधा ०८°१५’३८° |
अनुराधा १०°२९’४८° |
|
१८ |
ज्येष्ठा |
२३७°२२’४५° |
मूल ०८°४८’४५° |
ज्येष्ठा ०९°१८’१३° |
ज्येष्ठा ०८°४८’४५° |
ज्येष्ठा १०°०४’५५° |
|
१९ |
मूल |
२४७°१६’३०° |
पूर्वाषाढ़ा ०३°५६’३०° |
मूल १२°३३’०७° |
मूल ०३°५६’३०° |
मूल १३°१६’३०° |
|
२० |
पूर्वाषाढ़ा |
२५८°१५’४२° |
पूर्वाषाढ़ा १४°५५’४२° |
पूर्वाषाढ़ा ०९°४४’४४° |
पूर्वाषाढ़ा ००°०६’०८° |
पूर्वाषाढ़ा १०°०७’०२° |
|
२१ |
उत्तराषाढ़ा |
२६९°४४’५०° |
उ० षाढ़ा १०°०६’५०° |
उ० षाढ़ा ०६°३६’३२° |
पू० षाढ़ा ११°३५’००° |
उ० षाढ़ा ०६°३६’००° |
|
२२ |
अभिजित् |
२७८°३८’१२° |
अभिजित् ०५° ५९’
१२° |
उ० षाढ़ा १५°२९’५४° |
उ० षाढ़ा ०५°३६’
१२° |
उ० षाढ़ा ००°३९’१२° |
|
२३ |
श्रवण |
२७७°४४’३६° |
उ० षाढ़ा ०४°१०’३६° |
उ० षाढ़ा १४°२६’४५° |
उ० षाढ़ा ०४°४२’३६° |
उ० षाढ़ा १४°३७’४६° |
|
२४ |
धनिष्ठा |
३०१°०५’३४° |
धनिष्ठा ०८°३५’३४° |
श्रवण ११°२३’१९° |
धनिष्ठा ०१°३४’३४° |
धनिष्ठा ०७°३५’३४° |
|
२५ |
शतभिषा |
३१३°४२’१५° |
शतभिषा ०५°००’१५° |
धनिष्ठा १०°०८’५५° |
धनिष्ठा ०५°००’१५° |
शतभिषा ०५°२७’५५° |
|
२६ |
पूर्वाभाद्रपदा |
३२६°१०’२४° |
पू०भाद्रपद ०२°४८’२४° |
पू०भाद्रपद ००°३९’२९° |
शतभिषा ११°५५’०४° |
पू०भाद्रपद १०°४०’२४° |
|
२७ |
उत्तराभाद्रपदा |
३३९°०४’५२° |
उ० भाद्रपद ०३°०४’५२° |
पू० भाद्रपद १३°३३’५७° |
पू० भाद्रपद १०°३३’५२° |
पू० भाद्रपद ०९°४४’३२° |
|
२८ |
रेवती |
३५९°५९’१५° |
रेवती १२°०९’१५° |
रेवती ०९°३६’३५° |
रेवती ०४°२२’२५° |
रेवती ११°५६’०५° |
|
* |
ग्रीष्म
अयनान्त |
२६९°५९’११.२०” |
उत्तराषाढ़ा
१०°२१’११.२०” |
उ०षाढ़ा
६°५०’५३.२०” |
पूर्वाषाढ़ा
११°४९’२१.२०” |
उ०षाढ़ा
०६°५२’२१.२०” |
स्वदेशोदय का मान
स्थान—विशेष के अक्षांश पर निर्भर होता है और स्थानीय उदय—प्रमाण स्थान के अक्षांश
के साथ बदलता है। भोग के आधार पर दोनों पद्धतियों तथा जनकपुर एवं अहिल्याधाम के
अक्षांशों पर प्राप्त परिणामों को साथ रखने पर जो मुख्य रूप से द्रष्टव्य एवं
विचारणीय परिणाम प्राप्त होते हैं वे इस प्रकार हैं —
·
चित्रा का योगतारा
चूंकि विशुद्ध चित्रापक्षीय अयनांश का आधार है, और उसे अश्विनी के आदि बिन्दु से
१८० अंश पर ही रखा जाना है अतः वह निरयण मान से भी, तथा जनकपुर एवं अहिल्याधाम दोनों
स्थलों के अक्षांशों पर समान विभाजन एवं
असमान विभाजन दोनों के आधार पर खमंडल में अश्विनी के आदि—बिन्दु से १८० अंश चित्रा
की परास में ही अवस्थित/दृश्य है तथा बसन्त सम्पात का बिन्दु अविकल रूप से ३६० अंश
के वृत्तीय भोग अथवा जनकपुर तथा अहिल्याधाम के अक्षांशों पर सटीक चित्रा नक्षत्र
के योगतारे की सीध में ही पड़ता है।
- पुष्य का योगतारा निरयण मान से तथा जनकपुर एवं अहिल्याधाम
के अक्षांशों पर भी समान विभाजन एवं असमान विभाजन के आधार पर पुष्य की परास
में ही अवस्थित/दृश्य है ।
- रेवती का योगतारा निरयण मान से तथा जनकपुर के अक्षांश पर
सामान भोग पद्धति एवं असमान भोग पद्धति दोनों से रेवती नक्षत्र में ही स्थित/दृश्य
है।
- अभिजित् का
योगतारा विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। उसका प्राप्त निरयण मान २७८°३८’१२” है, और जिसकी समान भोग-पद्धति से जनकपुर के अक्षांश
पर नक्षत्र स्थिति उसकी अपनी परास में ०५° ५९’ १२° पर है। असमान भोग पद्धति से वह जनकपुर के
अक्षांश पर पूर्वाषाढ़ा तथा अहिल्याधाम के अक्षांश पर दोनों पद्धतियों से
उत्तराषाढ़ा में दृश्य है।
- श्रवण योगतारा
निरयण मान २७७°४४’३६” से उत्तराषाढ़ा की परास में है तथा जनकपुर एवं
अहिल्याधाम दोनों स्थानों के अक्षांशों से समान एवं असमान दोनों पद्धतियों से
उत्तराषाढ़ा में ही दृश्य है।
- १२५९६ ईसा
पूर्व ग्रीष्म अयनांत का निरयण मान २६९°५९’११.२०” है जिसकी स्थिति
जनकपुर तथा अहिल्याधाम दोनों स्थानों पर दोनों प्रकार के नक्षत्र-विभाजन के आधार
पर उत्तराषाढ़ा के योगतारे से मात्र लगभग १५ कला के बाद है और श्रवण का योगतारा
जनकपुर एवं अहिल्याधाम दोनों स्थानों से समान विभाजन पद्धति से उत्तराषाढ़ा के योगतारे से भी पीछे
दृश्य है जबकि असमान विभाजन पद्धति में
- श्रवण एवं
अभिजित के योगतारे परस्पर एक अंश से कम अंतराल पर स्थित एवं दृश्य हैं। श्रवण की
स्थिति अभिजित् के बाद मान्य है किन्तु भचक्र में उस समय श्रवण पहले है (२७७°४४’३६° पर) और अभिजित् उसके बाद है (२७८°३८’१२°)।
प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर यह स्पष्ट है कि ऋषि ने अपनी ऋचा में एक
युग—सत्य का उद्घोष किया था। उसने देखा था कि उस वर्ष चारो ऋतु—बिन्दुओं में एक
बिन्दु, ग्रीष्म—अयनान्त बिन्दु एक ऐसी विशिष्ट स्थिति में है जब उत्तराषाढ़ा,
श्रवण एवं अभिजित् के योगतारे, उन योगतारों के आधार पर निर्दिष्ट नक्षत्र-परासों
की प्रत्येक मान्य परिसीमा का उल्लंघन कर चुके हैं तथा ग्रीष्म-अयनान्त बिन्दु एक
सङ्क्रमित परिस्थिति में जा पडा है तथा उत्तराषाढ़ा के योगतारे से अति-निकट होने के
बाद भी उत्तराषाढ़ा के मान्य परास से बाहर अभिजित् की परास में है और अभिजित् के
बाद के नक्षत्र श्रवण का योगतारा तो अभिजित् से भी पीछे आ चुका है। साधारण रूप से देखा जाये तो श्रवण एवं अभिजित् की अक्षांशीय
स्थिति तो ऐसी थी जैसे दोनों परस्पर एक
दूसरे पर आरोपित होने को उद्द्यत हों! वह तो इन दोनों की उत्तराक्रान्ति में इतना
अंतर है कि ये दोनों अलग-अलग पहचाने जा सकते थे। और यही कारण था कि ऋषि ने पहले
तार्क्ष्य कहा बाद में अरिष्टनेमि! अन्यथा तार्क्ष्य (श्रवण) का स्थान अभिजित् के
बाद आता है और यह विसङ्गति अवहेलना योग्य नहीं थी। किन्तु दृश्यता के आधार पर और
इन दोनों की तात्कालिक स्थिति के आधार पर उस समय श्रवण का योगतारा अभिजित् से पीछे
जा चुका था अतः ऋषि को तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः कहना ही पड़ा। और उस वर्ष के चारो
ऋतू-बिन्दुओं को उल्लिखित करते हुए उसने इन्द्र – वृद्धश्रवाः द्वारा इन्द्राग्नि
से सम्बंधित चित्रा, पूषा (विश्ववेदाः) द्वारा रेवती, तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः
द्वारा श्रवण एवं अभिजित् का सङ्क्रमण तथा बृहस्पति द्वारा पुष्य नक्षत्र का
उल्लेख किया।
प्रमाण तीन कोटि के कहे गये हैं। पहला है शास्त्र—प्रमाण, दूसरा आप्त—प्रमाण
और तीसरा आत्म—प्रमाण। शास्त्र—प्रमाणं प्रथमम् वदन्ति। तात्पर्य है कि यदि किसी
विषय या कथन आदि का शास्त्रों में उल्लेख हो तो उसे शास्त्र—प्रमाण मान कर स्वीकार
किया जाता है। आप्त—प्रमाणम् च ततः द्वितीयम्। यदि किसी आप्त—पुरुष ने, किसी
विद्वान् ने किसी विषय या कथन के सम्बन्ध में कुछ बताया हो तो उसे आप्त—प्रमाण के
रूप में स्वीकार किया जाता है। किन्तु आत्म—प्रमाणम् परमम् च मुख्यम् – जो स्वतः
प्रमाणित हो वह और जो आत्मा को स्वतः स्वीकार हो वह, ये दोनों मुख्य प्रमाण होते
हैं।
शास्त्रं प्रमाणं प्रथमं ब्रुवन्ति,
ततः परं गुरुवचः प्रमाणम्।
ततोऽधिकं चात्मसंवेद्यरूपं,
स्वस्मात्परं नास्ति किमप्यतो हि ॥
[शास्त्रं प्रमाणं प्रथमं ब्रुवन्ति —
सबसे पहले शास्त्र के वचनों को प्रमाण कहना चाहिए। ततः परं गुरुवचः प्रमाणम् —
उसके बाद आप्त पुरुष (या गुरु) के वचनों को प्रमाण मानना चाहिए परंतु इन सबसे
श्रेष्ठ और अंतिम स्वयं का अनुभव—आत्मानुभूति है,
क्योंकि स्वयं की आत्मा के अनुभव से बढ़कर कोई सत्य नहीं है।]
आत्म—प्रमाण शब्द—युग्म का एक अर्थ और है – वह तथ्य जो स्वतः प्रमाणित हो।
गणित अपना प्रमाण स्वयं होता है तथा आलेख में गणित द्वारा यह सिद्ध है कि १२५९६ ईसा
पूर्व जनकपुर तथा अहिल्याधाम के अक्षांश पर ऋतु—बिन्दुओं की स्थिति अविकल रूप से
वही प्राप्त हो रही थी जो ऋषि ने अपनी ऋचा में उद्घोषित किया है। और इस निष्कर्ष
से मेरी परिकल्पना कि यह ऋचा जिस स्वस्तिक का निर्माण सङ्केतित कर रही है वह
दिशायें नहीं हैं, वह ख—स्वस्तिक भी नहीं है, क्रांतिवृत्त पर तीन माह के अंतराल
पर अविकल रूप से ९० अंश के अंतर पर घटने वाले बसन्त विषुव, ग्रीष्म अयनान्त, शरद
विषुव तथा शीत अयनान्त की स्थितियों का नक्षत्रों के माध्यम से लिखा गया उस युग का
अभिलेख है, यह सत्यापित होता है। और इससे एक तथ्य और उभर कर आता है कि ऋषि द्वारा
इस ऋचा का दर्शन ‘न्यूनतम ईसा से १२५९६ वर्ष पूर्व किया गया था। ध्यान रहे कि मैं
इसे ‘न्यूनतम ईसा से १२५९६ वर्ष पूर्व’ कह रहा हूँ।
अब आप पूछेंगे कि स्थान के रूप में जनकपुर अथवा अहिल्याधाम का ही चुनाव
मेरे द्वारा क्यों किया गया? यह चुनाव मेरा नहीं था। यह चुनाव गणित तथा इतिहास द्वारा
संयुक्त रूप से किया गया और इस चुनाव को अस्वीकार करना असम्भव था। आपको क्या लगता
है? ये गणनायें एक वर्ष-विशेष हेतु निष्पादित कर के आपके समक्ष परिणाम प्रस्तुत कर
दिया गया है? इन कुछ पृष्ठों में परिवेशित परिणाम तक पहुँचने हेतु लगभग पाँच सौ
वर्षों के क्रमागत बसन्त सम्पात सहित अन्य ऋतू-बिन्दुओं की तथा तात्कालिक समय पर
नक्षत्रों के योगताराओ के स्थिति की गणना तथा सप्तसिंधु प्रदेश के नदी-तटों के
सम्भावित आर्य-बस्तियों से ले कर शोण-गङ्गा के संगम तक के पचासों नगरों के
अक्षांशों पर नक्षत्रों के परास के समान विभाजन एवं असमान विभाजन के आधार पर
देशोदय की गणना की गयी और तब जा कर इस वर्ष-विशेष एवं स्थान विशेष का चयन किया जा
सका। किन्तु इस वर्ष-विशेष १२५९६ ईसापूर्व से भी अधिक महत्वपूर्ण वर्ष था १२८९९
ईसा पूर्व का वर्ष! वह वर्ष, जब पृथ्वी की वास्तविक नति का मान २४°००’३१.८४” प्राप्त हुआ था। और तब यह अनुमान हुआ कि भूगोल
एवं भगोल की दृष्टि से इसका एक विशिष्ट निहितार्थ है तथा १२८९९ ईसा पूर्व से १२५९६
ईसा पूर्व तक के इस लगभग ३०० वर्ष का कालखण्ड ऋग्वैदिक आर्यों के इतिहास का वह
महत्वपूर्ण काल-खण्ड है जिसे जान लेने के पश्चात् कोई भी पुरातनता का प्रेमी अवश्य ही एक सन्नाटे में
आ सकता है। किन्तु इसे समझाने के लिये मुझे
आपको शास्त्र—प्रमाण या आप्त—प्रमाण देना होगा। एक तो लगभग पाँच सौ वर्षों की खगोल
एवं भगोल सम्बंधित, ज्योतिष एवं गणित सम्बंधित, कोण एवं गोल—त्रिकोणमिति सम्बंधित
गणनायें, पुनः उन गणनाओं का पदे—पदे सत्यापन एवं परीक्षण, पुनः उनको थोड़े सरल
शब्दों में जो सामान्य जन को भी समझ में आ सके ऐसी शैली में अङ्कित/टङ्कित करना!
इस सब में कितना समय और श्रम लगा होगा? और वैसे भी आलेख अत्यन्त दीर्घकाय हो चुका
है और गणित के अनुशासन से श्रमित मेरा मन तो अब एक कहानी में तनिक विश्रान्ति की
खोज कर रहा है अतः धैर्य के साथ यदि इतना सब आप पढ़ गये हैं तो इस आलेख के उत्तर—भाग
की प्रतीक्षा करिये। वैदिक-वाङ्गमय में इधर-उधर बिखरे ऐतिहासिक साक्ष्यों को चुन
कर एकत्र करके आपके लिये वैदिक इतिहास से एक सत्यकथा बुनने हेतु मुझे थोड़ा सा समय
चाहिये।
स्वनामधन्य श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक स्थान पर लिखा था कि
“स्वान्तःसुखाय एक बहुत बड़ा शब्द है।” आज के स्वार्थ्यपरक युग में वास्तव में कुछ
भी स्वान्तःसुखाय करना लगभग असम्भव सा होता है। प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक
कृत्य से उसे कुछ परोक्ष-अपरोक्ष लाभ की आशा रहा ही करती है; किन्तु इस कार्य को
मैं पूर्णतया स्वान्तःसुखाय की श्रेणी में रख सकता हूँ क्योंकि इतने कठिन विषय से
सम्बंधित आलेख को कोई पूरी तरह पढ़ेगा इसका मुझे विश्वास ही नहीं है। फिर भी इसका
प्रस्तुतीकरण क्यों? मात्र इस लिये कि “सनद रहे!”
एक फाँस थी, जो निकल गयी, एक व्याकुलता थी जो शान्त हुई, निरंतर शीश पर बेताल
की भाँति बैठ कर मुझे उत्तर देने को कोंचता एक प्रश्न था जिसका उत्तर मैंने खोज
लिया। अब यह मेरा आत्मानुभव है, मेरा आत्म—प्रमाण है। भास्कराचार्य ने सिद्धान्त—शिरोमणि
में कहा था –
“तुष्टन्तु सुजनाः बुद्धा विषेशान् मदुदीरितान्।
अबोधेन हसन्तो माम् तोषयेष्यन्ति दुर्जनाः।।”
[सज्जन मेरे प्रतिपादन से सन्तुष्ट होवें, दुर्जन तो यह सब न समझते हुए मेरा उपहास करके सन्तुष्ट हो ही जायेंगे!]
अंततः ऋषि की उसी स्वस्ति—वाची ऋचा के साथ —
स्वस्ति नो इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्ति नो पूषा विश्ववेदाः।स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिश्तानेमिः, स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।
विदा पुनर्मिलनाय!
© त्रिलोचन नाथ तिवारी.
(आलेख को कॉपी पेस्ट करना प्रतिबन्धित
है। यदि सन्दर्भ रूप में उल्लिखित करने की सदाशयता हो तो व्यक्तिगत उपयोग, अध्ययन या
शोध कार्यों में इसका उपयोग करने की स्वतन्त्रता है। विकला स्तर तक की विशुद्ध
गणनाओं के पश्चात् भी इन पंक्तियों का लेखक किसी भी रूप में यह अभिकथन नहीं करता
कि उपरोक्त गणनाओं में त्रुटि की संभावना नहीं है क्योकि लेखक के पास उसकी अपनी
जिज्ञासा ही सर्वाधिक समृद्ध उपादान था जिसके अतिरिक्त ऐसे कार्यों हेतु अन्य आवश्यक
संसाधन लेखक को उपलब्ध नहीं थे तथा लेखक कोई ज्योतिषी या खगोलविद् भी नहीं है।
ईसा—पूर्व आकाशीय स्थितियों हेतु अन्तर्जाल पर मुक्त—स्रोत (ओपन सोर्स) के रूप में उपलब्ध एफेमरीस तथा ऐसे ही अन्य डेटाबेस जैसे स्विस एफेमरीज और नासा के उपलब्ध डेटाबेस का उपयोग किया गया है जिसके उपयोग हेतु किसी कृतज्ञता-ज्ञापन की आवश्यकता न होते हुए भी, लेखक उन सभी के प्रति कृतज्ञ है।)




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